राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- ख -
ज्वलन्त उदाहरण है। साम्प्रदायिक उत्तेजना मे कितनी ही मूर्तियां हटा दी गयी है। कितने ही स्थानों पर कब्ज़ा कर उनके अस्तित्व का लोप कर दिया गया है। डोगरा राज्य काल में पुराने स्थानो के संरक्षण में जो प्रगति हुई थी उसका आजादी के पश्चात् लोप हो गया। कुछ स्थानों को पुरातत्व विभाग के आधीन कर उनकी रक्षा का प्रबन्ध निस्सन्देह किया गया है। अनेक स्थानो से शिला खण्ड तथा प्राचीन ईंटें निकाल ली गयी हैं। श्री स्टीन वर्णित परिचय में और वस्तुस्थिति में अन्तर मिलने का यही कारण है। तथापि हमने स्थानो पर जाकर अध्ययन कर वास्तविक स्थिति पर प्रकाश डाला है। स्थानों के निवासी वृद्धों के द्वारा कुछ बातें मालूम हो सकी हैं। उन्हें यथास्थान लिख दिया है। दशवर्ष के संयोजकत्व काल तथा लम्बे काल तक कांग्रेस संसदीय दल के मन्त्री होने के कारण काश्मीर की दैनिक घटनाओं तथा अनुसन्धानों से सम्पर्क रखना पड़ा है। पाश्चात्य लेखकों ने काश्मीर के भूरिचय तथा स्थानों के विषय मे बहुत कुछ लिखा है। जिस समय उन्होंने लिखा था उस समय साधन कम थे। उनमे तथा प्रस्तुत वर्णन में क्या अन्तर है, तथा वास्तविक स्थिति क्या है, उस पर प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर हमने प्रकाश डाला है। कई स्थलों पर हमने नवीन स्थानो की खोज एवं निष्कर्षो का प्रमाण भो उपस्थित किया है। पाद-टिप्पणियों में स्थानों का परिचय उनका मूल तथा विकृत दोनो रूप दिया है। यह कार्य बिना स्थानों का प्रत्यक्ष दर्शन किये सम्भव नही था। जिस समय का इतिहास है उस समय काश्मीर की सम्पूर्ण जनता हिन्दू थी। उनके धार्मिक एवं दैनिक जीवन से स्थानों का सम्बन्ध था। स्थानों का इतिहास वहाँ के निवासियों के वंशीय इतिहास से मिल गया था। आज काश्मीर की ९० प्रतिशत जनता मुस्लिम है। जो हिन्दू हैं वे प्रायः नगरों के निवासी है। वे स्वयं काश्मीर के अनेक स्थानो का इतिहास एवं नाम भूल गये हैं। गुफायें, मन्दिर, मठ, शाला, जनाथय, विहार आदि जियारत, मस्जिद, मज़ार तथा अन्य स्थानो में प्रायः परिणत कर लिये गये हैं। वे कभी हिन्दू स्थान थे, यह विचार वहाँ के लोगों को पसन्द नहीं आते। इसका मैने पद-पद पर अनुभव किया है। वहाँ की मुस्लिम जनता की प्रतिक्रिया अच्छी नहीं होती। प्राचीन गाथाओं के स्थान पर नवीन गाथायें उनके साथ जोडकर, उनके पुराने रूप को बदलकर, उन्हें नवीन जामा पहना दिया गया है। उनके मूल रूप का पता संस्कृत-साहित्य से ही मिलता है। इस समय रहन-सहन, समाज एवं रुचि इतनी शीघ्रता से बदलती जा रही है कि लोग कुछ दिनों में बहुत कुछ भूल जायेंगें; अतएव उन्हें लिपिबद्ध कर देना ऐतिहासिक शोध की दृष्टि से परम आवश्यक है। काश्मीर की सीमा पर, रामायण, महाभारत, पुराण, नीलमत तथा राजतरंगिणी में वर्णित अनेक जातियां रहती थी। उन्हें कालान्तर में लोकोत्तर जातियां किंवा व्यक्ति मान लिया गया। यहाँ हमने प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर उनका स्थान निर्णय तथा परिचय दिया है। उनका उल्लेख परिशिष्ट में किया गया है। ये जिन क्षेत्रों में रहते थे वहाँ मै गया हूँ। उनमें समय व्यतीत किया है। परन्तु धर्म परिवर्तन के साथ अपना इतिहास भूल गया है। अभी तक प्रचलित कुछ रीति-रिवाजों के आधार पर हमने उनकी जानकारी प्राप्त की है। पाकिस्तान अधिकृत भू-भाग का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं हो सका है। उसका वर्णन ग्रन्थों के आधार पर किया गया है। यह ज्ञान अप्रत्यक्ष है। मुझे प्रस्तुत शोध ग्रन्थ के औचित्य के विषय में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है। स्टीन ने भौगोलिक नामों एवं ऐतिहासिक उल्लेखों को स्पष्ट करने का प्रयास किया था किन्तु सांस्कृतिक सामग्री के तुलनात्मक अध्ययन को भी समुचित महत्त्व तथा अवसर न दे सके। आश्चर्य है कि स्टीन के बाद भी किसी ने