भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 559

४१८ राजतरंगिणी द्रोणपुत्रास्त्रनिर्दग्धं मातर्गर्भे परिक्षितम् । जीवयन्कृष्णमाहात्म्यादाता धुर्योऽधिकारिणाम् ॥ ९५ ॥ ९५. द्रोण-पुत्रास्त्र १ से माता के गर्भ में दग्ध परिक्षित २ को कृष्ण के माहात्म्य से जीवित ३ करता हुआ विधाता अधिकारियों में अग्रणी हुआ ।” उलूपी नागकन्या थी । उसका पिता कौरव्य नाग था । वह बालविधवा थी । अर्जुन ने उससे गन्धर्व विवाह किया था । पति की मृत्यु का समाचार सुनी । दुःखी आयी । चित्रांगदा को सान्त्वना दी । बभ्रुवाहन ने पिता तथा माता की जीवन रक्षा का उपाय विमाता से पूछा । उलूपी ने बताया । यदि शेष नाग से मृत संजीवन मणि लायी जाय तो अर्जुन जीवित हो सकता है । बभ्रुवाहन शेषनाग के पास गया । मणि मागा । अन्य नागो की मंत्रणा पर शेष नाग ने मणि देना अस्वीकार कर दिया । बभ्रुवाहन का शेषनाग से युद्ध हुआ । शेषनाग युद्ध में पराजित हो गया । बभ्रुवाहन मणि लेकर शव के समीप आया । अर्जुन का शव मस्तक हीन उसने देखा । हताश हो गया । परन्तु कृष्ण अपने पुण्य प्रभाव से मस्तक पुनः लाये । उसका शव से सन्धि कर दिया गया । अर्जुन जीवित होगये । ( जै० प्र० ३७:२१-४०, म० आश्व० ७९-९०) महाभारत में यह कथा दूसरो तरह से दी गयी है । वहाँ यह वर्णन मिलता है । बभ्रुवाहन ने अपनी विमाता उलूपी के अस्त्रों-शस्त्रो द्वारा अर्जुन को युद्ध में मूच्छित किया था । वह घटना सुनकर चित्रांगदा ने सपत्नी उलूपी को निर्भर्त्सना की । उलूपी को अपनी भूल का ज्ञान हुआ । उसने बभ्रुवाहन को मृत संजीवक मणि दी । बभ्रु वाहन ने अर्जुन के वक्ष स्थल पर मणि रखकर पिता को जीवित किया । (म० आश्व० ८१:९-१०, ९०:१ ) ९५ (१) द्रोणपुत्र : अश्वत्थामा से यहाँ तात्पर्य है । अश्वत्थामा चिरंजीवितों में एक है । (२) परिक्षित : उत्तरा के गर्भ से उत्पन्न अभिमन्यु का पुत्र था । महाराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण की मृत्यु के पश्चात् ३६ वर्ष राज्य किया । राज्य- सिंहासन पर बैठने के समय परिक्षित की आयु ३६ वर्ष थी । इसकी पत्नी का नाम भद्रवती किंवा भाद्रवती था । उनके चार पुत्र जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन तथा भीमसेन थे । कृपाचार्य को ऋत्विज बनाकर भागीरथी के तटपर इसने ३ अश्वमेध यज्ञ किये थे । इसका देहावसान ९६ वर्ष की अवस्था में हुआ था । इसने ६० वर्ष राज्य किया था । ( दे० भा० २:८ ) कृष्ण की मृत्यु के पश्चात् कलि ने पृथ्वी में प्रवेश किया । शूद्र रूप धारण कर वह पशु आदि की हत्या करने लगा । कलि को समाप्त करने के लिए परिक्षित उद्यत हो गया । कलि राजा परिक्षित की शरण में आया । निवास के लिये स्थान पूछने पर जूआ, मद्य, व्यभिचार, हिंसा तथा स्वर्ण पाच स्थानों में रहने के लिये राजा ने आदेश दिया । धर्म तथा पृथ्वी को संतोष हुआ । (आ० : १ : १६:१७) मृगया निमित्त एक समय परिक्षित वन में गये । उन्हें प्यास लगी । जल ढूढ़ने लगे । ऋचीक मुनि के आश्रम में पहुँचे । मुनि ध्यानस्थ थे । वह राजा का आना जान न सके । जल की याचना सुन न सके । राजा को क्रोध आया । उसने पास ही पड़े, एक मृत सर्प को मुनि के गले में डाल दिया । वापस चला गया । ( म० आ० ३६:१७-२१ ) शमीक के पुत्र श्रृंगी ऋषि को यह बात ज्ञात हुई । उसने शाप दिया । गले में साँप डालने वाले की मृत्यु सात दिन पश्चात् सर्प दंश से हो जायगी । शमीक के पुत्र का नाम कही-कही 'गविजात' भी दिया गया है । शमीक को शाप की बात ज्ञात हुई । मुनि को दुःख हुआ । पुत्र की भर्त्सना की । अपने शिष्य