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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 561, कुल 984 में से

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पृष्ठ 561

४२० राजतरंगिणी कचं भस्मीकृतं दैत्यैर्नागांस्ताक्ष्यैण भक्षितान् । पुनर्जीवयितुं को वा दैवादन्यः प्रगल्भते ॥९६॥ ९६. दैत्यों द्वारा भस्मी कृत कच१ एवं ताक्ष्यै२ भक्षित नागों को पुनः जीवित करने के लिये दैव के अतिरिक्त और कौन समर्थ हुआ ?

एक मत है कि परिक्षित जन्म लेते ही अपने रक्षक भगवान् की खोजने लगा । अस्तु 'परि+इक्ष' नाम प्राप्त किया । ( भा० १ : १२ : १० ) इस सन्धि के अनुसार नाम 'परीक्षित' होना चाहिए। परन्तु महाभारत में सर्वत्र नाम परिक्षित ही व्यवहृत हुआ है। कल्हण ने भी नाम 'परिक्षित' ही दिया है। मैंने भी यही नाम दिया है। भागवत पुराण में यह कथा और तरह से हो गयी है। अश्वत्थामा ने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिये द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी। अर्जुन ने अश्वत्थामा को बन्दी बना लिया। उसे द्रौपदी के सम्मुख उपस्थित किया। द्रौपदी ने अश्वत्थामा को ब्राह्मण पुत्र के कारण उसे छोड़ देने के लिये अर्जुन से कहा। उसने अश्वत्थामा के चूडामणि को ले लेना पर्याप्त प्रतिशोध माना। ( भाग० १०:७१:४५, ४६, ४७ ) ९६ ( १ ) कच : कच देवगुरु बृहस्पति के पुत्र थे। उनकी माता का नाम नही पता चलता । कच देवयानी कथा प्रसिद्ध है । कच असुर गुरु शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या सीखने के लिये सुरों द्वारा भेजे गये थे। कच ने इसे रहस्यमय ढंग से गोपनीय रखा। दैत्यों ने समझ लिया कि कच संजीवनी विद्या प्राप्त करने के लिये आया था। कच को मार डालने का निश्चय दैत्यों ने किया। एक दिन कच गुरु की गाय चरा रहा था। राक्षसों ने कच का टुकड़े-टुकड़े कर डाला। शृगालों को खिला दिया। शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या का प्रयोग किया। तत्काल कच शृगालों के शरीर से सजीव निकल आये।

दूसरी बार वह एक अरण्य में गया था। असुरों ने कच के टुकड़े टुकड़े काटकर समुद्र में फेंक दिये किन्तु शुक्राचार्य से देवयानी ने पुनः जीवित करने का निवेदन किया। संजीवनी प्रयोग से पुनः कच का शरीर जीवित हो गया। तीसरी बार असुरों ने कच को मारकर उसका चूर्ण बना डाला। उस चूर्ण को सुरा में मिलाकर शुक्राचार्य को पिला दिया। ज्ञात होने पर शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या के प्रभाव से उसे पुकारा। उसने गुरु के उदर से ही उत्तर दिया—'वह उदर में है।' शुक्राचार्य ने कहा—'बाहर आओ।' वह बाहर आने के लिये तैयार न हुआ। उत्तर दिया: 'मैं गुरु हत्या का दोषी कैसे हो सकता हूँ।' देवयानी कच से अत्यन्त प्रेम करती थी। उसने पिता से कच की रक्षा के लिये आग्रह किया। शुक्राचार्य ने कहा—'कच के प्राप्त होने पर मेरी मृत्यु हो जायगी।' देवयानी ने दोनों में से किसी का मरना स्वीकार नहीं किया। विवश होकर शुक्राचार्य ने उदर स्थित कच को संजीवनी विद्या सिखायी। उसे समझा दिया। वह पहले जी जायगा। तत्पश्चात् बाहर आकर मरे हुए उसे संजीवनी विद्या के प्रयोग से जिला दे। कच ने यही किया। किन्तु गुरु कन्या होने के कारण कच ने देवयानी को बहन तुल्य माना। उससे विवाह करना अस्वीकार कर दिया। देवयानी ने उसे शाप दिया। संजीवनी विद्या उसे फलप्रद नहीं होगी। कच ने गुरु कन्या और बहन समझकर उसे प्रतिशाप नहीं दिया। परन्तु कहा—मैं यह विद्या दूसरे को सिखा दूँगा। वह प्रयोग करेगा। मेरा प्रयोजन सिद्ध हो जायगा।

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