भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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द्वितीय तरंग ४१९ गौरमुख से शाप की बात परिक्षित को बताने के लिये भेजा। (म० आ० ३८:१३-२८) तक्षक नाग यथा समय परिक्षित को दंश करने के लिये प्रस्थान किया। मार्ग में कश्यप मान्त्रिक मिला। वह नाग का विष उतारने परिक्षित के पास जा रहा था। तक्षक ने उसे यथेष्ट धन देकर, वापस कर दिया। निश्चित समय पर तक्षक द्वारा सर्पदंस के कारण परिक्षित की मृत्यु हो गयी। (म० आ० ३६-४०, ४५-४७ दे० भा० २:८-१०) भागवत पुराण के अनुसार तक्षक ने ब्राह्मण रूप धर कर परिक्षित के राजभवन में प्रवेश किया था। तक्षक परिक्षित के समीप पहुँचते ही, तत्काल नागस्वरूप धारण कर, उसकी हत्या का कारण हुआ। (भा० १२:६) महाभारत मे यह कथा दूसरी प्रकार से दी गयी है। तक्षक ने कतिपय नागों को फल, पुष्प देकर परिक्षित के पास भेजा। एक फल में सूक्ष्म रूप कीड़ा बनकर बैठ गया। तपस्वी वेशधारी नाग परिक्षित के द्वार पर फल पुष्प भेंट करने की अनुमति मांगने लगे। परिक्षित ने उनके फल को स्वीकार किया। एक बड़ा फल स्वयं ले लिया। शेष अपने मित्रो को दे दिया। परिक्षित ने फल फोड़ा। उसमे से एक लाल कीड़ा निकला। उसे देखकर परिक्षित ने व्यंगपूर्वक कहा—'सूर्य अस्ताचल जा रहा है। सातवाँ दिन पूरा हो रहा है। कहीं यही न तक्षकराज बन जाय?' परिक्षित उस कीड़े को अपनी गर्दन पर लेकर जैसे खेलने लगा। परन्तु तत्काल वह कोड़ा तक्षक नाग बन गया। उसके शरीर से लिपट गया। परिक्षित सर्पदंस से तत्काल मर गया। पुराणों के अनुसार परिक्षित जन्म से मगध देश के राजा महापद्म का समय १५०० वर्षों का होता है। (मत्स्य० २७३:३६) विष्णु पुराण में 'ज्ञेय' का 'शत' पाठ मानकर यह अवधि एक हजार एकसो पन्द्रह वर्षों की निश्चित की गयी है। (विष्णु० : ४:२४:३२) (३) जीवित करना—परिक्षित उत्तरा के गर्भ में था। महाभारत में दुर्योधन कौरवों से परा- जित हो गया था। केवल अश्वत्थामा शेष रह गया था। वह पाण्डवद्रोही था। रात्रि में द्रोपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी। उसने इसी प्रकार सूत, सोम, धृष्टद्युम्न, शिखंडी आदि अनेक वीरों का नाश किया। प्रसन्न अश्वत्थामा दुर्योधन के समीप गया। दुर्योधन घायल था। तड़प रहा था। भारतीय युद्ध की सम्पूर्ण सेना में केवल पाँच पाण्डव, श्री कृष्ण पाण्डव पक्ष के तथा कौरव पक्ष के केवल तीन अश्वत्थामा, कृपाचार्य एवं कृतवर्मा जीवित बच गये थे। द्रौपदी के पुत्रों आदि की हत्या सुनकर दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ। सुखपूर्वक प्राण विसर्जन किया। द्रौपदी अत्यन्त दुःखी हुई। उसने प्रतिज्ञा की। अश्वत्थामा के मस्तक की मणि निकालकर यदि युधिष्ठिर के मस्तक पर वह न देखेगी तो प्राण त्याग देगी। भीम ने मणि प्राप्त हेतु अश्वत्थामा पर आक्रमण कर दिया। (म. सौ. ८,९ ११) अश्वत्थामा चिरंजीवी था। भीमसेन का उसे हराना कठिन था। अतएव श्री कृष्ण, अर्जुन के साथ भीम की सहायता के लिए गये। पाण्डवों के नाश हेतु अश्वत्थामा ने ब्रह्मशीर नामक अस्त्र का प्रयोग किया। उसके प्रतिकार निमित्त अर्जुन ने भी वही अस्त्र छोड़ा। पृथ्वी जलने लगी। व्यासादि मुनियों ने अश्वत्थामा को पाण्डवों के शरण जाने के लिये कहा। उसने अपने अस्त्र को लौटाना स्वीकार नहीं किया। किन्तु मणि देने पर उद्यत हो गया। उत्तरा के गर्भस्थ परिक्षित पर उसने अस्त्र छोड़ा। अस्त्र के कारण गर्भस्थ शिशु जलने लगा। उत्तरा ने भगवान् का स्मरण किया। भगवान् ने शिशु की रक्षा की। विष्णु का नाम इसलिये "विष्णु- रात" पड़ गया। यहाँ भारत के अनुसार कुरु वंश के परिक्षीण होने पर इसने जन्म लिया था। अतएव परिक्षित नाम पड़ा था। (म० अश्व० ७० : १०)