राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरङ्ग ३३ ―― चारों युग मिलकर देवताओं का एक युग होता है। देवताओं के सहस्र युग मिलकर ब्रह्मा का एक दिन होता है। सहस्र युगों की एक रात्रि होती है। इस प्रकार देवताओं के एक सहस्र वर्ष दिन तथा रात्रि मिलकर ब्रह्मा का अहोरात्र होता है। देवताओं के इकहत्तर गुने वर्षों का एक मन्वंतर होता है (मनुस्मृति १:६४-७६) । इस समय श्वेत वाराह कल्प के छः मन्वंतर बीत चुके हैं। राजतरंगिणी तथा नीलमत पुराण में इसी ओर संकेत किया गया है। सातवाँ वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है। उसके २८वें महायुग के कलियुग का प्रथम चरण संधि में है। कार्तिक शुक्ल ६ के प्रथम प्रहर में श्रवण नक्षत्र, वृद्धियोग में सत्युग का जन्म हुआ था। सत्युग में, (१) मत्स्य (२) कच्छप, (३) वाराह और (४) नृसिंह अवतार हुए हैं। वैशाख शुक्ल तृतीया सोमवार को रोहिणी नक्षत्र, शोभन योग के द्वितीय प्रहर में त्रेता की उत्पत्ति हुई है। त्रेता में (१) वामन, (२) परशुराम एवं (३) रामचन्द्र के अवतार हुए हैं। माघ कृष्ण अमावस्या, शुक्रवार को धनिष्ठा नक्षत्र, परिघ योग; वृष लग्न में द्वापर की उत्पत्ति हुई है। इसमें (१) कृष्ण तथा (२) बुद्ध दो अवतार हुए हैं। भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी, रविवार, अश्लेषा नक्षत्र, व्यतीपात योग में अर्धरात्रि काल के मिथुन लग्न में कलियुग का जन्म हुआ है। विष्णु पुराण (अंश ४ अध्याय २४, श्लोक ११०-११३) के अनुसार भगवान् कृष्ण के स्वर्गारोहण के दिन से कलियुग आरम्भ होता है। कृष्ण के स्वर्गारोहण के साथ ही युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ राज्यत्याग किया था। इस युग में केवल कल्कि नामक एक अवतार होगा। कलिगताब्द संवत् इस समय ५०६८ तथा काश्मीर का सप्तर्षि संवत् ५०४३ तथा विक्रम संवत् २०२४ तथा शक संवत् १८८६ तथा सन् १६६७ ई०; हिजरी सन् १३८६-८७ और फसली सन् १३७४-७५ है। इस सनातन तथा प्रचलित संवत्सर गणना के अनुसार द्वापर में कृष्ण का अवतार ग्रहण करना ठीक बैठ जाता है। भगवान बुद्ध का समय २५०० वर्ष ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध होता है। यह अवतार द्वापर काल में नहीं पड़कर कलियुग में पड़ता है। नीलमत पुराण ने बुद्ध को एक अवतार माना है। एक विचित्र पहेली है। ज्योतिषियों का इसका समाधान करना आवश्यक है। नीलमत पुराण में बुद्धपूजा का वर्णन है। बुद्ध को भगवान् का अवतार माना गया है। विश्रादैत्यो जगन्नाथ प्राप्ते ब्रह्मन् कलियुगे । अष्टाविंशतिमे भाविबुद्धोनाम जगद्गुरुः ॥८०६॥ शास्त्रीय धारणा के अनुसार इस मन्वंतर के अवतार बुद्ध नहीं वामन हैं। सप्तर्षि : (१) अत्रि (२) कश्यप (३) गौतम (४) जमदग्नि (५) भरद्वाज (६) वशिष्ठ (७) विश्वामित्र है। वैवस्वत मन्वंतर के देवगण-१० अंगिरस, २ अश्विनी, १२ आदित्य, १० भृगुदेव, ४६ मरुत, ११ रुद्र, ८ वसु, १० विश्वेदेव और १२ साध्य हैं। इस मन्वंतर के इंद्र का नाम-उर्ध्वस्विन्, किंवा महाबल है। मनु के पुत्र; अरिष्ठ, इक्ष्वाकु, इल, करुष, कुश- नाभ, घृष्ट, नभ, नृग, पृषध्र, प्राशु, वसुमति तथा शर्याति हैं। काश्मीर किंवा कश्मीर काश्मीर किंवा कश्मीर शब्द की व्युत्पत्ति के विषय में अनेक मत हैं। सनातन मत है। कश्यप ऋषि ने सतीसर को सूख जाने पर आबाद किया था। सतीसर का नाम कश्यपपुर पड़ गया। कश्यपपुर का अपभ्रंश कश्मीर किंवा काश्मीर शब्द है। ५