राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 569, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें४२६ राजतरंगिणी
का गाँव आबाद करके नहर धार्य कुल के अख़रा- जात के लिये वक़्फ़ कर दिया ।
'आख़िरकार गद्दार दुनिया में एतबार न रख- कर अक्सर औकात इबादत और मन्दिरों के बुतो की पूजापाठ मे सर्फ़ किया करता था । रोज़ाना हर सुबह एक हज़ार शिव लिंग बनवाकर उनकी पूजा करता । वह चीज़ ममालूहु मुल्को और अमूर सल्तनत को कमाहक़ देख-भाल से माना हुई । लोग इस बात से बहुत तंग हुए । आर्यराज ने भी अपने दिल में इस अम्र का अहसास कर लिया । मुल्क से सर करदः लोगों को अपने रूबरू बुलाया । और कहा "अब तक मै तुम्हारे कहने सुनने से अमूर सल्तनत सरंजाम देता था । अब मुनासिब होगा कि किसी और शख्स को इस काम के लिए तैयार कर लो और मुझे माज़र समझो ।
'बाज़ अजी हिरन की खाल पहन ली और बोमज़ू को गार में चला गया । और कुछ अरसा बाद लोगों की नज़रो से ग़ायब हो गया । तब से लोग इस ग़ार को गार आर्य राय कहने लगे । ४७ वरस हकूमत मे गुजारे आर्य राय को हकूमत के तेरह बरस बाद सन् विक्रमी शुरू हुआ । सन् कलयुग ३०४४ बरस गुज़रे । तवालत के खौफ़ मे इन्हें तर्क किया गया ।
'राज सन्धीमान के आख़िरी अहद हकूमत मे लोगों मे मशहूर हो गया कि राजा अन्ध युधिष्ठिर का पोता गोपादित्त नाम राजा कन्दहार के ज़ेर साया औक़ात बसर करता है । उसका एक बेटा है । मेघवाहन नाम जो इन्तहाई दर्जा का लायक व फ़ायक है । इन्ही दिनों प्रयाग के राजा जोतिश ने अपनी बेटो अमरितपरमा के स्वयंवर का इश्तः हार दिया हुआ था । इस चीज़ के पैशनज़र मेघ- वाहन बाप की इजाज़त से जश्न स्वयंवर मे हाज़िर हुआ । अमरित परमा ने उसे देखते ही इन्तहाई पसन्द किया । और फूलो की माला उसकी गरदन में डाल दी । मेघवाहन साज़ वो सामान और पसन्दीदः दुलहिन के साथ कन्दहार में रहने लगा । कश्मीर के अवाम सन्धीमान की कमज़ोरी के बायस पहले ही से दिलगीर थे । जब उन्होंने राजा मेघवाहन का नाम सुना तो उसके खिदमत में कदमींर के करने का पैग़ाम भेजा । इन ६ राजाओं की हकूमत एक सौ बयानवे बरस शुमार होता है ।"
हज़रत सुलेमान और मन्दिमान-हमन एक अजीब कहानी उपस्थित कर सुलेमान को सन्धिमान प्रमाणित करने का प्रयास करता है ।
'मुला अहमद रतनागर के तरजुमा में हुक्म तराज है कि दामोदर के मशरूख होने के बाद उसका वेटा नरेन्द्र हुक्मरानी के तकिया पर बैठा । इसके थोड़े दिनों के बाद एक शख्स सन्दीमान नामी जो मुल्क मगरिब के आबिदों और जाहिदो में से था । सर ज़मीन कश्मीर मे वारिद हुआ । इस शख्स ने रयाज़त के जोर से ऐसा रुतबा पाया था कि उसका विमान यानी उड़न खटोला हवा पर जाता था ! ज़िन्द और परिन्दे उसके लहकाम के फ़रमा बरदार थे और उसके साथ साथ जाते । जब उसके तहत में शहबाज़ की तरह कश्मीर की तमाम हदूद की सैर कर ली तो बिल आखिर कोह लारिक जेह यानी कोह सुलेमान की चोटी पर ठहर गया । इस हाल को देख कर आम और खास लोग वहा जमा हो गये । और उसकी शान व शौकत और आब व दाब को देखकर दंग रह गये ।
'राजा नरेन्द्र इस खबर के सुनते ही फौरन् हाज़िर खिदमत हुआ । राजा सन्दिमान की शोशू नबी और रज़ामन्दी हासिल की। इसके अलावा जिस शख्स ने भी उसके सामने अपनी कोई मुराद रखी बह उसमे कामयाब व बामुराद हुआ । चूंकि शहर सन्दमत नगर के गर्क हो जाने से कश्मीर की सतह हदूद वैजवारह तक हमेशा सैलाबी रहतो थी इस वजह से लोग ग़लात की तंगी और कहूत के बार हमेशा आजिज़ रहते थे । इसलिए उन्होने लगाना के रूबरू इल्तजा की कि -