राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 562, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४२१ इत्युक्तवा भाविनोऽर्थस्य द्रष्टुं सिद्धिं समुद्यतः । तत्रैव बद्धवसतिः कङ्कालं स ररक्ष तम् ॥९७॥ ९७. इस प्रकार कह कर भावी अर्थ की सिद्धि देखने को समुद्यत उसने वहीं पर निवास करते हुए उस कंकाल को रक्षित किया। अथार्धरात्रे निर्निद्रस्तस्यैवाद्भुतचिन्तया । धूपाधिवासमीशानो घ्रातवान्दिव्यमेकदा ॥ ९८ ॥ ९८. एक समय उसी अद्भुत चिन्ता में निद्रारहित ईशान ने अर्धरात्रि में दिव्य धूपगन्ध का अनुभव किया। उच्चण्डलाडनादण्डोद्घृष्टघण्टौघटांकृतैः । चण्डैर्डमरुनिर्घोषैर्घर्घरं श्रुतवान्ध्वनिम् ॥ ९९ ॥ ९९. दीर्घ ताडन दण्ड ताडित घण्टों के नादों एवं भयंकर डमरु निर्घोषों से घर्घर ध्वनि सुना। (२) तार्क्ष्य : जीमूतवाहन द्वारा नागों के जीवित करने का उल्लेख कथासरित्सागर में सरल शैली में कश्मीरी कवि सोमदेव ( ग्यारहवीं शताब्दी ) ने वर्णन किया है। सोमदेव कवि क्षेमेन्द्र का सम- कालीन था। तार्क्ष्य नाम के अनेक व्यक्ति हुए हैं। ऋग्वेद में तार्क्ष्य एक अश्व का नाम है। (ऋ० १:८९:६; १०:१७८) त्रसदस्यु का यह वंश माना गया है। (ऋ० ८:२२:७ ) तार्क्ष्य को एक पक्षी या वायम कहा गया है। उसे वैपश्चित नामक पक्षियों का राजा कहा गया है। अरिष्टनेमि का एक पैतृक नाम तार्क्ष्य है। तार्क्ष्य एक आचार्य भी थे ( ए. ब्रा. ३:१:६, सां. ब्रा. ७:१९ ) कश्यप प्रजापति का नामान्तर तार्क्ष्य है। दक्ष ने इसे अपनी कन्याएँ दी थीं। सरस्वती से इनका सम्भाषण हुआ था। ( म. व. १८४: तथा १८६ ) यह कश्यप तथा विनता का पुत्र तथा गरुड का भाई था। ( म० आ० ६५:४० ) भगवान् शिव का भी एक नाम तार्क्ष्य कहा गया है। ( अनु०:१७:९८) तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, गरुड, अरुण, अरुणी तथा वारुणी विनता के पुत्र हैं। कद्रू के पुत्र शेष, अनन्त आदि नाग हैं। विनता एवं कद्रू सपत्नियां हैं। उनमें वैमनस्य तथा शत्रुता स्वाभाविक है। उनकी लड़ाई प्रसिद्ध है। इसी प्रकार उनकी सन्तानें भी परस्पर एक दूसरे से शत्रुता रखती थीं। पाठभेद : श्लोक संख्या ९८ में 'मेकदा' का पाठभेद 'मेकतः मिलता है। श्लोक संख्या ९९ में 'उच्च' का 'उच्च' 'लाडना' का 'वादना' 'ताडना', 'वदना' तथा 'डमरु-निर्घोषै' का पाठभेद 'डमरुघोप्यैश्च' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ९९ (१) लाडन दण्ड : ताडन का अर्थ आघात करना होता है। ताडन दण्ड घण्टा बजाने की मुगरी अथवा लकड़ी का बना दण्ड अर्थात् दण्ड समान वस्तु थी। जापानी घंटा में डण्डा रस्सी में बँधा रहता है। वह गोल घंटा पर आघात करता है। भारतीय मन्दिरों तथा चर्च में घण्टों में लोलक भीतर लगे रहते हैं। एक घण्टा साधारण मोटे चद्दर अष्ट धातु का होता है। उसे मुगरी या लकड़ी से ठोक कर बजाते हैं।