भारतकोश
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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

षष्ठ तरङ्ग: यशस्कर, पर्वगुप्त व रानी दिद्दा का शासन

४१४ राजतरंगिणी तं चाऽस्थिशेषमद्राक्षीत्कृप्यमाणं वलाद् वृकैः । शूलमूलावबद्धास्थिखण्डावष्टम्भनिश्चलम् ॥ ८५ ॥ ८५. शृगालों द्वारा वलात् नोचे जाते हुए तथा शूल मूल में बँधे, अस्थि खण्ड के सहारे निश्चल, अस्थि मात्र अवशिष्ट उसे ( गुरु ने ) देखा । समीरणसमीकीर्णमुण्डरन्ध्राग्रनिर्गतैः । ध्वनितैरनुशोचन्तमिवाऽवस्थां तथाविधाम् ॥ ८६ ॥ ८६. वहां समीरण समाकीर्ण मुख रन्ध्र द्वारा निर्गत ध्वनियों से मानो वह अपनी उस प्रकार की अवस्था को सोच रहा था । हा वत्स द्रष्टुमीदृक्ते जीवाम्यद्येति वादिना । तस्याऽऽकृष्यत मूलान्तःप्रोतं तेनाऽथ कीकसम् ॥ ८७ ॥ ८७. 'हा ! वत्स !! आज मैं तुम्हें इस प्रकार देखने के लिये जीवित हूँ ?' इस प्रकार कहते हुए उसने ( ईशान ) शूल विद्ध अस्थि को खींचा । वेष्टिताङ्घ्रिः शिरशीर्णैस्तत्कचैर्धूलिधूसरैः । अनैषीत्तं स कङ्कालं वारयन्भषतो वृकान् ॥ ८८ ॥ ८८. शिरसे गिरे धूल धूसरित उसके केशों से लिप्त चरण वह ( ईशान ) गुर्राते हुए वृकों को हटाता हुआ उस के कंकाल को ले गया । उचितां सत्क्रियां कर्तुं ततस्तस्य समुद्यतः । भाले विधातृलिखितं श्लोकमेतमवाचयत् ॥ ८९ ॥ ८९. तदनन्तर उचित सत्क्रिया करने के लिये समुद्यत उसने भाल१ पर विधातृ लिखित इस श्लोक२ को वाँचा । पाठभेद : श्लोक संख्या ८६ में 'समाकीर्ण' का पाठभेद 'समाकीर्ण' तथा 'समापूर्ण' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : श्री स्टीन ने ८५ एवं ८६ श्लोको का अनुवाद एक साथ किया है। हिन्दी अनुवाद में भी एक साथ ही अनुवाद किया गया है। किन्तु श्री रणजोत सीताराम पण्डित ने उनका अनुवाद अलग अलग किया है। यहाँ भी अनुवाद अलग ही किया गया है। उससे अर्थ में किसो प्रकार की विप्रतिपत्ति नहीं होती है। पाठभेद : श्लोक संख्या ८८ में 'वेष्टिताङ्घ्रिः' का 'वेष्टिताङ्घ्र' 'सकङ्काल' का 'स्वकं कालं' तथा 'भषतो' का पाठभेद 'भाषतो' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ८९ [ १ ] भालरेखाः-प्राचीन काल में रेखा विज्ञान सामुद्रिक विद्या बहुत विकसित थी । हस्त- रेखा, पादरेखा, ललाटरेखा, आदि देखकर जन्म- पत्र तैयार कर दिया जाता था । आज भी प्रत्यन्त मेधावी अनुभवी सामुद्रिक हस्तरेखा देखकर जन्म तिथि निकाल लेते हैं ।

द्वितीय तरंग ४१५ 'यावज्जीवं दरिद्रत्वं दश वर्षाणि बन्धनम् । शूलस्य पृष्ठे मरणं पुना राज्यं भविष्यति' ॥ ६० ॥ ९०. "यावज्जीवन दारिद्रता, दश वर्षों तक बन्धन, शूल पृष्ठपर मरण, पुनः राज्य होगा।"

खोपड़ी पर रेखाएँ होती हैं। भगवान् बुद्ध के समय वंगीस खोपड़ी देखकर भविष्य तथा भूत दोनों कालो को कह देते थे। यह उनका पेशा हो गया था। उसने इस प्रकार बहुत धन अर्जन किया था। भगवान् बुद्ध ने उसके सम्मुख पांच खोपड़ियां रख दीं। उसने चार का सच्चा हाल बता दिया परन्तु पांचवें का भविष्य नहीं बता सका क्योकि वह एक निर्वाण प्राप्त व्यक्ति की खोपड़ी थी। [सुत्तनिपात. वंगीस सुत्त: संयुक्त निकाय: ८:१-१२ पर गाथा २६४] भारत में एक प्रचलित आख्यान है। एक ज्योतिषी थे। उन्हें एक खोपड़ी मिल गयी। उसपर लिखा था 'ताहू पर कछु ओर' अभी कुछ और होना बाकी है। पण्डित को महान् आश्चर्य हुआ। मर जाने पर अब इसका क्या होगा। परीक्षा के लिये उसे लाकर घर में रख दिया। खोपड़ी घर में रखने पर लोगों को आश्चर्य हुआ। पण्डित की स्त्री को लोगो ने बहका दिया। इस खोपड़ी के कारण उस पर विपत्ति आने वाली थी। पण्डितानी ने क्रोधावेश में खोपड़ी ऊखल मे डालकर कूट डाला। पण्डितजी लौट कर आये। उन्हें बात मालूम हुई। उन्हें पण्डितानी की दुर्बल बुद्धि पर तो दया आयी। तथापि अपने शास्त्र पर उन्हें और विश्वास हो गया। कपाल रेखा की वाणी सत्य उतरी। २. श्लोक—श्लोक में चार पाद एवं आठ मात्रायें होती है। रामायण तथा महाभारत श्लोकों में लिखे गये हैं। संस्कृत का कोई भी पद जो अनुष्टुप् छन्द में होता है, उसे श्लोक कहते है। यह गायत्री की स्तुति में कहा गया था। कल्हण ने अनुष्टुप् छन्द में ही राजतरंगिणी का निबन्धन किया है। किन्तु आदि एवं अन्त में उसने छन्द परिवर्तित कर दिया है। महाकाव्य का यह एक लक्षण हैं कि सर्ग के अन्त में छन्द परिवर्तित कर दी जाती है। कालिदास की भी यही शैली है। पाठभेद : श्लोक संख्या ९० मे 'पुना राज्यं' का पाठभेद 'पुन राज्यं' तथा 'पुनः राज्यं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ ९०(१) सन्धिमति और महात्मा ईशामसीह यदि सन्धिमति का नाम संयोग से ईशान होता तो उसे ईशा मानने मे सन्देह का अवसर नही मिलता। कुछ यह बात प्रचलित हो गई है कि महात्मा ईशा मसीह कश्मीर आए थे। वहाँ दश वर्ष निवास किया था। वह किसी बौद्ध बिहार में निवास करते थे। कश्मीर मे ही उन्होने ज्ञानाजंन किया था। ईशा के जीवन में १० वर्ष का काल अज्ञात है। वे १० वर्ष कहा थे ? क्या किये, ? कुछ पता नही चलता। जीवन चरित्र की मूल घटनाओं में साम्य है। कुछ मुसलिम लेखकों का मत हैं कि प्रभु ईशा- मसीह की कब्र कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में है। उसे हजरत यूज आसफ कहते है। यह मजार श्री- नगर मे खानयार में है। यह भी कहा जाता है कि यूज आसफ महात्मन् मूसा के वंशज थे। मिस्र के बादशाह ने कश्मीर में उन्हें अपना राजदूत बना कर कश्मीर के राजा के दरबार मे भेजा था। अरबी में यदि यूज़ आसफ लिखा जाय तो यह बोधि-सत्त्व तुल्य लगेगा। सम्भव है कि उक्त मज़ार मिस्री राजदूत यूज़ आसफ की रही होगी अथवा वहाँ कोई स्तूप था। जिसका सम्बन्ध बोधि- सत्त्व से था। उसे ही यूज़ आसफ इस्लामीकरण निमित्त कर दिया गया।

४१६ राजतरंगिणी पादत्रयस्य दृष्टार्थः श्लोकस्याऽसीत्स योगवित् । द्रष्टव्ये तुर्यपादार्थप्रत्यये कौतुकान्वितः ॥ ६१ ॥ ९१. श्लोक' के पाद त्रय का अर्थ देखकर, द्रष्टव्य चतुर्थ पादस्थ अर्थ के विश्वास में वह योगवेत्ता कौतुकान्वित हो गया था । अचिन्तयच्च संभ्रान्तः कथमेतद्भविष्यति । उवाच च विधेः शक्तिमचिन्त्यां कलयंश्चिरम् ॥ ६२ ॥ ९२. सम्भ्रान्त होते हुए उसने सोचा—'यह कैसे होगा ?' और देर तक विचार करते हुए विधाता की शक्ति को (मन ही मन) अचिन्त्य कहा । कश्मीर में हिन्दूराज के अन्त तथा इसलाम के प्रचार के साथ हिन्दूपरम्परा हिन्दू इतिहास आदि को इसलामीकरण करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। आदम, मूसा, सुलेमान, ईशा आदि नवियो के नाम से कश्मीर के पुराने स्थान तथा गाथाओं का नाम- करण किया जाने लगा। यहाँ तक कि हिन्दू राजाओं का नाम भी बदल कर उन्हें मुसलमानी जामा पहना दिया गया। यह इसलिये किया गया कि नवीन बने मुसलमान तथा भावी सन्तानें हिन्दू इतिहास संस्कृत, सभ्यता को पूर्णतया भूलकर यही समझें कि कश्मीर में सनातन काल से इसलाम परम्परा कायम थी और उन्होंने हिन्दूधर्म त्याग कर मुसलमान बनकर कुछ बुरा नही किया है। बल्कि पुराने मूल मजहब में पुनः लौट आए हैं। जिसे कभी त्याग दिया था। सन्धिमति का राज प्राप्ति के पश्चात् राज त्याग कर चले जाने का उल्लेख है। सन्धिमति का राज- त्याग के पश्चात् सन्त होकर चले जाने का भी उल्लेख है। परन्तु उनका हुआ क्या ? वे कहाँ गये, कहाँ रहे तथा कहाँ मरे इतिहास के गर्भ में है। ईशामसीह का पता सूली पर चढ़ने के पश्चात् नही लगता। हाँ यह कहा जाता है कि उन्होंने यहूदियों के राजा होने की बात कही जिसके कारण तत्कालीन सत्ता तथा कानून के अनुसार उन्हें सूली पर चढ़ाया गया। सन्धिमति भी कश्मीर राज के कल्पित विद्रोहके नाम पर ही सूली का आलिंगन किया था। बाइबिल के समालोचकों में एक-मत ईशामसीह को ऐतिहासिक व्यक्ति जैसा वर्णन किया गया है नही मानता। रूसी वैज्ञानिकों ने 'डेडसी स्क्रोल' जिसमे बाइबिल लिखी है उसका अन्वेषण कर बताया है कि स्क्रोल का काल ईशा के कथित जन्म काल से पूर्व का है। ईशा तथा सन्धिमति के जीवन- काल तथा चरित्र मे इतना साम्य है कि अभी गवेषणा की आवश्यकता है। सन्धिमति के गुरु का नाम ईशान था। यह शब्द 'ईशा' से मिलता है। इस विषय पर बिना कुछ विशेष अध्ययन के कहना आधिकारिक ढंग मे ठीक न होगा। यदि ईशान को ही कुछ लेखकों ने ईशा नाम साम्य के कारण दिया होता तो बात कुछ दूसरी हो जाती। पाठभेद : श्लोक संख्या ९१ में 'दृष्टार्थः' का 'दृष्टार्थे'; 'तुर्य' का 'चतुर्थ' तथा 'पादार्थ' का पाठभेद पदार्थे' मिलता है । श्लोक संख्या ९२ में 'कथमे' का पाठभेद 'कार्यो मे' मिलता है ।

