भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 570

द्वितीय तरंग ४२७ प्रापय्योपवनोपान्तं तं दिव्याकृतिशोभिनम् । सत्तूर्यं स्नापयामासुर्गभिषेकाम्बुभिर्द्विजाः ॥ ११७ ॥ ११७. उपवन के समीप ले जाकर, ब्राह्मणों ने दिव्याकृति शोभित उसे तूर्य नाद पूर्वक अभिषेक जल से स्नान कराया ।

निकाल दिया जाये । सन्दिमान ने जिन्नों की एक जमाअन को उन पत्थरों के उठाने पर जो जलजला की वजह से खादून यार के मुकाम पर दरया में लुढ़क गये थे । हुक्म दिया । हुक्म पाते ही जिन्नों ने दरया की गहराई से पत्थरों को निकाल लिया । जिससे रुका हुआ पानी फिर से जारी हो गया । और थोड़े ही अरसा में कश्मीर की अन्दरूनी सतह जाहिर हो गयी । 'राजा नरेन्दर ने ग्रांजनाव की दोस्ती और रफाकत को अपने ऊपर पसन्द किया । और मुल्क कश्मीर की हुकूमत से दस्तबरदारी अख्तियार कर ली । मन्धिमान को भी उसकी यह ख्वाहिश पसन्द आई और हमेशा अपने साथ रहने और पास बैठने की इजाज़त से उसे सर्फराज किया । 'कहते हैं तुरकिस्तान के शाहज़ादो में से तीन आदमी हुश्क, कनिष्क और जुश्क राजा सन्धिमान के इस तख्त पर हमराह थे । इस बिना पर अपनी पैदाइश असलियत के बमूजिब इन तीनों शहजादो को मुल्क कश्मीर बतौर जागीर बख्शा । इस मुल्क के बहुत से लोगों को अपना मरवोदा बना लिया । एक हफ्ता तक कश्मीर के सैर व सपाहत करके वापसी अख्तियार किया । 'मतरजुमा यानी मुल्ला अहमद कहता है कि इससे साफ मालूम होता है कि सन्दिमान हज़रत सुलेमान होंगे। क्योकि मशरिक के लोग उसे सन्दि- मान यानी रियाज़त कीश इन्सान कहते हैं और तमाम दुनिया में सबको मालूम है कि हज़रत सुलेमान का तख्त ही हवा पर उड़ती था । उसके तांबे में जिन और परी थे । और तफीर लफ़्ज़ी के बिना पर ० ० के लोग हज़रत सुलेमान को सन्दीमान कहते

  • राजा सन्धीमान ० ० से लेकर इस वक्त तक कोह लारुक ज़ेर को कोह सुलेमान या कोह सन्दोमान कहा जाता है । नीज़ खता कश्मीर का दूसरा नाम 'बाग सुलेमान' भी है ।' मैं प्रथम तरंग पर इस विषय में लिख चुका हूँ कि सुलेमान का काल ९००-९३३ वर्ष ईसा पूर्व था और कनिष्क का काल सन् ७८-१०७ है । इस प्रकार दोनों के समयों में १०४८ वर्ष का अन्तर पड़ता है । सन्धिमान का काल हमन ने क० ३०३१ संवत् तथा कनिष्क का क० १७९८ संवत् बतलाया है । सन्धिमान १२३३ वर्ष पूर्व कनिष्क का होना स्वीकार करता है । दोनों के कालों में १२३३ वर्षों का अन्तर है । सुलेमान ९०० वर्ष ईशा पूर्व हुए थे अतएव सन्धिमान तथा सुलेमान के समयों में २२८१ वर्षों का अन्तर पड़ जाता है । हम्न इन अन्तरों का किसी प्रकार भी स्पष्टीकरण करने में असमर्थ होता है । अतएव सुलेमान और सन्धिमान एक ही व्यक्ति हैं यह धारणा सर्वथा भ्रामक एवं मिथ्या है । (३) राजा का निर्वाचन : राजा के निर्वाचन का उल्लेख पूर्व वैदिक काल में मिलता है । ऋग्वेद में उल्लेख आता है । 'तां ईं विशो न राजानं वृणाना वोभतश्चदो अप बुधादतिष्ठन् ।' ( १०:१२४:८ ) विश द्वारा राजा का निर्वाचन किया गया था । अथर्ववेद में भी विशों द्वारा राजा के निर्वाचन की कामना की गयी है । 'त्वां विशो वृणतां राज्याय ।' ( ३:४:२ )

पादटिप्पणियाँ ११७ श्री विल्सन ने अभिषेक का काल ईशा पूर्व २३ वर्ष ९ मास और समाप्त काल सन् १३५ ई. तथा राज्य काल ४७ वर्ष दिया है ।