राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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पुर, नगर, पत्तन तथा क्षेत्र शब्दो के अर्थों में अन्तर है । नगर तथा पत्तन शहरी क्षेत्र का द्योतक है । किसी संज्ञा के अन्त में जोड़ देने पर नगर किंवा पत्तन स्थान विशेष का परिचायक होता है । पुर शब्द इससे भिन्न है । किसी व्यक्ति वाचक संज्ञा के साथ पुर जोड़ा जाता है । किसी स्थान को बसाने वाले व्यक्ति के साथ पुर शब्द जोड़ कर बसाने वाले की स्मृति चिरस्थायी की जाती है । काश्मीर में अवन्तीपुर, शूरपुर, जयपुर, प्रवरसेनपुर, जोनपुर, प्रतापपुर, हिरण्यपुर, कनिष्कपुर, जुष्कपुर, शिवपुरी, ब्रह्मपुरी, विष्णुपुरी, अभिमन्युपुर, आदि इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं । श्रीनगर किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर नहीं बसाया गया था । उसका नाम श्रीनगर पड़ा । परन्तु श्रीनगर में ही प्रवरसेन ने नगर बसाया तो उसका नाम प्रवरसेनपुर हो गया । नागरिक शब्द देशीय किंवा राष्ट्रीयता का बोधक है । सम्पूर्ण देश के व्यक्तियों के लिए नागरिक शब्द व्यवहृत होता है । पौरजन किंवा पौर शब्द स्थानीय निवास स्थान का परिचायक है । वह किसी एक नगर में रहने की ओर संकेत करता है । नागरिक शब्द का समावेश अंग्रेजी सिटिजन शब्द में हो जाता है । काश्मीर में पुर शब्द व्यक्ति विशेष के नाम के साथ जोड़कर नगर वाचक बना दिया जाता था । आजकल पुर के स्थान पर व्यक्तियो के साथ नगर शब्द जोड़ने की प्रथा चल निकली है जैसे—टाटानगर, मोदीनगर गंगानगर, सरदारनगर आदि । पत्तन शब्द नगर तथा शहर के लिए प्रयुक्त किया जाता है । यह शब्द नदी तथा समुद्रतटीय नगर तथा बन्दरगाहो के लिये विशेष रूप से व्यवहृत हुआ है । पत्तन व्यापार का केन्द्र होता है । विशाखा पत्तन, मछली पत्तन आदि इसके उदाहरण है । समुद्र तटीय नगरों के अतिरिक्त अन्य स्थानों के नगरों के लिए नगर अर्थ में पत्तन शब्द का बहुत कम व्यवहार किया गया है ।
चाणक्य पत्तन शब्द की यही परिभाषा देता है— वारिस्थल पथ पत्तनानि च निवेशयेत् । (अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरण १ अध्याय १ प्रकरण १९) क्षेत्र शब्द का अपभ्रंश खेत शब्द है । अन्नोत्पा- दक भूमि, समतल भूमि, उत्पत्ति स्थान, प्रदेश तथा तथा तीर्थ स्थान के लिए क्षेत्र शब्द का व्यवहार किया गया है। क्षेत्र भूखण्ड विशेष की निर्धारित सीमा के लिए आता है । क्षेत्र के अन्तर्गत नगर, पुर, पत्तन, ग्राम आदि सब आ जाते हैं । काश्मीर में क्षेत्र शब्द तीर्थ स्थानों की सीमा के लिए व्यवहृत किया गया है। वाराह क्षेत्र, मडव क्षेत्र, उत्तर मानस क्षेत्र, विजयेश्वर क्षेत्र, नन्दिक्षेत्र, आदि इसके उदाहरण हैं । कुछ विदेशी विद्वानो ने एक और मत प्रकट किया है । 'कशप' नाम कश्यप ऋषि का है । 'मर' शब्द का अर्थ 'मठ' है । 'कशपमर' प्राचीन नाम था । कशपमर बिगड़ कर कश्मीर हो गया है । शुद्ध शाब्दिक अर्थ भी लगाया गया है । 'क' का अर्थ जल है । 'समीर' का अर्थ वायु किंवा हवा है । 'क' + 'समीर' दोनों शब्द मिलकर कसमीर हो गया है। कश्मीर का जल-वायु सर्वश्रेष्ठ है । अपनी जल वायु की उत्तमता के कारण भूखण्ड का नाम कश्मीर पड गया है । और अर्थ लगाया गया है । वायु के कारण जल सतीसर के बाहर निकल गया । अतएव भूखण्ड का नाम कश्मीर पड़ गया । डा० सूफी ने एक मत का प्रतिपादन किया है । उनका मत है । 'कस' का अर्थ होता है धोत 'मीर' का 'अर्थ' पर्वत है । कश्मीर चारों ओर पर्वत से घिरा है । कटोरा जैसा लगता है ।' इसलिए इस भूखण्ड का नाम कश्मीर पड़ गया । कुछ विद्वानो ने कश्मीर शब्द की व्युत्पत्ति को तोड़ मरोड़ कर एक विचित्र मत का प्रतिपादन किया है । उनका मत है । 'कश' एक शामी अर्थात्