द्वितीय तरंग ४१७ तत्तत्कर्मव्यतिकरकृतः पारतन्त्र्यानुरोधा- त्सज्जाः सर्वे व्यवसितहठोन्मूलनाय प्रयत्नात् । चित्रं तत्राऽप्युदयति विधेः शक्तिरत्यद्भुतेयं यन्माहात्म्याद्विविधघटनासिद्धयो निर्निरोधाः ॥ ९३ ॥ ९३. “तत् तत् कर्म संसर्ग में संलग्न, सब लोग पारतन्त्र्य के अनुरोध से, सुनिश्चित (नियति) का प्रयत्न पूर्वक हठात् उन्मूलन हेतु समुद्यत होते हैं, किन्तु आश्चर्य है, वहां भी विधाता की यह अद्भुत शक्ति उदित हो जाती है। जिसके प्रभाव से, द्विविध घटना सिद्धियाँ निरोध रहित हो जाती हैं।” मणिपूरपुरे पार्थं निहतं समजीवयत् । फणिकन्याप्रभावेन सर्वाश्चर्यनिधिर्विधिः ॥ ९४ ॥ .९४. सभी आश्चर्यों के निधि विधि ने मणिपुर¹ में निहत पार्थ को नागकन्या² के प्रभाव से जीवित किया था । पादटिप्पणियाँ : महाभारत युद्ध के पश्चात्, महाराज युधिष्ठिर ९३. राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५०वाँ ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया । यज्ञीय अश्व के श्लोक है । साथ अर्जुन मणिपुर पहुँचे । बभ्रुवाहन ने अश्व पाठभेद : पकड़ लिया । जब उसे मालूम हुआ कि उसके पिता श्लोकसंख्या ९४ में 'वेन' का पाठभेद 'वेग' का अश्व है तो द्रव्यादि भेंट के साथ वापस कर दिया । मिलता है । पादटिप्पणियाँ: अर्जुन को पुत्र का यह कार्य कायरता पूर्ण प्रतीत हुआ । उसने धनादि लोटा दिया ! ९४ (१) मणिपुर : इस समय केन्द्रीय शासित प्रदेश है । इसका क्षेत्रफल २२१४६ वर्ग कीलो अर्जुन का व्यंग बभ्रुवाहन समझ गया । उसने मीटर है । भागवत पुराण (९:२२:३२) के अनुसार अपने मन्त्री सुबुद्धि से परामर्श कर अश्व पकड़ यहाँ की राजकन्या के गर्भ से अर्जुन पुत्र बभ्रुवाहन लिया । सेनापति सुमति के साथ अर्जुन पर आक्रमण हुआ था । किया । अर्जुन, ससैन्य केवल पराजित ही नही हुआ; (२) नागकन्या : मणिपुर के राजा चित्रवाहन उसे अपने प्राण भी गवाना पड़ा । अर्जुन की ओर थे । उनकी कन्या का नाम चित्रांगदा था । विवाह से कर्ण पुत्र वृषकेतु भी इस युद्ध में मारा गया था । अर्जुन के साथ हुआ था । उनका पुत्र बभ्रुवाहन था । गर्वोन्मत्त बभ्रुवाहन ने पिता के परास्त तथा पुत्र को अर्जुन ने चित्रवाहन को दे दिया । विवाह हत्या की बात माता चित्रांगदा से आकर कही । के समय चित्रवाहन ने शर्त रखी थी । चित्रांगदा से चित्रांगदा पति की मृत्यु का समाचार सुनकर, विलाप उत्पन्न पुत्र, उसका राजवंश चलायेगा । चित्रवाहन करने लगी । अर्जुन के शव के साथ सती होने का नाना होते भी बभ्रुवाहन का धर्मपिता था । यह निश्चय किया । बभ्रुवाहन को पितृ-हत्या के दोष मणिपुर का कालान्तर में राजा हुआ । ( म० आ० का अपराध मालूम पड़ा । वह भी आत्महत्या करने २०६:२४-२६; २०७:२१-३३ ) पर तत्पर हो गया । ५३

४१८ राजतरंगिणी द्रोणपुत्रास्त्रनिर्दग्धं मातुर्गर्भे परिक्षितम् । जीवयन्कृष्णमाहात्म्याद्दाता धुर्योऽधिकारिणाम् ॥ ९५ ॥ ९५. द्रोण-पुत्रास्त्र¹ से माता के गर्भ में दग्ध परिक्षित² को कृष्ण के माहात्म्य से जीवित³ करता हुआ विधाता अधिकारियों में अग्रणी हुआ ।”

उलूपी नागकन्या थी । उसका पिता कौरव्य नाग था । वह बालविधवा थी । अर्जुन ने उससे गन्धर्व विवाह किया था । पति की मृत्यु का समाचार सुनी । दुःखी आयी । चित्रांगदा को सान्त्वना दी । बभ्रुवाहन ने पिता तथा माता की जीवन रक्षा का उपाय विमाता से पूछा । उलूपी ने बताया । यदि शेष नाग से मृत संजीवन मणि लायी जाय तो अर्जुन जीवित हो सकता है । बभ्रुवाहन शेषनाग के पास गया । मणि मागा । अन्य नागो की मंत्रणा पर शेष नाग ने मणि देना अस्वीकार कर दिया । बभ्रुवाहन का शेषनाग से युद्ध हुआ । शेषनाग युद्ध में पराजित हो गया । बभ्रुवाहन मणि लेकर शव के समीप आया । अर्जुन का शव मस्तक हीन उसने देखा । हताश हो गया । परन्तु कृष्ण अपने पुण्य प्रभाव से मस्तक पुनः लाये । उसका शव से सन्धि कर दिया गया । अर्जुन जीवित होगये । ( जै० प्र० ३७:२१-४०, म० आश्व० ७९-९०) महाभारत में यह कथा दूसरो तरह से दी गयी है । वहाँ यह वर्णन मिलता है । बभ्रुवाहन ने अपनी विमाता उलूपी के अस्त्रो-शस्त्रों द्वारा अर्जुन को युद्ध में मूर्छित किया था । यह घटना सुनकर चित्रांगदा ने सपत्नी उलूपी की निर्भर्त्सना की । उलूपी को अपनी भूल का ज्ञान हुआ । उसने बभ्रुवाहन को मृत संजीवक मणि दी । बभ्रुवाहन ने अर्जुन के वक्ष स्थल पर मणि रखकर पिता को जीवित किया । (म० आश्व० ८१:१-१०, ९०:१ ) ९५ (१) द्रोणपुत्र . अश्वत्थामा से यहाँ तात्पर्य है । अश्वत्थामा चिरंजीवियों में एक है । (२) परिक्षित • उत्तरा के गर्भ से उत्पन्न अभिमन्यु का पुत्र था । महाराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण

की मृत्यु के पश्चात् ३६ वर्ष राज्य किया । राज्य- सिंहासन पर बैठने के समय परिक्षित की आयु ३६ वर्ष थी । इसकी पत्नी का नाम भद्रवती किंवा भाद्रवती था । उनके चार पुत्र जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन तथा भीमसेन थे । कृपाचार्य को ऋत्विज बनाकर भागीरथी के तटपर इसने ३ अश्वमेध यज्ञ किये थे । इसका देहावसान ९६ वर्ष की अवस्था में हुआ था । इसने ६० वर्ष राज्य किया था । ( दे० भा० २:८ ) कृष्ण की मृत्यु के पश्चात् कलि ने पृथ्वी में प्रवेश किया । शूद्र रूप धारण कर वह पशु आदि की हत्या करने लगा । कलि को समाप्त करने के लिए परिक्षित उद्यत हो गया । कलि राजा परिक्षित की शरण में आया । निवास के लिये स्थान पूछने पर द्यूत, मद्य, व्यभिचार, हिंसा तथा सुवर्ण पाच स्थानों में रहने के लिये राजा ने आदेश दिया । धर्म तथा पृथिवी को संतोष हुआ । (भा० : १ : १६:१७) मृगया निमित्त एक समय परिक्षित वन में गये । उन्हें प्यास लगी । जल ढूँढने लगे । शमीक मुनि के आश्रम में पहुँचे । मुनि ध्यानस्थ थे । वह राजा का आना जान न सके । जल की याचना सुन न सके । राजा को क्रोध आया । उसने पास ही पड़े, एक मृत सर्प को मुनि के गले में डाल दिया । वापस चला गया । ( म० आ० ३६:१७-२१ ) शमीक के पुत्र शृंगी ऋषि को यह बात ज्ञात हुई । उसने शाप दिया । गले में साँप डालने वाले की मृत्यु सात दिन पश्चात् सर्प दंश से हो जायगी । शमीक के पुत्र का नाम कहीं-कहीं 'गविजात' भी दिया गया है । शमीक को शाप की बात ज्ञात हुई । मुनि को दुःख हुआ । पुत्र की भर्त्सना की । अपने शिष्य

