भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 138

प्रथम तरंग ५९ रसातलंगता येन निष्क्रान्ता सा सरिद्वरा । तस्माद्वितस्तेति कृतं नामैतस्याः स्वयंभुवा ॥ 252 : ३४०,३४१ हरिचरितामृत अध्याय १२ में वितस्ता अव- तरण का वर्णन किया गया है। इस तीर्थ का तीन नाम नील कुंड, वितस्ता तथा शूलघाट प्रसिद्ध हैं। वितस्ता माहात्म्य इस विषय पर यथेष्ट प्रकाश डालता है। नीलमत पुराण इसके माहात्म्य के विषय में उल्लेख करता है। अक्षयं सर्वमुद्दिष्टं दानं श्राद्धं तथा तपः । वितस्तोन्मज्जने स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ 1290 : १५०१,५१०२ ततस्तु सर्वदेशेषु जनः शुश्राव पार्थिव । सती देवी नदी भूत्वा काश्मीराया विनिर्गता ॥ 253 : ३४२,३४३, महापातकसंयुक्तस्तस्यां स्नातुं तदा जनः । आजगाम भयात्तेषां शूलघातनियोजनात् ॥ 254 : ३४४,३४५ मैं जिस समय प्रथम बार यहाँ आया तो इसकी अनुपम भव्य सुंदरता देखकर स्तब्ध हो गया था। निर्देशक जहाँगीर तथा शाहजहाँ का नाम लेकर उनके निर्माण की प्रशंसा कर रहा था। मेरी धारणा हो रही थी। कुंड का पुरा काल में अवश्य अस्तित्व रहा होगा। जीर्ण हो जाने पर जहाँगीर ने उसे मुगल स्थापत्य का जामा पहना दिया है। नीलमत के कुंड शब्द के प्रयोग से स्पष्ट है। इसमे पक्का घाट या पक्का पहल बना था। हिंदुओं का तीर्थ था। हिंदू मुसलमान हो गये। उनके लिए स्थान महत्त्वहीन हो गया। बिना मरम्मत गिरता पड़ता खँडहर बन गया। जहाँगीर सहिष्णु था। कट्टर मुस्लिम धर्मा- नुयायी नहीं था। उसने यहाँ की शोभा देख हिंदुओं का तीर्थ होने पर भी जीर्णोद्धार कराया। आइने अकबरी में अबुलफजल, जिसने जहाँगीर के वर्तमान इमारत बनाने के पूर्व वीर नाग को देखा था, वर्णन करता है, वीर सर बेहत अर्थात् वितस्ता का उद्गम स्थान है। इसके कुंड का क्षेत्रफल एक जरीब होगा। बहुत गहरा है। इससे जल जोर से आवाज के साथ निकलता है। इसका नाम वीरसर है। इसमें पत्थर के बार्डर लगे हैं। इसके पूर्व दिशा में मन्दिर है। जिस समय इस कुंड पर मैं आया था, उस समय कश्मीर के इतिहास लिखने की कल्पना मैंने नहीं की थी। इस ओर अभिरुचि नहीं थी। नील कुंड के प्रथम दर्शन से प्रथम प्रतिक्रिया जो हुई उसका वर्णन किया है। कश्मीर के इतिहास के संबन्ध में गवेषणा करना प्रारम्भ किया तो मेरी धारणा को बल मिलता गया। इसी स्थान के विषय में नहीं अन्य स्थानों को देखकर प्रथम प्रतिक्रियाएँ जो होती रहीं वे प्रायः ठीक उतरती हैं। बर्नियर यहाँ आया था। जहाँगीर ने यहाँ का बाग सन् १६१२-१६१६ ई० के बीच में बनवाया था। वह लिखता है :- 'कहा जाता है कि नूर महल अर्थात नूरजहाँ के इच्छानुसार यह बाग बनवाया था। यहाँ के कुंड की पाली गई मछलियाँ इतनी सोधी हैं। पुकारने पर अथवा रोटी का टुकड़ा कुंड में छोड़ देने पर पास आ जाती हैं।' औरंगजेब के समय जैसा बर्नियर के लेख से प्रकट होता है वहाँ किसी प्रकार का मन्दिर अथवा उसका ध्वंसावशेष नहीं रह गया था। किंतु जहाँगीर अपने पिता के साथ कश्मीर आया था। उस समय उसने कश्मीर के दर्शनीय स्थानों को देखा था। द्वितीय जुलूस वर्ष अर्थात् सन् १६०७ ई० में यहाँ जहाँगीर आया था। वह अपनी आत्मकथा में लिखता है- 'झेलम नदी का स्रोत काश्मीर में वीर नाग नामक एक चश्मा है। हिंदीभाषा में नाग सर्प को कहते हैं। ज्ञात होता है उस स्थान में पहले सर्प रहा