राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ राजतरंगिणी
स्थान के सम्पर्क में रहने के कारण सचमुच श्मशान [L3_col2] वाराह अवतार—वाराह भगवान् का अवतार हो गया है। [L4_col2] मालूम होता है। इसी क्षेत्र में हुआ था। कल्हण ने इस स्थान से वितस्ता की धारा में वेग आ [L5_col2] तरंग २ के श्लोक १९२ में वराह वर्त शब्द का प्रयोग जाता है। एक मील और धारा के साथ जाने के [L6_col2] किया है। यह स्थान वर्तमान वराहगाम के समीप पश्चात् वितस्ता नदी अपना शांत स्थिर रूप त्याग [L7_col2] होना चाहिए। वराह ग्राम वोरु परगना में है। द्रंग कर हर-हर करती गर्त में प्रवेश करती है। चट्टानों [L8_col2] में तीन मील पूर्व होगा। आदिवराह का यहाँ अवतार और ढोकों से टकराती उगे तक चली जाती है। [L9_col2] लेना कहा जाता है। वारहमूला अर्थात् मूल वाराह नीलमत पुराण में नारायण स्थान का उल्लेख [L10_col2] किंवा वराह नाम से इसीलिए संबोधित किया आता है। [L11_col2] गया है। नारायणस्य च स्थानं सपुण्यं बदराश्रमम् । [L12_col2] बर्नियर का अभिभावक दानिशमंदखाँ था जिसके साथ सुगन्धां शतकुम्भां च कालिकाश्रममेव च ॥ [L13_col2] वह कश्मीर गया था। वह एक रोचक कहानी उपस्थित —४7 : १२८, १२९ [L14_col2] करता है—'दानिशमंद खाँ ने मुझे वारहमूला जाकर देवं नारायणं स्थाने पश्चिमे तु वरप्रदम् । [L15_col2] एक अलौकिक घटना देखने के लिए कहा। तात्पर्य गजेन्द्रमोक्षणं देवं वराहस्य समीपगम् ॥ [L16_col2] यह था कि मैं इस दैवी चमत्कार को देखकर अपना —1158 : १३६९, १३७० [L17_col2] धर्म परिवर्तन कर दूँ और मुसलमान हो जाऊँ। यहाँ स्नात्वा नारायणस्थाने विष्णुलोके महीयते । [L18_col2] पर एक मसजिद है। एक दरवेश की कब्र है। यह रामतीर्थे भवाब्धौ च फलमेतद् प्रकीर्तितम् ॥ [L19_col2] कब्र एक मसजिद में है। यद्यपि दरवेश मर चुके हैं। —1312 : १५२६ [L20_col2] अलौकिक ढंग से बीमार तथा पशुओं को अच्छा करते स्नात्वा नारायणस्थाने वितस्ताम्भसि पार्थिव । [L21_col2] हैं। चाहे मैं इस चमत्कार पर विश्वास न करूँ विष्णुलोकमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशयः ॥ [L22_col2] परंतु यहाँ एक दूसरी चीज और है। उस दरवेश —1345 : १५६० [L23_col2] के कारण यह चमत्कार होता है। यहाँ एक गोल नीलमत पुराण में नारायण स्थल का दो स्थानों [L24_col2] पत्थर है। उसे मजबूत से मजबूत आदमी नहीं उठा पर तीर्थरूप में वर्णन किया गया है। मालूम होता [L25_col2] सकता। यदि ११ आदमी दरवेश की प्रार्थना कर है, दो नारायण स्थान थे। श्लोक संख्या १३४५, [L26_col2] अपनी एक-एक उंगली इसमे लगाकर उठाएँ तो १५६० तथा १५९८ में वाराह क्षेत्र का उल्लेख [L27_col2] वह सूखे तिनके की तरह हल्का उठ जाता है। है। परन्तु श्लोक संख्या १३१२, १५२६ में वाराह [L28_col2] 'मुझे वारहमूला अच्छा लगा। दरवेश की क्षेत्र का उल्लेख नहीं है। [L29_col2] ज़ियारत और कब्र कीमती सामान से सजी थी। उसे महाभारत वन पर्व (८३ १८-१९) में वराहा- [L30_col2] घेर कर बहुत से लोग बैठे थे। वे कहते थे कि वतार स्थान के विषय में उल्लेख मिलता है। [L31_col2] वे बीमार थे। अच्छे होने के लिए आये थे। मसजिद कुरुक्षेत्र सीमा के अन्तर्गत यह एक तीर्थ है। भगवान् [L32_col2] की बगल में एक बावर्ची खाना था। वहाँ देग चढ़ा विष्णु ने यहाँ वाराह रूप में अवतार लिया था। इस [L33_col2] था। उसमें चावल तथा गोश्त पक रहा था। मैं तीर्थ में स्नान करने पर स्नानार्थी को अग्निष्टोम यज्ञ [L34_col2] समझ गया। इस देग के चुम्बकीय भांति पदार्थ के करने का फल प्राप्त होता है। वाराह क्षेत्र के विषय [L35_col2] आकर्षण के कारण गरीब तथा बीमार एकत्र हो गये में यथा स्थानपर वर्णन किया गया है। [L36_col2] थे। मसजिद की दूसरी तरफ मुल्ला का मकान था। [L37_col2] बाग था। यहाँ में पामदानी बगता था। उसकी तारीफ