भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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४२८ राजतरंगिणी नवराजोचिताचारे न स शिक्षामपैक्षत । दृढकर्मा समस्तास्तु निस्तुषाः प्रक्रिया व्यधात् ॥ ११८ ॥ ११८. अनुभवी उसने नये नृप के उचित आचार हेतु शिक्षा की अपेक्षा नहीं की, उसने समस्त प्रक्रियाओं को सरल कर दिया। स राजोचितनेपथ्यः पौराशीर्घोषशोभिनीम् । सौधोन्मिपल्लाजवर्षां ससैन्यः प्राविशत्पुरीम् ॥ ११९ ॥ ११९. राज्योचित परिधानयुक्त उसने सेना के साथ, पुरवासियों के आशीर्घोष से रम्य एवं सौधों से उन्मिषित लाजवृष्टि पूर्ण पुरी में प्रवेश किया। तस्मिन्विरजसि प्राज्यमाक्रामति नृपासनम् । आचक्राम प्रजा व्यापन्न दैवी न च मानुषी ॥ १२० ॥ १२०. महान् नृपासन पर रजोगुण रहित उसके आसीन होने के पश्चात् प्रजा पर दैवी एवं मानुषी आपत्ति नहीं आयी। अहरन्हृदयं तस्य शृङ्गारहितविभ्रमाः । नितम्बिन्यो वनभुवः शमिनो न तु योषितः ॥ १२१ ॥ १२१. शमी उसके हृदय को शृङ्गार हित विभ्रम शालिनी एवं नितम्बिनी¹ वनभूमियों ने अपहरण किया, न कि (एवंभूत) योषिताओं ने। श्री एस. पी. पण्डित ने यह समय ईशा पूर्व २४ (१) नितम्ब : इस श्लोक में नितम्ब एवं वर्ष तथा राज्य काल ४७ वर्ष माना है। शृंगारहित विभ्रम श्लिष्ट है। श्री स्टीन ने अभिषेक का समय लौकिक संवत् नितम्ब का अर्थ पर्वत का निम्न प्रदेश तथा ३०४१ तथा राज्य काल ४७ वर्ष माना है। रमणी का नितम्ब अर्थात् कटि प्रदेश का निम्न श्री शास्त्री ने यह समय सप्तर्षि संवत् ३९४२ भाग होता है। तथा सन् १७५ ई० दिया है। शृंगारहितविभ्रम का एक अर्थ शृंगो से पाठभेद : शोभमान और अपर अर्थ शृंगार के लिये विलास- श्लोक संख्या ११८ में 'पैक्षत' का पाठभेद शालिनी रमणी होता है। 'पेक्षत' मिलता है। शृंगार एवं शान्त रस परस्पर विरोधी है। श्लोक संख्या ११९ में 'सौधोन्मि' का 'सौधोमि' परन्तु यहाँ कल्हण ने दोनो के अपुष्ट रूप का एक तथा 'ससैन्य' का पाठभेद 'ससैन्या' मिलता है। साथ चित्रण किया है। इसी प्रकार भर्तृहरि ने पादटिप्पणियां : निम्नलिखित श्लोक में इसको अभिव्यक्त किया है। १२१ : इस श्लोक का एक अर्थ यह भी होता है— "मात्सर्यमुत्सार्य विचार्यकार्य- "शमी उसके हृदय को शृंगों से शोभायमान सुन्दर मार्याः समर्यादमिदं वदन्तु। उपत्यका वाली वनभूमियों ने अपहृत किया न कि सेव्या नितम्बा किमु भूधराणामुत शृंगार के लिये विलासवती नितम्बिनी योषिताओने।" स्मितस्मेरविकासिनीनाम् ॥"