राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ राजतरंगिणी गुहोन्मुखा नागमुखापोतभूपिया रुचिम् । गौरा यत्र वितस्तात्वं याताऽप्युज्झति नोचिताम् ॥ २६ ॥ २६. उसका छत्र नीलकुण्ड तथा दंड वितस्ता नदी है। १ गुहाश्रिता देवी गुहोन्मुखी नागों को जलपान करानेवाली नागपीत पयःस्वरूप गौरी ने अपने दोनों कार्य गुणों तथा नागपीत पय को त्यागकर गुहोन्मुखत्व तथा नागपीत पयत्व दोनों धर्मों का पालन करती है।
मंदिर तोड़कर मस्जिद कुव्वते इस्लाम कुतुबुद्दीन ऐबक के समय बनाई गई थी। उसे अल्तमश ने और बढ़ाया था। अलाउद्दीन खिलजी ने इस मस्जिद को और बड़ा रूप देने का प्रयास किया था। उसके ठीक दूसरी तरफ मस्जिद के वाम पार्श्व में कुतुबमीनार जैसी मीनार बनाना चाहता था। उसका नाम अलाई मीनार है। यह पूरी बन नहीं सकी। ध्वंसावस्था में आज भी देखी जा सकती है। अलाउद्दीन ने यहाँ पर अलाई दरवाजा भी बनवाया है। यह आज तक सुरक्षित है। अलाउद्दीन खिलजी तथा अल्तमश दोनों की मज़ारें यहाँ पर बनी हैं। चंद्रगुप्त के लौहस्तम्भ पर खुदे अभिलेख से पता लगा है कि वही स्थान नीलमतवर्णित विष्णुपद है। यहाँ गंगाद्वार का उल्लेख हरिद्वार के समीप- वर्ती क्षेत्र के लिये किया गया है। कनखल का उल्लेख नील पर्वत तथा गंगाद्वार का स्थान स्पष्ट कर देता है। गंगाद्वार में एक नील पर्वत का वर्णन मिलता है। कहा गया है कि वहाँ स्नान करने पर मनुष्यों के पाप नष्ट हो जाते हैं गंगाद्वारे कुशावर्ते विल्वके नीलपर्वते । तथा कनखले स्नात्वा धूतपाप्मा दिवं व्रजेत् ॥ —म० अनुशासन पर्व २५:१३ जैन उत्तराध्ययन सूत्र (११:२८.४९) के अनुसार सीता नदी का उद्गम स्थान नील पर्वत है। नील पर्वत के दक्षिण में हिमालय पर्वत का स्थान माना गया है। इस नदी को गंभीर अर्थात् गहरी तथा दुरतिक्रम मार्कंडेय पुराण ने बताया है। कुछ विद्वान् सीता नदी को क्षारमंद किंवा अरफया नदी बताते हैं। सीता नदी वास्तव में सीर दरया है। सीता नदी का प्राचीन भौगोलिक वर्णन सीर दरया से मिलता है। आधुनिक विद्वानों ने सीर दरया को सीता नदी माना है। विष्णु पुराण (२:२:१०) के अनुसार नील पर्वत की गणना वर्ष पर्वत में की गई है। उसकी स्थिति सुमेरु के उत्तर में है। उत्तर में ही श्वेत शृंगी वर्ष को बताया गया है। तेनायं प्रणिधाय भूमिपतिना भावेन विष्णोः मतिम् । प्रांशुर्विष्णुपदे गिरौ भगवतो विष्णोर्ध्वजः स्थापितः ॥ आश्चर्य है कि नीलमत पुराण में मुझे इंद्रप्रस्थ तथा हस्तिनापुर का नाम नहीं मिला। विष्णुपद पर्वत के वर्णन से प्रतीत होता है कि नीलमत पुराण- कार को इंद्रप्रस्थ किंवा दिल्ली का ज्ञान था। पांडवों का वर्णन, कृष्ण का वर्णन, मथुरा आदि का नाम आने पर भी इंद्रप्रस्थ तथा हस्तिनापुर का न होना इस बात का प्रमाण है कि दिल्ली का महत्त्व केवल विष्णुपद पर्वत के कारण था। द्वितीय चंद्र- गुप्त के कुतुबमीनार किंवा महरौली के विष्णो- ध्वज स्तम्भ में इन्द्रप्रस्थ आदि का नाम नहीं दिया गया है। पाठभेद : श्लोक २६ में 'नागमुखा' का नागमुखी' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २६ : १) छत्र और दंड : कल्हण ने यहाँ पुनः सुंदर तथ्यपूर्ण उपमा दी है। यदि नीलकुण्ड की इमारत के ऊपर खड़ा होकर प्राकृतिक दृश्य देखें तो अठपहला नीलकुण्ड वास्तव में छत्र तुल्य तथा