गौरमुख से शाप की बात परिक्षित को बताने के लिये भेजा । ( म० भा० ३८:१३-२८ ) तक्षक नाग यथा समय परिक्षित को दंश करने के लिये प्रस्थान किया । मार्ग में कश्यप मान्त्रिक मिला । वह नाग का विष उतारने परिक्षित के पास जा रहा था । तक्षक ने उसे यथेष्ट धन देकर, वापस कर दिया । निश्चित समय पर तक्षक द्वारा सर्पदंश के कारण परिक्षित की मृत्यु हो गयी । ( म० आ० ३६-४०, ४५-४७ दे० भा० २:८-१० ) भागवत पुराण के अनुसार तक्षक ने ब्राह्मण रूप धर कर परिक्षित के राजभवन में प्रवेश किया था । तक्षक परिक्षित के समीप पहुँचते ही, तत्काल नागस्वरूप धारण कर, उसकी हत्या का कारण हुआ । ( भा० १२:६ ) महाभारत में यह कथा दूसरी प्रकार से दी गयी है । तक्षक ने कतिपय नागों को फल, पुष्प देकर परिक्षित के पास भेजा । एक फल में सूक्ष्म रूप कीड़ा बनकर बैठ गया । तपस्वी वेशधारी नाग परिक्षित के द्वार पर फल पुष्प भेंट करने की अनुमति माँगने लगे । परिक्षित ने उनके फल को स्वीकार किया । एक बड़ा फल स्वयं ले लिया । शेष अपने मित्रो को दे दिया । परिक्षित ने फल फोड़ा । उसमे से एक लाल कीड़ा निकला । उसे देखकर परिक्षित ने व्यंगपूर्वक कहा—'सूर्य अस्ताचल जा रहा है । सातवाँ दिन पूरा हो रहा है । कहीं यही न तक्षकराज बन जाय ?' परिक्षित उस कीड़े को अपनी गर्दन पर लेकर जैसे खेलने लगा । परन्तु तत्काल वह कीड़ा तक्षक नाग बन गया । उसके शरीर से लिपट गया । परिक्षित सर्पदंस से तत्काल मर गया । पुराणों के अनुसार परिक्षित जन्म से मगध देश के राजा महापद्म का समय १५०० वर्षों का होता है । (मत्स्य० २७३:३६) विष्णु पुराण में 'ज्ञेय' का 'शतं' पाठ मानकर यह अवधि एक हजार एकसौ पन्द्रह वर्षों की निश्चित की गयी है । (विष्णु० : ४:२४:३२ )

( ३ ) जीवित करना—परिक्षित उत्तरा के गर्भ में था । महाभारत में दुर्योधन कौरवों से परा- जित हो गया था । केवल अश्वत्थामा शेष रह गया था । वह पाण्डवद्रोही था । रात्रि में द्रोपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी । उसने इसी प्रकार सूत, सोम, धृष्टद्युम्न, शिखंडी आदि अनेक वीरों का नाश किया । प्रसन्न अश्वत्थामा दुर्योधन के समीप गया । दुर्योधन घायल था । तड़प रहा था । भारतीय युद्ध की सम्पूर्ण सेना में केवल पाँच पाण्डव, श्री कृष्ण पाण्डव पक्ष के तथा कौरव पक्ष के केवल तीन अश्वत्थामा, कृपाचार्य एवं कृतवर्मा जीवित बच गये थे । द्रौपदी के पुत्रो आदि की हत्या सुनकर दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ । सुखपूर्वक प्राण विसर्जन किया । द्रौपदी अत्यन्त दुःखी हुई । उसने प्रतिज्ञा की । अश्वत्थामा के मस्तक की मणि निकालकर यदि युधिष्ठिर के मस्तक पर वह न देखेगी तो प्राण त्याग देगी । भीम ने मणि प्राप्त हेतु अश्वत्थामा पर आक्रमण कर दिया । ( म. सौ. ८, ९ ११ ) अश्वत्थामा चिरंजीवी था । भीमसेन का उसे हराना कठिन था । अतएव श्री कृष्ण, अर्जुन के साथ भीम की सहायता के लिए गये । पाण्डवों के नाश हेतु अश्वत्थामा ने ब्रह्माशीर नामक अस्त्र का प्रयोग किया । उसके प्रतिकार निमित्त अर्जुन ने भी वही अस्त्र छोड़ा । पृथ्वी जलने लगी । व्यासादि मुनियों ने अश्वत्थामा को पाण्डवो के शरण जाने के लिये कहा । उसने अपने अस्त्र को लौटाना स्वीकार नही किया । किन्तु मणि देने पर उद्यत हो गया । उत्तरा के गर्भस्थ परिक्षित पर उसने अस्त्र छोड़ा । अस्त्र के कारण गर्भस्थ शिशु जलने लगा । उत्तरा ने भगवान् का स्मरण किया । भगवान् ने शिशु की रक्षा की । विष्णु का नाम इसलिये "विष्णु- रात" पड़ गया । महाँ भारत के अनुसार कुरु वंश के परिक्षीण होने पर इसने जन्म लिया था । अतएव परिक्षित नाम पड़ा था । ( म० अश्व० ७० : १० )

४२२ राजतरंगिणी उद्घाटिततमोरिः स ततः पितृवनावने । ददर्श योगिनीस्तेजःपरिवेषान्तरस्थिताः ॥ १०० ॥ १००. तदुपरान्त उसने गवाक्ष खोलकर श्मशान भूमि पर तेज के परिवेश में स्थित योगिनियों को देखा। तासां संभ्रममालक्ष्य कङ्कालं चापवादितम् । ईशानस्तां श्मशानोर्वी धृतासिश्चकितो ययौ ॥ १०१ ॥ १०१. उनके सम्भ्रम एवं अपहृत कंकाल को देखकर तलवार लिये चकित ईशान उस श्मशान पर गया । अथाऽपश्यत्तरुच्छन्नः शायितं मण्डलान्तरे । सन्धीयमानसर्वाङ्गं कङ्कालं योगिनीगणैः ॥ १०२ ॥ १०२. तत्पश्चात् वृक्ष के ओट से उसने देखा कि योगिनियाँ मध्य में कंकाल को सुलाकर सब अंगो को जोड़ रही थीं। उल्लसद्वरसम्भोगवाञ्छा मद्यपदेवताः । वीरालाभान्समन्विष्य कङ्कालं तमपाहरन् ॥ १०३ ॥ १०३. वर सम्भोग की उत्कट कामना वश उन मद्यप योगिनियों ने किसी वीर (पुरुष) के अभाव में खोजकर उस कंकाल का अपहरण कर लिया । एकमेकं स्वमङ्गं च विनिधाय क्षणादथ । कुतोऽप्यानोय पुंलक्ष्म्म पूर्णाङ्गं तं प्रचक्रिरे ॥ ०४ ॥ १०४. अपने एक-एक अंग को रखकर और कहीं से पुंलक्ष्म्म ( शिश्न ) लाकर, उसे सर्वांग पूर्ण कर दिया । जोनराज ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है। अलग-अलग कर दिया गया है। इससे अर्थ में अपहृतताडनाइण्डघण्टानाशण्ठटांकृतम् । विप्रतिपत्ति नहीं होती है। मनांसि न पुनस्तेषां वीराणां माह्यमस्पृशन् ॥ पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या १०१ में 'मालक्ष्य' का पाठभेद 'मावर्य्य' मिलता है। श्लोक संख्या १०० में 'ददर्श' का 'दर्शयन्' तथा श्लोक संख्या १०३ में 'सम्भोग' का 'संयोग' 'स्थिताः' का पाठभेद 'स्थितः' मिलना है। 'मद्यप-देवता' का 'मध्यमदेवता' 'मुद्यमदेवताः पादटिप्पणियाँ : तथा 'तमपाहरन्' का पाठभेद 'तमुपाहरन्' मिलता है। श्लोक संख्या ९९ और १०० का अनुवाद श्री श्लोक संख्या १०४ में 'कुतो' का 'ततो' तथा स्टीन, श्री पण्डित तथा अन्य अनुवादकों ने एक 'पुंलक्ष्म्म' का पाठभेद 'पुलिङ्ग' मिलता है। साथ ही किया है। यहाँ पर दोनो श्लोकों का अनुवाद

