भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग ६३ शङ्खपद्ममुखैर्नागैर्नानारत्नावभासिभिः । नगरं धनदस्येव निधिभिर्यन्निषेव्यते ॥ ३० ॥ ३०. विविध रत्नभांडों से विभूषित शंख पद्मादि नागों का कश्मीर मंडल कुबेर पुरी तुल्य आश्रय स्थान है । उससे समुद्रयात्रा निमित्त निकली जल स्रोत रेखा छत्रदंड तुल्य लगेगी । इस समय नील कुंड किंवा वेरीनाग का जल जहाँगीर तथा शाहजहाँ द्वारा निर्मित सोधी नहर जैसा बहता निकलता है । प्राचीन काल में जल निकलने की अवश्य कोई नहर किंवा प्रणाली रही होगी । कल्हण उसी जल रेखा का दंड तथा अष्टको णों में नील कुंड की उपमा छत्र से यहाँ देता है । ( २ ) नाग : कश्मीर में नाग जलस्रोत तथा जलप्रपात को कहते हैं । कश्मीर के जलस्रोतों तथा सरोवरों का देवता नाग तथा नागी है । ये देवता जलाशयों तथा जलस्रोतों में निवास करते हैं । बड़े जल स्रोत को नाग तथा छोटे को नागी कहा जाता है । नीलमत पुराण में अत्यधिक देवस्थानों तथा तीर्थों का स्थान जलस्रोतों तथा जलाशयों के समीप है । उनसे संबंधित है । नामरूप से उनकी पूजा अनादि काल से होती आई है । कश्मीर उपत्यका की मुस्लिम जनता में विश्वास व्याप्त है। नाग जलस्थानों में रहते हैं । मुसलमान होने पर भी वे नागों के प्रति आदर प्रकट करते हैं । चाहे उसकी पूजा करने से विरत भले ही हो गये हैं । निर्झरों तथा चश्मों से निकलती टेढी मेढी उज्ज्वल जल धारा नागों के रेंगने की तरह लगती है । अतएव उनके देखने से अनायास नागकी कल्पना मन में उठ जाती है । आइने अकबरी से प्रकट होता है कि जिस समय अकबर १६ वीं शताब्दी में आया था कश्मीर में ७०० स्थानों में नागपूजा होती थी । इस समय तक यह विश्वास तथा संस्कार लोगों में जमा है कि नाग सर्प के रूपमें निवास करते हैं। वे जल- स्रोतों अथवा जलाशयों में रहते हैं । जलाशयों की रक्षा करते हैं । राजतरंगिणी के वर्णन ( ४:६०१, ७:१७१ ) से प्रकट होता है कि हजारों वर्षों से इस प्रकार का संस्कार लोगों के हृदयो में बैठ गया था । यह भी धारणा व्याप्त थी । नाग मानवरूप धारण कर प्रकट होते थे । राजतरंगिणी में नाग सुश्रुवा तथा उसकी कन्या के कथानक से यह बात सिद्ध होती है । वे मेघ, महाशिला किंवा हिमवृष्टि का रूप ( रा० त० १.१७९, २२९, २.१६ ) धारण कर लेते थे । लोगों को त्रस्त करते थे । भयभीत करते थे । पादटिप्पणियाँ : ३० ( १ ) शंख तथा पद्म नाग का वर्णन नील- मत पुराण में किया गया है । कश्मीर के नागानों की महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं रखते हैं । परम्परा से नीलमत पुराण में नागाओं की तालिका के क्रम में उनका १२ वाँ स्थान आता है । शंखाक्षः कमलाक्षश्च मणिनागो वहैवकाः ॥ ९१४ : १०९१ पद्म नाग का नीलमत पुराण ( श्लोक 884: १०५४ ) में दो बार उल्लेख आया है । दो महापद्म नागों के अतिरिक्त इनकी क्रमसंख्या २६ वीं आती है । शंख नाग का स्थान कश्मीर में कहाँ पर है उसका वर्तमान परिवर्तित नाम क्या है ? अभी तक पता नहीं चल पाया है । शंखपाल नाग शंखनाग से भिन्न है । पद्म नाग को प्रोफेसर बह्लर महा- पद्म नाग मानते हैं । यह ऊलर लेक का नामधारी देवता है । इसका उल्लेख राजतरंगिणी ( ४:५९३ )