भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 984 में से

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६४ राजतरंगिणी में आया है। श्रीकण्ठचरित (३.६) तथा जोन- राज ने महापद्म नाम से ही ऊलर लेक का सम्बो- धन किया है। स्टीन ने पद्म नाग को महापद्म नाग माना है। वह प्रमाण देते हैं। श्रीवर ने (१ ३३५) क्रमराज के बाढ़ के समय पद्मनगर से पानी प्राप्त करने का उल्लेख किया है। यह पद्मनगर ऊलर लेक के अतिरिक्त दूसरा कोई भिन्न सर नहीं हो सकता है। राजतरंगिणी, तरंग ४, श्लोक ८५ में पद्मनाग का उल्लेख भवतुंग के समीप हुए युद्ध के प्रसंग मे आया है। भवतुंग ग्राम बोतुंग गाँव है। जैनगिर परगना मे ऊलर लेकके पश्चिमी तट पर स्थित है। वितस्ता माहात्म्य (१४ ३५) में रत्नचूड़ नाग का उल्लेख है। पद्म सर के समीप आर्येस के पास है। यह सुक्रहोम परगना में अलुस ग्राम से ऊलर लेक के उत्तर-पश्चिम स्थित है। ऊलर लेक को महापद्म सर कहते हैं। भविष्य पुराण के ब्राह्म खण्ड मे नाग जाति का उल्लेख है। महापद्म नाग तथा पद्मनाग दो भिन्न नाग हैं। दोनो के रंग, दृष्टि, दशा तथा चिह्नों मे भिन्नता है। उनके कारण दोनो को पहचाना जा सकता है। महापद्म नाग का वर्ण वैश्य है। रंग पीत है। दृष्टि खाली है। दिशा वायव्य है। उसका चिह्न शूल है। पद्म नाग का वर्ण शूद्र है। रंग कृष्ण है। दृष्टि चंचल है। दिशा पश्चिम है। चिह्न पद्म है। शंखपाल किंवा शंखनाग का वर्ण क्षत्रिय है। रंग श्यामल है। दृष्टि निश्चेष्ट है। दिशा उत्तर है। चिह्न छत्र है। महापद्म तथा पद्म सर दोनों शब्दो का प्रयोग कालांतर में ऊलर लेक के लिये किया जाने लगा। कद्रू तथा विनता के पारस्परिक संघर्ष के कारण कद्रू की नाग संतानों ने विनता के पुत्र गरुड़ के भय से सतीसर में जाकर शरण ली। भगवान् विष्णु ने उन्हें शरण दी। काश्मीर उपत्यका के उत्तरी तथा दक्षिणी पर्वतमालाओं को उपमा नागो के बाहुओं से दी गई है। विशेष विवरण परिशिष्ट में द्रष्टव्य है। शंख नाग : फणिं वृश्चिं तथा निद्रां धनेशां नदकृद्वगम् । शंखपद्मौ निधी पूज्यौ भद्रकाली सरस्वती ॥ —585 : ७०६ पुत्निका शंखसख्यो च पालाशः रोदिमो यदिः । —889 हिलिहालः शंखपालो नागो चन्दननन्दनौ ॥ —883 : १०५३ शंख, शंखपाल तथा शंखाक्ष तीनो नाग भिन्न हैं। द्वौ पद्मौ द्वौ महापद्मौ द्वौ कालो द्वौ च कर्कोटकौ । द्वौ समुद्रौ समुद्राणौ द्वौ गर्तो द्वौ च तक्षकौ ॥ —884 : १०५४, १०५५ कश्यप तथा कद्रू द्वारा शंख नाग की उत्पत्ति हुई थी। सुमनाख्यो दधिमुखस्तथा विमलपिण्डकः । आप्तः करोटिरुद्दैश्च शंखः कालशिरस्तथा ॥ —आदिपर्व ३५ : ८ भगवान् नारद ने मातलि को शंख नाग का परिचय दिया था। सुमनो मुखो दधिमुखः शंखो नन्दोपनन्दकौ । आप्तः कोटरकश्चैव शिखि निष्ठुरिकस्तथा ॥ —उद्योगपर्व १०३ : १२ बलराम के स्वर्ग गमन के अवसर पर शंख नाग के आने का उल्लेख मिलता है। कर्कोटको वासुकिस्तक्षकश्च पृथुश्रवा अरुणः कुंजरश्च । मिश्रीशंखकुमुदः पुण्डरीकस्तथा नागो धृतराष्ट्रो महात्मा॥ —म० मौसलपर्व ४ : १७५ शंख तीर्थ : सरस्वती नदी के तट पर एक प्राचीन तीर्थ था। कश्मीर मे लार परगना के धरिन्छ लेक के समीप शंख नाग का स्थान माना गया है।

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