द्वितीय तरंग ४१९ गौरमुख से शाप की बात परिक्षित को बताने के लिये भेजा। (म० आ० ३८:१३-२८) तक्षक नाग यथा समय परिक्षित को दंश करने के लिये प्रस्थान किया। मार्ग में कश्यप मान्त्रिक मिला। वह नाग का विष उतारने परिक्षित के पास जा रहा था। तक्षक ने उसे यथेष्ट धन देकर, वापस कर दिया। निश्चित समय पर तक्षक द्वारा सर्पदंस के कारण परिक्षित की मृत्यु हो गयी। (म० आ० ३६-४०, ४५-४७ दे० भा० २:८-१०) भागवत पुराण के अनुसार तक्षक ने ब्राह्मण रूप धर कर परिक्षित के राजभवन में प्रवेश किया था। तक्षक परिक्षित के समीप पहुँचते ही, तत्काल नागस्वरूप धारण कर, उसकी हत्या का कारण हुआ। (भा० १२:६) महाभारत मे यह कथा दूसरी प्रकार से दी गयी है। तक्षक ने कतिपय नागों को फल, पुष्प देकर परिक्षित के पास भेजा। एक फल में सूक्ष्म रूप कीड़ा बनकर बैठ गया। तपस्वी वेशधारी नाग परिक्षित के द्वार पर फल पुष्प भेंट करने की अनुमति मांगने लगे। परिक्षित ने उनके फल को स्वीकार किया। एक बड़ा फल स्वयं ले लिया। शेष अपने मित्रो को दे दिया। परिक्षित ने फल फोड़ा। उसमे से एक लाल कीड़ा निकला। उसे देखकर परिक्षित ने व्यंगपूर्वक कहा—'सूर्य अस्ताचल जा रहा है। सातवाँ दिन पूरा हो रहा है। कहीं यही न तक्षकराज बन जाय?' परिक्षित उस कीड़े को अपनी गर्दन पर लेकर जैसे खेलने लगा। परन्तु तत्काल वह कोड़ा तक्षक नाग बन गया। उसके शरीर से लिपट गया। परिक्षित सर्पदंस से तत्काल मर गया। पुराणों के अनुसार परिक्षित जन्म से मगध देश के राजा महापद्म का समय १५०० वर्षों का होता है। (मत्स्य० २७३:३६) विष्णु पुराण में 'ज्ञेय' का 'शत' पाठ मानकर यह अवधि एक हजार एकसो पन्द्रह वर्षों की निश्चित की गयी है। (विष्णु० : ४:२४:३२) (३) जीवित करना—परिक्षित उत्तरा के गर्भ में था। महाभारत में दुर्योधन कौरवों से परा- जित हो गया था। केवल अश्वत्थामा शेष रह गया था। वह पाण्डवद्रोही था। रात्रि में द्रोपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी। उसने इसी प्रकार सूत, सोम, धृष्टद्युम्न, शिखंडी आदि अनेक वीरों का नाश किया। प्रसन्न अश्वत्थामा दुर्योधन के समीप गया। दुर्योधन घायल था। तड़प रहा था। भारतीय युद्ध की सम्पूर्ण सेना में केवल पाँच पाण्डव, श्री कृष्ण पाण्डव पक्ष के तथा कौरव पक्ष के केवल तीन अश्वत्थामा, कृपाचार्य एवं कृतवर्मा जीवित बच गये थे। द्रौपदी के पुत्रों आदि की हत्या सुनकर दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ। सुखपूर्वक प्राण विसर्जन किया। द्रौपदी अत्यन्त दुःखी हुई। उसने प्रतिज्ञा की। अश्वत्थामा के मस्तक की मणि निकालकर यदि युधिष्ठिर के मस्तक पर वह न देखेगी तो प्राण त्याग देगी। भीम ने मणि प्राप्त हेतु अश्वत्थामा पर आक्रमण कर दिया। (म. सौ. ८,९ ११) अश्वत्थामा चिरंजीवी था। भीमसेन का उसे हराना कठिन था। अतएव श्री कृष्ण, अर्जुन के साथ भीम की सहायता के लिए गये। पाण्डवों के नाश हेतु अश्वत्थामा ने ब्रह्मशीर नामक अस्त्र का प्रयोग किया। उसके प्रतिकार निमित्त अर्जुन ने भी वही अस्त्र छोड़ा। पृथ्वी जलने लगी। व्यासादि मुनियों ने अश्वत्थामा को पाण्डवों के शरण जाने के लिये कहा। उसने अपने अस्त्र को लौटाना स्वीकार नहीं किया। किन्तु मणि देने पर उद्यत हो गया। उत्तरा के गर्भस्थ परिक्षित पर उसने अस्त्र छोड़ा। अस्त्र के कारण गर्भस्थ शिशु जलने लगा। उत्तरा ने भगवान् का स्मरण किया। भगवान् ने शिशु की रक्षा की। विष्णु का नाम इसलिये "विष्णु- रात" पड़ गया। यहाँ भारत के अनुसार कुरु वंश के परिक्षीण होने पर इसने जन्म लिया था। अतएव परिक्षित नाम पड़ा था। (म० अश्व० ७० : १०)

४१८ राजतरंगिणी द्रोणपुत्रास्त्रनिर्दग्धं मातर्गर्भे परिक्षितम् । जीवयन्कृष्णमाहात्म्यादाता धुर्योऽधिकारिणाम् ॥ ९५ ॥ ९५. द्रोण-पुत्रास्त्र १ से माता के गर्भ में दग्ध परिक्षित २ को कृष्ण के माहात्म्य से जीवित ३ करता हुआ विधाता अधिकारियों में अग्रणी हुआ ।” उलूपी नागकन्या थी । उसका पिता कौरव्य नाग था । वह बालविधवा थी । अर्जुन ने उससे गन्धर्व विवाह किया था । पति की मृत्यु का समाचार सुनी । दुःखी आयी । चित्रांगदा को सान्त्वना दी । बभ्रुवाहन ने पिता तथा माता की जीवन रक्षा का उपाय विमाता से पूछा । उलूपी ने बताया । यदि शेष नाग से मृत संजीवन मणि लायी जाय तो अर्जुन जीवित हो सकता है । बभ्रुवाहन शेषनाग के पास गया । मणि मागा । अन्य नागो की मंत्रणा पर शेष नाग ने मणि देना अस्वीकार कर दिया । बभ्रुवाहन का शेषनाग से युद्ध हुआ । शेषनाग युद्ध में पराजित हो गया । बभ्रुवाहन मणि लेकर शव के समीप आया । अर्जुन का शव मस्तक हीन उसने देखा । हताश हो गया । परन्तु कृष्ण अपने पुण्य प्रभाव से मस्तक पुनः लाये । उसका शव से सन्धि कर दिया गया । अर्जुन जीवित होगये । ( जै० प्र० ३७:२१-४०, म० आश्व० ७९-९०) महाभारत में यह कथा दूसरो तरह से दी गयी है । वहाँ यह वर्णन मिलता है । बभ्रुवाहन ने अपनी विमाता उलूपी के अस्त्रों-शस्त्रो द्वारा अर्जुन को युद्ध में मूच्छित किया था । वह घटना सुनकर चित्रांगदा ने सपत्नी उलूपी को निर्भर्त्सना की । उलूपी को अपनी भूल का ज्ञान हुआ । उसने बभ्रुवाहन को मृत संजीवक मणि दी । बभ्रु वाहन ने अर्जुन के वक्ष स्थल पर मणि रखकर पिता को जीवित किया । (म० आश्व० ८१:९-१०, ९०:१ ) ९५ (१) द्रोणपुत्र : अश्वत्थामा से यहाँ तात्पर्य है । अश्वत्थामा चिरंजीवितों में एक है । (२) परिक्षित : उत्तरा के गर्भ से उत्पन्न अभिमन्यु का पुत्र था । महाराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण की मृत्यु के पश्चात् ३६ वर्ष राज्य किया । राज्य- सिंहासन पर बैठने के समय परिक्षित की आयु ३६ वर्ष थी । इसकी पत्नी का नाम भद्रवती किंवा भाद्रवती था । उनके चार पुत्र जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन तथा भीमसेन थे । कृपाचार्य को ऋत्विज बनाकर भागीरथी के तटपर इसने ३ अश्वमेध यज्ञ किये थे । इसका देहावसान ९६ वर्ष की अवस्था में हुआ था । इसने ६० वर्ष राज्य किया था । ( दे० भा० २:८ ) कृष्ण की मृत्यु के पश्चात् कलि ने पृथ्वी में प्रवेश किया । शूद्र रूप धारण कर वह पशु आदि की हत्या करने लगा । कलि को समाप्त करने के लिए परिक्षित उद्यत हो गया । कलि राजा परिक्षित की शरण में आया । निवास के लिये स्थान पूछने पर जूआ, मद्य, व्यभिचार, हिंसा तथा स्वर्ण पाच स्थानों में रहने के लिये राजा ने आदेश दिया । धर्म तथा पृथ्वी को संतोष हुआ । (आ० : १ : १६:१७) मृगया निमित्त एक समय परिक्षित वन में गये । उन्हें प्यास लगी । जल ढूढ़ने लगे । ऋचीक मुनि के आश्रम में पहुँचे । मुनि ध्यानस्थ थे । वह राजा का आना जान न सके । जल की याचना सुन न सके । राजा को क्रोध आया । उसने पास ही पड़े, एक मृत सर्प को मुनि के गले में डाल दिया । वापस चला गया । ( म० आ० ३६:१७-२१ ) शमीक के पुत्र श्रृंगी ऋषि को यह बात ज्ञात हुई । उसने शाप दिया । गले में साँप डालने वाले की मृत्यु सात दिन पश्चात् सर्प दंश से हो जायगी । शमीक के पुत्र का नाम कही-कही 'गविजात' भी दिया गया है । शमीक को शाप की बात ज्ञात हुई । मुनि को दुःख हुआ । पुत्र की भर्त्सना की । अपने शिष्य

