राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राक्कथन भारत विभाजन के पश्चात् भारत एवं पाकिस्तान के बीच काश्मीर विवाद का विषय बन गया । काश्मीर का प्रश्न अन्तर्राष्ट्रीय जगत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में चर्चा का विषय हो गया । काश्मीर विधान- सभा तथा भारतीय संसद में भी विभिन्न दलों द्वारा यह प्रश्न उठाया जाता रहा है। अतएव उसका व्यापक अध्ययन अनिवार्य हो गया था। मुसलमानों के कादयान सम्प्रदाय ने कश्मीर का सम्बन्ध हजरत मूसा, सुलेमान, ईशा आदि बाइबिल एवं कुरान वर्णित धार्मिक महात्माओं से जोड़ कर काश्मीर को भारतीय संस्कृति, सभ्यता, धर्म एवं इतिहास से अलग करने का प्रयास आरम्भ किया। काश्मीर का नाम बदल कर 'बाग़-ए-सुलेमान' रख दिया गया। पाकिस्तानी लेखकों ने यह प्रतिपादित करने के लिए पुस्तक ही लिख डाली कि वास्तव में नाम 'कशीर' है न कि 'काश्मीर' । काश्मीर शब्द का पुराण, महाभारत तथा अन्य प्राचीन प्रामाणिक इतिहास ग्रन्थों में उल्लेख है, अतएव पुरातन परम्परा से काश्मीर को अलग करने का अथक परिश्रम किया जाने लगा । इस विषय पर पुस्तकें तथा पैम्फलेट लिखे गये । शंकराचार्य पर्वत का नाम 'तख्ते-सुलेमान' तथा अनन्त नाग का नाम 'इस्लामाबाद' रख दिया गया । इसी प्रकार पुराने स्थानों के नाम बदल कर उनके स्थान पर जियारत शरीफ, मजार पीर आदि रख दिये गये । काश्मीर के काँग्रेस संसदीय दल ने काश्मीर प्रश्न का अध्ययन करने के लिये दल के संसद सदस्यों का एक स्टडी ग्रुप बनाया। मैं इस स्टडी ग्रुप का दस वर्षों तक संयोजक रहा। इस काल में काश्मीर में अनेक बार जाने का अवसर मिला । सुरक्षा विभाग के क्षेत्रों में जो स्थान पड़ गये थे वहाँ सुरक्षा विभाग की सहायता से पहुँच कर उनका अध्ययन किया । संसद में भाषणों, चर्चाओं तथा बाहर काश्मीर इतिहास सम्बन्धी विवादों का उत्तर-प्रत्युत्तर तथा वास्तविकता पर प्रकाश डालने के लिए हमें वक्तव्य देना पड़ा है। संसद तथा बाहर आक्षेपों एवं विवादो का उत्तर देने के लिये काश्मीर के प्राचीन इतिहास एवं भू- परिचय का ज्ञान आवश्यक हो गया । काश्मीर की यात्रा प्रतिवर्ष अध्ययन तथा जानकारी प्राप्त करने के लिये आवश्यक हो गयी थी। इस काल में पाँच बार संसदीय सदस्यों के शिष्टमण्डल के नेता के रूप में काश्मीर जाना पड़ा । किन्तु काश्मीर का बड़ा भूभाग अनधिकृत रूप से पाकिस्तान के पास है। काश्मीर की उत्तरीय एवं पश्चिमीय सीमा पर भारतीय सेनाएँ पड़ी है। उन स्थानों का हमने प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया है। सैनिक छावनी तथा सैनिक प्रभाव क्षेत्र में जाने की सुविधा हमें मिल गयी थी । अतएव हमने उस क्षेत्र के स्थानों तथा जातियों का वर्णन किया है। तरंगिणी काश्मीर का भूगोल उपस्थित करती है। उसमें वर्णित स्थानों तथा जातियों के क्षेत्र में गया हूँ। उनमें जिनका वर्णन नही है उन्हें भी देखा है। काश्मीर के पुराने लोगो तथा विद्वानों से सम्पर्क स्थापित कर सन्देहास्पद प्रश्नों के हल करने का प्रयास किया है । श्री स्टीन के समय और आज के समय में बहुत अन्तर पड़ गया है। स्थानों का रूप बदल गया है। उन्हें पहचानना भी कठिन है। पुराने स्थानों पर नवीन निर्माण हो गये हैं। मैं प्रत्येक वर्णित स्थानों पर गया हूँ। उनमें श्री स्टीन काल से अब तक जो परिवर्तन हो गया है उनका उल्लेख किया है ताकि उनके पहचानने में कठिनता उत्पन्न न हो सके । ध्वंशावशेषो के शिला एवं प्रस्तर खण्ड उठाकर नवीन निर्माणों में लगा दिये गये हैं। कितने ही तोड़कर गिट्टी बनाने के काम में लाये गये हैं। परिहासपुर, कल्हण की जन्मभूमि का ध्वंसावशेष इसका