द्वितीय तरंग ४१९ गौरमुख से शाप की बात परीक्षित को बताने के लिये भेजा । ( म० आ० ३८:१३-२८ ) तक्षक नाग यथा समय परीक्षित को दंश करने के लिये प्रस्थान किया । मार्ग में कश्यप मान्त्रिक मिला । वह नाग का विष उतारने परीक्षित के पास जा रहा था । तक्षक ने उसे यथेष्ट धन देकर, वापस कर दिया । निश्चित समय पर तक्षक द्वारा सर्पदंस के कारण परीक्षित की मृत्यु हो गयी । ( म० आ० ३६-४०, ४५-४७ दे० भा० २:८-१० ) भागवत पुराण के अनुसार तक्षक ने ब्राह्मण रूप धर कर परीक्षित के राजभवन में प्रवेश किया था । तक्षक परीक्षित के समीप पहुँचते ही, तत्काल नागस्वरूप धारण कर, उसकी हत्या का कारण हुआ । ( भा० १२:६ ) महाभारत में यह कथा दूसरी प्रकार से दी गयी है । तक्षक ने कतिपय नागों को फल, पुष्प देकर परीक्षित के पास भेजा । एक फल में सूक्ष्म रूप कीड़ा बनकर बैठ गया । तपस्वी वेशधारी नाग परीक्षित के द्वार पर फल पुष्प भेंट करने की अनुमति माँगने लगे । परीक्षित ने उनके फल को स्वीकार किया । एक बड़ा फल स्वयं ले लिया । शेष अपने मित्रों को दे दिया । परीक्षित ने फल फोड़ा । उसमें से एक लाल कीड़ा निकला । उसे देखकर परीक्षित ने व्यंगपूर्वक कहा—'सूर्य अस्ताचल जा रहा है । सातवाँ दिन पूरा हो रहा है। कहीं यही न तक्षकराज बन जाय ?' परीक्षित उस कीड़े को अपनी गर्दन पर लेकर जैसे खेलने लगा । परन्तु तत्काल वह कीड़ा तक्षक नाग बन गया । उसके शरीर से लिपट गया । परीक्षित सर्पदंस से तत्काल मर गया । पुराणों के अनुसार परीक्षित जन्म से मगध देश के राजा महापद्म का समय १५०० वर्षों का होता है । (मत्स्य० २७३:३६) विष्णु पुराण में 'ज्ञेय' का 'शत' पाठ मानकर यह अवधि एक हजार एकसौ पन्द्रह वर्षों की निश्चित की गयी है । (विष्णु० : ४:२४:३२ ) ( ३ ) जीवित करना—परीक्षित उत्तरा के गर्भ में था । महाभारत में दुर्योधन कौरवों से परा- जित हो गया था । केवल अश्वत्थामा शेष रह गया था । वह पाण्डवद्रोही था । रात्रि में द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी । उसने इसी प्रकार सूत, सोम, धृष्टद्युम्न, शिखंडी आदि अनेक वीरों का नाश किया । प्रसन्न अश्वत्थामा दुर्योधन के समीप गया । दुर्योधन घायल था । तड़प रहा था । भारतीय युद्ध की सम्पूर्ण सेना में केवल पाँच पाण्डव, श्री कृष्ण पाण्डव पक्ष के तथा कौरव पक्ष के केवल तीन अश्वत्थामा, कृपाचार्य एवं कृतवर्मा जीवित बच गये थे । द्रौपदी के पुत्रों आदि की हत्या सुनकर दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ । सुखपूर्वक प्राण विसर्जन किया । द्रौपदी अत्यन्त दुःखी हुई । उसने प्रतिज्ञा की । अश्वत्थामा के मस्तक की मणि निकालकर यदि युधिष्ठिर के मस्तक पर वह न देखेगी तो प्राण त्याग देगी । भीम ने मणि प्राप्त हेतु अश्वत्थामा पर आक्रमण कर दिया । ( म. सौ. ८, ९ ११ ) अश्वत्थामा चिरंजीवी था । भीमसेन का उसे हराना कठिन था । अतएव श्री कृष्ण, अर्जुन के साथ भीम की सहायता के लिए गये । पाण्डवों के नाश हेतु अश्वत्थामा ने ब्रह्मशीर नामक अस्त्र का प्रयोग किया । उसके प्रतिकार निमित्त अर्जुन ने भी वही अस्त्र छोड़ा । पृथ्वी जलने लगी । व्यासादि मुनियों ने अश्वत्थामा को पाण्डवों के शरण जाने के लिये कहा । उसने अपने अस्त्र को लौटाना स्वीकार नहीं किया । किन्तु मणि देने पर उद्यत हो गया ।

४२० राजतरंगिणी कचं भस्मीकृतं दैत्यैर्नागांस्ताक्ष्यैण भक्षितान् । पुनर्जीवयितुं को वा दैवादन्यः प्रगल्भते ॥९६॥ ९६. दैत्यों द्वारा भस्मी कृत कच१ एवं ताक्ष्यै२ भक्षित नागों को पुनः जीवित करने के लिये दैव के अतिरिक्त और कौन समर्थ हुआ ?

एक मत है कि परिक्षित जन्म लेते ही अपने रक्षक भगवान् की खोजने लगा । अस्तु 'परि+इक्ष' नाम प्राप्त किया । ( भा० १ : १२ : १० ) इस सन्धि के अनुसार नाम 'परीक्षित' होना चाहिए। परन्तु महाभारत में सर्वत्र नाम परिक्षित ही व्यवहृत हुआ है। कल्हण ने भी नाम 'परिक्षित' ही दिया है। मैंने भी यही नाम दिया है। भागवत पुराण में यह कथा और तरह से हो गयी है। अश्वत्थामा ने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिये द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी। अर्जुन ने अश्वत्थामा को बन्दी बना लिया। उसे द्रौपदी के सम्मुख उपस्थित किया। द्रौपदी ने अश्वत्थामा को ब्राह्मण पुत्र के कारण उसे छोड़ देने के लिये अर्जुन से कहा। उसने अश्वत्थामा के चूडामणि को ले लेना पर्याप्त प्रतिशोध माना। ( भाग० १०:७१:४५, ४६, ४७ ) ९६ ( १ ) कच : कच देवगुरु बृहस्पति के पुत्र थे। उनकी माता का नाम नही पता चलता । कच देवयानी कथा प्रसिद्ध है । कच असुर गुरु शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या सीखने के लिये सुरों द्वारा भेजे गये थे। कच ने इसे रहस्यमय ढंग से गोपनीय रखा। दैत्यों ने समझ लिया कि कच संजीवनी विद्या प्राप्त करने के लिये आया था। कच को मार डालने का निश्चय दैत्यों ने किया। एक दिन कच गुरु की गाय चरा रहा था। राक्षसों ने कच का टुकड़े-टुकड़े कर डाला। शृगालों को खिला दिया। शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या का प्रयोग किया। तत्काल कच शृगालों के शरीर से सजीव निकल आये।

दूसरी बार वह एक अरण्य में गया था। असुरों ने कच के टुकड़े टुकड़े काटकर समुद्र में फेंक दिये किन्तु शुक्राचार्य से देवयानी ने पुनः जीवित करने का निवेदन किया। संजीवनी प्रयोग से पुनः कच का शरीर जीवित हो गया। तीसरी बार असुरों ने कच को मारकर उसका चूर्ण बना डाला। उस चूर्ण को सुरा में मिलाकर शुक्राचार्य को पिला दिया। ज्ञात होने पर शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या के प्रभाव से उसे पुकारा। उसने गुरु के उदर से ही उत्तर दिया—'वह उदर में है।' शुक्राचार्य ने कहा—'बाहर आओ।' वह बाहर आने के लिये तैयार न हुआ। उत्तर दिया: 'मैं गुरु हत्या का दोषी कैसे हो सकता हूँ।' देवयानी कच से अत्यन्त प्रेम करती थी। उसने पिता से कच की रक्षा के लिये आग्रह किया। शुक्राचार्य ने कहा—'कच के प्राप्त होने पर मेरी मृत्यु हो जायगी।' देवयानी ने दोनों में से किसी का मरना स्वीकार नहीं किया। विवश होकर शुक्राचार्य ने उदर स्थित कच को संजीवनी विद्या सिखायी। उसे समझा दिया। वह पहले जी जायगा। तत्पश्चात् बाहर आकर मरे हुए उसे संजीवनी विद्या के प्रयोग से जिला दे। कच ने यही किया। किन्तु गुरु कन्या होने के कारण कच ने देवयानी को बहन तुल्य माना। उससे विवाह करना अस्वीकार कर दिया। देवयानी ने उसे शाप दिया। संजीवनी विद्या उसे फलप्रद नहीं होगी। कच ने गुरु कन्या और बहन समझकर उसे प्रतिशाप नहीं दिया। परन्तु कहा—मैं यह विद्या दूसरे को सिखा दूँगा। वह प्रयोग करेगा। मेरा प्रयोजन सिद्ध हो जायगा।

द्वितीय तरंग ४२१ इत्युक्तवा भाविनोऽर्थस्य द्रष्टुं सिद्धिं समुद्यतः । तत्रैव बद्धवसतिः कङ्कालं स ररक्ष तम् ॥९७॥ ९७. इस प्रकार कह कर भावी अर्थ की सिद्धि देखने को समुद्यत उसने वहीं पर निवास करते हुए उस कंकाल को रक्षित किया। अथार्धरात्रे निर्निद्रस्तस्यैवाद्भुतचिन्तया । धूपाधिवासमीशानो घ्रातवान्दिव्यमेकदा ॥ ९८ ॥ ९८. एक समय उसी अद्भुत चिन्ता में निद्रारहित ईशान ने अर्धरात्रि में दिव्य धूपगन्ध का अनुभव किया। उच्चण्डलाडनादण्डोद्घृष्टघण्टौघटांकृतैः । चण्डैर्डमरुनिर्घोषैर्घर्घरं श्रुतवान्ध्वनिम् ॥ ९९ ॥ ९९. दीर्घ ताडन दण्ड ताडित घण्टों के नादों एवं भयंकर डमरु निर्घोषों से घर्घर ध्वनि सुना। (२) तार्क्ष्य : जीमूतवाहन द्वारा नागों के जीवित करने का उल्लेख कथासरित्सागर में सरल शैली में कश्मीरी कवि सोमदेव ( ग्यारहवीं शताब्दी ) ने वर्णन किया है। सोमदेव कवि क्षेमेन्द्र का सम- कालीन था। तार्क्ष्य नाम के अनेक व्यक्ति हुए हैं। ऋग्वेद में तार्क्ष्य एक अश्व का नाम है। (ऋ० १:८९:६; १०:१७८) त्रसदस्यु का यह वंश माना गया है। (ऋ० ८:२२:७ ) तार्क्ष्य को एक पक्षी या वायम कहा गया है। उसे वैपश्चित नामक पक्षियों का राजा कहा गया है। अरिष्टनेमि का एक पैतृक नाम तार्क्ष्य है। तार्क्ष्य एक आचार्य भी थे ( ए. ब्रा. ३:१:६, सां. ब्रा. ७:१९ ) कश्यप प्रजापति का नामान्तर तार्क्ष्य है। दक्ष ने इसे अपनी कन्याएँ दी थीं। सरस्वती से इनका सम्भाषण हुआ था। ( म. व. १८४: तथा १८६ ) यह कश्यप तथा विनता का पुत्र तथा गरुड का भाई था। ( म० आ० ६५:४० ) भगवान् शिव का भी एक नाम तार्क्ष्य कहा गया है। ( अनु०:१७:९८) तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, गरुड, अरुण, अरुणी तथा वारुणी विनता के पुत्र हैं। कद्रू के पुत्र शेष, अनन्त आदि नाग हैं। विनता एवं कद्रू सपत्नियां हैं। उनमें वैमनस्य तथा शत्रुता स्वाभाविक है। उनकी लड़ाई प्रसिद्ध है। इसी प्रकार उनकी सन्तानें भी परस्पर एक दूसरे से शत्रुता रखती थीं। पाठभेद : श्लोक संख्या ९८ में 'मेकदा' का पाठभेद 'मेकतः मिलता है। श्लोक संख्या ९९ में 'उच्च' का 'उच्च' 'लाडना' का 'वादना' 'ताडना', 'वदना' तथा 'डमरु-निर्घोषै' का पाठभेद 'डमरुघोप्यैश्च' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ९९ (१) लाडन दण्ड : ताडन का अर्थ आघात करना होता है। ताडन दण्ड घण्टा बजाने की मुगरी अथवा लकड़ी का बना दण्ड अर्थात् दण्ड समान वस्तु थी। जापानी घंटा में डण्डा रस्सी में बँधा रहता है। वह गोल घंटा पर आघात करता है। भारतीय मन्दिरों तथा चर्च में घण्टों में लोलक भीतर लगे रहते हैं। एक घण्टा साधारण मोटे चद्दर अष्ट धातु का होता है। उसे मुगरी या लकड़ी से ठोक कर बजाते हैं।

४२२ राजतरंगिणी उद्घाटिततमोरेः स ततः पितृवनावभो । ददर्श योगिनीस्तेजःपरिवेषान्तरस्थिताः ॥ १०० ॥ १००. तदुपारन्त उसने गवाक्ष खोलकर श्मशान भूमि पर तेज के परिवेश में स्थित योगिनियों को देखा । तासां संभ्रममालक्ष्य कङ्कालं चापवाहितम् । ईशानस्तां श्मशानोर्वी धृतासिश्चकितो ययौ ॥ १०१ ॥ १०१. उनके सम्भ्रम एवं अपहृत कंकाल को देखकर तलवार लिये चकित ईशान उस श्मशान पर गया । अथाऽपश्यत्तरुच्छन्नः शायितं मण्डलान्तरे । सन्धीयमानसर्वाङ्गं कङ्कालं योगिनीगणैः ॥ १०२ ॥ १०२. तत्पश्चात् वृक्ष के ओट से उसने देखा कि योगिनियाँ मध्य में कंकाल को सुलाकर सब अंगो को जोड़ रही थीं । उल्लसद्दूरसंभोगवाञ्छा मद्यपदेवताः । वीरालाभात्समान्विष्य कङ्कालं तमपाहरन् ॥ १०३ ॥ १०३. वर सम्भोग की उत्कट कामना बस उन मद्यप योगिनियों ने किसी वीर (पुरुष) के अभाव में खोजकर उस कंकाल का अपहरण कर लिया । एकमेकं स्वमङ्गं च विनिधाय क्षणादथ । कुतोऽप्यानीय पुंलक्ष्म पूर्णाङ्गं तं प्रचक्रिरे ॥ ०४ ॥ १०४. अपने एक-एक अंग को रखकर और कहीं से पुंलक्ष्म ( शिश्न ) लाकर, उसे सर्वांग पूर्ण कर दिया । जोनराज ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है। अलग-अलग कर दिया गया है। इससे अर्थ में अचलह्यावनादण्डघण्टानाखण्डशंकृतम् । विप्रतिपत्ति नहीं होती है। मनांसि न पुनस्तेषां वीराणां साहसस्पृशाम् ॥ पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या १०१ में 'मालक्ष्य' का पाठभेद 'माकर्ण्य' मिलता है। श्लोक संख्या १०० में 'ददर्श' का 'दर्शयन्' तथा श्लोक संख्या १०३ में 'सम्भोग' का 'संयोग' 'स्थिताः' का पाठभेद 'स्थितः' मिलता है। 'मद्यप-देवता' का 'मध्यमदेवता' 'मुख्यदेवताः पादटिप्पणियाँ : तथा 'तमपाहरन्' का पाठभेद 'तमुपाहरन्' श्लोक संख्या ९९ और १०० का अनुवाद श्री मिलता है। स्टीन, श्री पण्डित तथा अन्य अनुवादकों ने एक श्लोक संख्या १०४ में 'कुतो' का 'ततो' तथा साथ ही किया है। यहां पर दोनो श्लोकों का अनुवाद 'पुंलक्ष्म' का पाठभेद 'पुलिङ्ग' मिलता है।

द्वितीय तरंग ४२३ अथ पुर्यष्टकभ्राम्यदनाक्रान्तान्यविग्रहम् । योगेनाकृष्य योगिन्यस्तत्र सन्धिमतेन्यधुः ॥ १०५ ॥ १०५. सन्धिमति के पुर्यष्टक को आकृष्ट कर योगिनियों ने उस (शरीर) में रख दिया। ततः सुप्तोत्थित इव प्रत्तदिव्यविलेपनः । समभुज्यत ताभिः स यथेच्छं चक्रनायकः ॥ १०६ ॥ १०६. तत्पश्चात् सुप्तोत्थित सदृश दिव्य लेपन लिप्त उस चक्र नायक१ ने उनसे समुप- भोग किया। ईशानस्तस्य देवीनां वितीर्णाऽङ्गर्हति पुनः। क्षपायां क्षीयमाणायां चकितः पर्यशङ्कत ॥ १०७ ॥ १०७. रात्रि के क्षीयमाण होने पर, चकित ईशान ने देवियों द्वारा उसके (सन्धि- मति के) सम्पृक्त अंगों के हरण की आशंका की। नदंस्तद्रक्षया धीरः स च तत्स्थानमाययौ । तच्च योगेश्वरीचक्रं क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ १०८ ॥ १०८. वह धीर उसकी रक्षा हेतु, नाद करता हुआ उस स्थान पर आ गया और वह योगिनी समूह तत्क्षण अन्तर्हित हो गया। श्लोक संख्या १०५ में 'पुर्यष्टक' का 'पुर्यष्टकं' 'भ्राम्यद' का 'भ्राम्यन्म' तथा 'योगिन्य.' का 'योगेश्यः', 'योगेस्य' 'योगेभ्यः' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १०५ (१) पुर्यष्टक—पुर्यष्टक का विशद वर्णन रूप, कार्यकलापादि का 'योगवासिष्ठ रामायण' में मुख्यतः लीला उपाख्यान में किया गया है। द्रष्टव्य है—योगवासिष्ट कथा' पाठभेद : श्लोक संख्या १०६ में 'सुप्तो' का 'स्वप्तो' तथा 'प्रत्तदि' का पाठभेद 'प्रमुदि' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १०६ (१) चक्रनायक : जोनराजने चक्रनायक के स्थान पर योगिनी नायक शब्द का प्रयोग किया है। योगिनीनायको दूरात् परिज्ञाय नृपात्मजम् । योगिनीनिकटं प्रापुर्विकटप्रकटौजसः ॥३४८॥ चक्रनायक एक आयुर्वेदिक औषधि होती है। भैरवी चक्र में उसके नेता के रूप में चक्रनायक एवं चक्रेश दोनों शब्द मिलता है। वह तान्त्रिक चक्र का अधिष्ठाता माना जाता है। चक्रनायक का भी अर्थ व्याघ्रगन्ध नामक गंध द्रव्य होता है। योग तथा तन्त्र साहित्य मे चक्रों का वर्णन मिलता है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञाषट्चक्र व्यक्ति के रीढ़ प्रदेश पर शरीर के अति निम्नभाग से मूर्धा तक जाता है। मूर्धा पर सहस्रधारा होती है। शुभाशुभ के निर्णय हेतु स्वर तथा सर्वतोभद्रादि ८४ चक्रों का उल्लेख मिलता है। पाठभेद : श्लोकसंख्या १०७में 'ईशानस्तस्य' का 'ईशानतस्य' तथा 'र्णाङ्गहर्ति' का पाठभेद 'र्णाङ्गाहृति' मिलता है।

४२२ राजतरंगिणी उद्घाटिततमोरीः स ततः पितृवनावभो । ददर्श योगिनीस्तेजःपरिवेषान्तरस्थिताः ॥ १०० ॥ १००. तदुपरान्त उसने गवाक्ष खोलकर श्मशान भूमि पर तेज के परिवेश में स्थित योगिनियों को देखा । तासां संभ्रममालक्ष्य कङ्कालं चापवाहितम् । ईशानस्तां श्मशानोर्वी धृतासिश्चकितो ययौ ॥ १०१ ॥ १०१. उनके सम्भ्रम एवं अपहृत कंकाल को देखकर तलवार लिये चकित ईशान उस श्मशान पर गया । अथाऽपश्यत्तरुच्छन्नः शायितं मण्डलान्तरे । सन्धीयमानसर्वाङ्गं कङ्कालं योगिनीगणैः ॥ १०२ ॥ १०२. तत्पश्चात् वृक्ष के ओट से उसने देखा कि योगिनियाँ मध्य में कंकाल को सुलाकर सब अंगो को जोड़ रही थीं। उल्लसद्वरसम्भोगवाञ्छा मद्यपदेवताः । वीरालाभात्समान्विष्य कङ्कालं तमपाहरन् ॥ १०३ ॥ १०३. वर सम्भोग की उत्कट कामना बस उन मद्यप योगिनियों ने किसी वीर (पुरुष) के अभाव में खोजकर उस कंकाल का अपहरण कर लिया । एकमेकं स्वमङ्गं च विनिधाय क्षणादथ । कुतोऽप्यानोय पुंलक्ष्म पूर्णाङ्गं तं प्रचक्रिरे ॥ ०४ ॥ १०४. अपने एक-एक अंग को रखकर और कहीं से पुंलक्ष्म ( शिश्न ) लाकर, उसे सर्वांग पूर्ण कर दिया । जोनराज ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है । अलग-अलग कर दिया गया है । इससे अर्थ में अचलह्वाडनादण्डघण्टानाखण्डटांकृतम् । विप्रतिपत्ति नहीं होती है । मनांसि न पुनस्तेषां वीराणां साहसमस्पृशाम् ॥ पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या १०१ में 'मालक्ष्य' का पाठभेद श्लोक संख्या १०० में 'ददर्श' का 'दर्शयन्' तथा 'माकर्ण्य' मिलता है । 'स्थिताः' का पाठभेद 'स्थितः' मिलता है । श्लोक संख्या १०३ में 'सम्भोग' का 'संयोग' पादटिप्पणियाँ : 'मद्यप-देवता' का 'मध्यमदेवता' 'मुग्धमदेवताः श्लोक संख्या ९९ और १०० का अनुवाद श्री तथा 'तमपाहरन्' का पाठभेद 'तमुपाहरन्' स्टीन, श्री पण्डित तथा अन्य अनुवादकों ने एक मिलता है । साथ ही किया है। यहाँ पर दोनो श्लोकों का अनुवाद श्लोक संख्या १०४ में 'कुतो' का 'ततो' तथा 'पुंलक्ष्म' का पाठभेद 'पुलिङ्ग' मिलता है ।

द्वितीय तरंग ४२३ अथ पुर्यष्टकभ्राम्यदनाक्रान्तान्यविग्रहम् । योगेनाकृष्य योगिन्यस्तत्र संधिमतेन्यधुः ॥ १०५ ॥ १०५. सन्धिमति के पुर्यष्टक को आकृष्ट कर योगिनियों ने उस (शरीर) में रख दिया। ततः सुप्तोत्थित इव प्रत्तदिव्यविलेपनः । समभुज्यत ताभिः स यथेच्छं चक्रनायकः ॥ १०६ ॥ १०६. तत्पश्चात् सुप्तोत्थित सदृश दिव्य लेपन लिप्त उस चक्र नायक¹ ने उनसे समुप- भोग किया। ईशानस्तस्य देवीनां वितीर्णोऽङ्गहृति पुनः । क्षपायां क्षीयमाणायां चकितः पर्यशङ्कत ॥ १०७ ॥ १०७. रात्रि के क्षीयमाण होने पर, चकित ईशान ने देवियों द्वारा उसके (सन्धि- मति के) सम्पृक्त अंगों के हरण की आशंका की। नदंस्तद्रक्षया धीरः स च तत्स्थानमाययौ । तच्च योगेश्वरीचक्रं क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ १०८ ॥ १०८. वह धीर उसकी रक्षा हेतु, नाद करता हुआ उस स्थान पर आ गया और वह योगिनी समूह तत्क्षण अन्तर्हित हो गया । श्लोक संख्या १०५ में 'पुर्यष्टक' का 'पुर्यष्टकं' 'भ्राम्यद' का 'भ्राम्यन्म' तथा 'योगिन्यः' का 'योगेश्यः', 'योगेश्य' 'योगेभ्यः' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १०५ ( १ ) पुर्यष्टक—पुर्यष्टक का विशद वर्णन रूप, कार्यकलापादि का 'योगवासिष्ठ रामायण' में मुख्यतः लीला उपाख्यान में किया गया है। द्रष्टव्य है—'योगवासिष्ठ कथा' पाठभेद : श्लोक संख्या १०६ में 'सुप्तो' का 'स्वप्तो' तथा 'प्रत्तदि' का पाठभेद 'प्रमुदि' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १०६ (१) चक्रनायक : जोनराजने चक्रनायक के स्थान पर योगिनी नायक शब्द का प्रयोग किया है। योगिनीनायको दूरात् परिज्ञाय नृपात्मजम् । योगिनीनिकटं प्रापुर्बिकटप्रकटौजसः ॥३४८॥ चक्रनायक एक आयुर्वेदिक ओषधि होती है। भैरवी चक्र में उसके नेता के रूप में चक्रनायक एवं चक्रेश दोनों शब्द मिलता है। वह तान्त्रिक चक्र का अधिष्ठाता माना जाता है। चक्रनायक का भी अर्थ व्याघ्रनख नामक गंध द्रव्य होता है। योग तथा तन्त्र साहित्य में चक्रों का वर्णन मिलता है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुरक, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञाषट्चक्र व्यक्ति के रीढ़ प्रदेश पर शरीर के अति निम्नभाग से मूर्धा तक जाता है। मूर्धा पर सहस्रधारा होती है। शुभाशुभ के निर्णय हेतु स्वर तथा सर्वतोभद्रादि ८१ चक्रों का उल्लेख मिलता है। पाठभेद : श्लोकसंख्या १०७ में 'ईशानस्तस्य' का 'ईशानतस्य' तथा 'र्णाङ्गहृति' का पाठभेद 'र्णाङ्गाह्णति' मिलता है।

४२४ राजतरंगिणी अथाऽश्रूयत वाक्तासां मा भूदीशाम भीस्तव । नास्त्यङ्गहानिरस्माकं वृते चास्मिन्न वञ्चना ॥ १०९ १०९. अनन्तर उनकी वाणी सुनायी पड़ी-हे ईशान ! तुम्हें भय न हो। हम लोगों के छुने इसमें ( शरीर में ) अंग हानि एवं वंचना नहीं है।' अस्मद्वराद्दिव्यवपुः संधितः संधिमानसौ । आर्यत्वादार्थराजश्च ख्यातो भुवि भविष्यति ॥ ११० ॥ ११०. "हम लोगों के वर से संयुक्त दिव्य शरीर यह सन्धिमान¹ आर्य² होने के कारण पृथ्वी पर प्रसिद्ध 'आर्य राज'³ होगा।" ततो दिव्याम्बरः स्रग्वी दिव्यभूषणभूषितः । ववन्दे संधिमान्प्रह्वः प्राप्तपूर्वस्मृतिर्गुरुम् ॥ १११ ॥ १११. तदुपरान्त दिव्याम्बर एवं माला धारी, दिव्य भूषण-भूषित, विनत सन्धि- मान ने पूर्व स्मृति प्राप्त कर, गुरु की वन्दना की। पाठभेद : श्लोक संख्या ११० में 'राजश्च' का 'राजाख्यः' 'राजास्य' तथा 'भुवि' का पाठभेद 'राजा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ११० (१) सन्धिमान : अंगों को योगिनियों द्वारा सन्धि करने पर योगिनियों ने उसे सन्धिमान नाम से सम्बोधित किया । इसी प्रकार जरासन्ध के शरीर से दोनों भागों को जरा ने एक में जोडा तो जोडने वाले के नाम के साथ उसका नाम जरासन्ध पड़ गया था । कल्हण ने इसके पश्चात् सन्धिमति के स्थान पर 'मन्धिमान' नाम का ही प्रयोग किया है । सन्धिमति नाम का पुनः उल्लेख नहीं मिलता । (२) आर्य : स्त्रियाँ आर्य शब्द पति के लिये आदर प्रदर्शन हेतु प्रयोग करती हैं। योगिनियाँ भी स्त्री थी । उन्होंने सन्धिमति के साथ पतियत् व्यवहार किया था अतएव उन्होंने आदर सूचक श्रेष्ठ शब्द 'आर्य' से सन्धिमान का सम्बोधन किया है । अपने को इसी रूपद्वारा स्वीकार कर लिया था। तथाव नाम नहीं लिया । प्रतीत होता है। कल्हण काल में भी पत्नी अपने पति का नाम नहीं लेती थी । यह प्रथा अब भी प्रचलित है। कल्हण ने बड़ी चातुरी के साथ योगिनियों के मुख से 'सन्धिमति' मूल नाम के स्थान पर 'सन्धिमान' तथा 'आर्य' कहलवाकर इस प्रथा का निर्वाह किया है। (३) आर्य राज : योगिनियों ने अपने पति स्वरूप सन्धिमति को 'आर्य' शब्द से सम्बोधन किया था। अतएव उसका नाम 'सन्धिमति', 'सन्धिमान' के स्थान पर 'आर्यरात्र' रख दिया। उनका पति काश्मीर का राजा होगा। इससे यह भाव प्रकट होता है। आर्यराज का अर्थ होता है आर्यों का राजा। प्राचीन काल में कुल के कर्ता के लिये आर्य सम्बोधन प्रयुक्त किया जाता था । कुल की पत्नियां अपने पति को 'आर्य पुत्र' शब्द से सम्बोधित करती थी । कल्हण ने इसका प्रयोग पुनः तरंग ८ में किया है। ( रा० त० ८ : ३२४७ ) प्राकृत में आर्य शब्द 'अज्ज' हो गया था। आधुनिक 'जी' शब्द अज्ज का अपभ्रंश है। जो नाम के अन्त में लगाना आदर सूचक माना जाता है।

द्वितीय तरंग ४२५ ईशानोऽपि तमालिङ्ग्य स्वप्नेष्वपि सुदुर्लभम् । भूमिकामललम्बे कामिति को वक्तुमर्हति ॥ ११२ ॥ ११२. ईशान ने स्वप्न में भी सुदुर्लभ उसे आलिंगन कर, किस आनन्द की प्राप्ति की, यह कहने में कौन समर्थ है ? असारं च विचित्रं च संसारं ध्यायतोर्मिथः । विवेकविशदा तत्र प्रावर्तत तयोः कथः ॥ ११३ ॥ ११३. वहां पर परस्पर असार एवं विचित्र संसार का चिन्तन करते हुए, उन दोनों की विवेक-विशद कथा चली। अथ वार्तां विदित्वेमां कुतोऽपि नगरौकसः । सबालवृद्धाः सामात्यास्तमेवोद्देशमाययुः ॥ ११४ ॥ ११४. किसी प्रकार इस बात को जानकर सबाल-वृद्ध, नगर निवासी, अमात्य सहित। उस स्थान पर आ गये । पूर्वाकृतिविसंवादाद् भ्रमो नाऽयं स इत्यथ । तेनाच्छिद्यत संवादि निखिलाम्पृच्छता वचः ॥ ११५ ॥ ११५. पूर्वाकृति से भिन्न होने के कारण यह, वह (मन्त्री) नहीं है, उस भ्रम को संवादी निखिल लोगों से बातें पूछते हुए उसने दूर कर दिया । अर्थनां शासितुं राष्ट्रं पौराणामपराजकम् । सोऽन्वमन्यत कृच्छ्रेण निस्स्पृहः शासनाद्गुरोः ॥ ११६ ॥ सन्धिमान् आर्यराजा ११६. नृप हीन राष्ट्र के शासन हेतु, पुरवासियों की प्रार्थना करने पर, गुरु के आदेश से निस्पृह उसने कष्ट पूर्वक अनुमति दे दी। पाठभेद : श्लोक संख्या ११२ में 'लतम्बे' का पाठभेद 'ललम्बे' मिलता है । श्लोक संख्या ११५ में 'संवादि' का पाठभेद 'संवाप्ति' मिलता है । श्लोक संख्या ११६ में 'अर्थनां' का पाठभेद 'अर्थानां' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १. आइने अकबरी में सन्धिमति का नाम 'अरि-राज' और राज्य काल ४७ वर्ष दिया गया है । २. हसन सन्धिमान के विषय में लिखता है— 'राजा सन्धीमान अलमारूफ व आर्य राज ३०३१ क० ५४ में बातफ़ाक अराकीने शहर कश्मीर पर मुतमक्कन हुआ । इन्तज़ाम सल्तनत और फ़ौज और रैयत के साथ अदल व इन्साफ़ से पेश आने में बदिल व जान कोशिश करता । जिस मुकाम पर उसे सूली दी गयी थी वहाँ उसने सन्दशूर का मन्दिर बनवाया। ईशा बरारी में अपने मुरशिद की ताज़ीम व तक- रीम के पेश नज़र ईशेश्वर का मन्दिर बनवाया। मुक़ाम बेद में बेदा देवी का मन्दिर और मौज़ा बमरू में भीमा देवी की यादगार क़ायम की । परगना फाग की आबादी और सर सब्ज़ी के लिये दरयाए सन्दलार से एक महर जारी की । जिसका नाम भारी कुल रखा । परगना लार में आरी नाम

४२६ राजतरंगिणी

का गाँव आबाद करके नहर धार्य कुल के अख़रा- जात के लिये वक़्फ़ कर दिया ।

'आख़िरकार गद्दार दुनिया में एतबार न रख- कर अक्सर औकात इबादत और मन्दिरों के बुतो की पूजापाठ मे सर्फ़ किया करता था । रोज़ाना हर सुबह एक हज़ार शिव लिंग बनवाकर उनकी पूजा करता । वह चीज़ ममालूहु मुल्को और अमूर सल्तनत को कमाहक़ देख-भाल से माना हुई । लोग इस बात से बहुत तंग हुए । आर्यराज ने भी अपने दिल में इस अम्र का अहसास कर लिया । मुल्क से सर करदः लोगों को अपने रूबरू बुलाया । और कहा "अब तक मै तुम्हारे कहने सुनने से अमूर सल्तनत सरंजाम देता था । अब मुनासिब होगा कि किसी और शख्स को इस काम के लिए तैयार कर लो और मुझे माज़र समझो ।

'बाज़ अजी हिरन की खाल पहन ली और बोमज़ू को गार में चला गया । और कुछ अरसा बाद लोगों की नज़रो से ग़ायब हो गया । तब से लोग इस ग़ार को गार आर्य राय कहने लगे । ४७ वरस हकूमत मे गुजारे आर्य राय को हकूमत के तेरह बरस बाद सन् विक्रमी शुरू हुआ । सन् कलयुग ३०४४ बरस गुज़रे । तवालत के खौफ़ मे इन्हें तर्क किया गया ।

'राज सन्धीमान के आख़िरी अहद हकूमत मे लोगों मे मशहूर हो गया कि राजा अन्ध युधिष्ठिर का पोता गोपादित्त नाम राजा कन्दहार के ज़ेर साया औक़ात बसर करता है । उसका एक बेटा है । मेघवाहन नाम जो इन्तहाई दर्जा का लायक व फ़ायक है । इन्ही दिनों प्रयाग के राजा जोतिश ने अपनी बेटो अमरितपरमा के स्वयंवर का इश्तः हार दिया हुआ था । इस चीज़ के पैशनज़र मेघ- वाहन बाप की इजाज़त से जश्न स्वयंवर मे हाज़िर हुआ । अमरित परमा ने उसे देखते ही इन्तहाई पसन्द किया । और फूलो की माला उसकी गरदन में डाल दी । मेघवाहन साज़ वो सामान और पसन्दीदः दुलहिन के साथ कन्दहार में रहने लगा । कश्मीर के अवाम सन्धीमान की कमज़ोरी के बायस पहले ही से दिलगीर थे । जब उन्होंने राजा मेघवाहन का नाम सुना तो उसके खिदमत में कदमींर के करने का पैग़ाम भेजा । इन ६ राजाओं की हकूमत एक सौ बयानवे बरस शुमार होता है ।"

हज़रत सुलेमान और मन्दिमान-हमन एक अजीब कहानी उपस्थित कर सुलेमान को सन्धिमान प्रमाणित करने का प्रयास करता है ।

'मुला अहमद रतनागर के तरजुमा में हुक्म तराज है कि दामोदर के मशरूख होने के बाद उसका वेटा नरेन्द्र हुक्मरानी के तकिया पर बैठा । इसके थोड़े दिनों के बाद एक शख्स सन्दीमान नामी जो मुल्क मगरिब के आबिदों और जाहिदो में से था । सर ज़मीन कश्मीर मे वारिद हुआ । इस शख्स ने रयाज़त के जोर से ऐसा रुतबा पाया था कि उसका विमान यानी उड़न खटोला हवा पर जाता था ! ज़िन्द और परिन्दे उसके लहकाम के फ़रमा बरदार थे और उसके साथ साथ जाते । जब उसके तहत में शहबाज़ की तरह कश्मीर की तमाम हदूद की सैर कर ली तो बिल आखिर कोह लारिक जेह यानी कोह सुलेमान की चोटी पर ठहर गया । इस हाल को देख कर आम और खास लोग वहा जमा हो गये । और उसकी शान व शौकत और आब व दाब को देखकर दंग रह गये ।

'राजा नरेन्द्र इस खबर के सुनते ही फौरन् हाज़िर खिदमत हुआ । राजा सन्दिमान की शोशू नबी और रज़ामन्दी हासिल की। इसके अलावा जिस शख्स ने भी उसके सामने अपनी कोई मुराद रखी बह उसमे कामयाब व बामुराद हुआ । चूंकि शहर सन्दमत नगर के गर्क हो जाने से कश्मीर की सतह हदूद वैजवारह तक हमेशा सैलाबी रहतो थी इस वजह से लोग ग़लात की तंगी और कहूत के बार हमेशा आजिज़ रहते थे । इसलिए उन्होने लगाना के रूबरू इल्तजा की कि -

द्वितीय तरंग ४२७ प्रापय्योपवनोपान्तं तं दिव्याकृतिशोभिनम् । सत्तूर्यं स्नापयामासुर्गभिषेकाम्बुभिर्द्विजाः ॥ ११७ ॥ ११७. उपवन के समीप ले जाकर, ब्राह्मणों ने दिव्याकृति शोभित उसे तूर्य नाद पूर्वक अभिषेक जल से स्नान कराया ।

निकाल दिया जाये । सन्दिमान ने जिन्नों की एक जमाअन को उन पत्थरों के उठाने पर जो जलजला की वजह से खादून यार के मुकाम पर दरया में लुढ़क गये थे । हुक्म दिया । हुक्म पाते ही जिन्नों ने दरया की गहराई से पत्थरों को निकाल लिया । जिससे रुका हुआ पानी फिर से जारी हो गया । और थोड़े ही अरसा में कश्मीर की अन्दरूनी सतह जाहिर हो गयी । 'राजा नरेन्दर ने ग्रांजनाव की दोस्ती और रफाकत को अपने ऊपर पसन्द किया । और मुल्क कश्मीर की हुकूमत से दस्तबरदारी अख्तियार कर ली । मन्धिमान को भी उसकी यह ख्वाहिश पसन्द आई और हमेशा अपने साथ रहने और पास बैठने की इजाज़त से उसे सर्फराज किया । 'कहते हैं तुरकिस्तान के शाहज़ादो में से तीन आदमी हुश्क, कनिष्क और जुश्क राजा सन्धिमान के इस तख्त पर हमराह थे । इस बिना पर अपनी पैदाइश असलियत के बमूजिब इन तीनों शहजादो को मुल्क कश्मीर बतौर जागीर बख्शा । इस मुल्क के बहुत से लोगों को अपना मरवोदा बना लिया । एक हफ्ता तक कश्मीर के सैर व सपाहत करके वापसी अख्तियार किया । 'मतरजुमा यानी मुल्ला अहमद कहता है कि इससे साफ मालूम होता है कि सन्दिमान हज़रत सुलेमान होंगे। क्योकि मशरिक के लोग उसे सन्दि- मान यानी रियाज़त कीश इन्सान कहते हैं और तमाम दुनिया में सबको मालूम है कि हज़रत सुलेमान का तख्त ही हवा पर उड़ती था । उसके तांबे में जिन और परी थे । और तफीर लफ़्ज़ी के बिना पर ० ० के लोग हज़रत सुलेमान को सन्दीमान कहते

  • राजा सन्धीमान ० ० से लेकर इस वक्त तक कोह लारुक ज़ेर को कोह सुलेमान या कोह सन्दोमान कहा जाता है । नीज़ खता कश्मीर का दूसरा नाम 'बाग सुलेमान' भी है ।' मैं प्रथम तरंग पर इस विषय में लिख चुका हूँ कि सुलेमान का काल ९००-९३३ वर्ष ईसा पूर्व था और कनिष्क का काल सन् ७८-१०७ है । इस प्रकार दोनों के समयों में १०४८ वर्ष का अन्तर पड़ता है । सन्धिमान का काल हमन ने क० ३०३१ संवत् तथा कनिष्क का क० १७९८ संवत् बतलाया है । सन्धिमान १२३३ वर्ष पूर्व कनिष्क का होना स्वीकार करता है । दोनों के कालों में १२३३ वर्षों का अन्तर है । सुलेमान ९०० वर्ष ईशा पूर्व हुए थे अतएव सन्धिमान तथा सुलेमान के समयों में २२८१ वर्षों का अन्तर पड़ जाता है । हम्न इन अन्तरों का किसी प्रकार भी स्पष्टीकरण करने में असमर्थ होता है । अतएव सुलेमान और सन्धिमान एक ही व्यक्ति हैं यह धारणा सर्वथा भ्रामक एवं मिथ्या है । (३) राजा का निर्वाचन : राजा के निर्वाचन का उल्लेख पूर्व वैदिक काल में मिलता है । ऋग्वेद में उल्लेख आता है । 'तां ईं विशो न राजानं वृणाना वोभतश्चदो अप बुधादतिष्ठन् ।' ( १०:१२४:८ ) विश द्वारा राजा का निर्वाचन किया गया था । अथर्ववेद में भी विशों द्वारा राजा के निर्वाचन की कामना की गयी है । 'त्वां विशो वृणतां राज्याय ।' ( ३:४:२ )

पादटिप्पणियाँ ११७ श्री विल्सन ने अभिषेक का काल ईशा पूर्व २३ वर्ष ९ मास और समाप्त काल सन् १३५ ई. तथा राज्य काल ४७ वर्ष दिया है ।