भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग ६५ उच्चावचांस्तथा भक्ष्यान् विप्रेभ्यो विप्रदाय सः । नीलवासास्तथा गच्छेदृक्षलतीर्थं महायशाः ॥१९ तत्रायच्छन्महाशंखं महामेरुमिवोच्छ्रितम् । श्वेतपर्वतसंकाशं ऋषिगन्धैर्निषेवितम् ॥२० सरस्वत्यास्तटे जातं नगं तालध्वजो बली । यक्ष विद्याधराश्चैव राक्षसाश्चाभितौजसः ॥२१ —म० शल्यपर्व ३७ : १९-२६ योगवासिष्ठ रामायण में महापद्म सर का उल्लेख कश्मीर के संदर्भ में किया गया है। कल्हण ने महापद्मसर अर्थात् उलर लेक का उतना सुन्दर वर्णन नहीं किया है जितना योगवासिष्ठ जैसे महान् ग्रन्थ में उपलब्ध है । जिन लोगों ने महापद्मसर को देखा है, यदि वे योगवासिष्ठ का वर्णन पढ़ें तो उन्हे प्रतीत होगा, जैसे कोई लेखक आज के लेक का आँखों देखा वर्णन लिख रहा है । वर्णन किया गया है : 'महापद्मसर कमल दल द्वारा पूर्ण रहता है। उसमें मछलियाँ होती हैं । ग्रीष्म काल में सारस विहार करते हैं ।' योगवासिष्ठ में महापद्म के साथ ही साथ पद्मसर की भी संज्ञा महापद्म के लिये दी गयी है । महापद्म तथा पद्मसर दोनों एक ही हैं । स्टीन का अनुमान सत्य है महापद्म सर पद्मसर है । स्टीन योगवासिष्ठ नही देखा था । 'अन्यथा उसका उल्लेख करता । स्टीन ने कितना गहन अध्य- यन कश्मीर के सम्बन्ध में किया था । यह इसी एक बात से अनुमान लगाया जा सकता है । महर्षि वाल्मीकि योगवासिष्ठ में महापद्मसर का वर्णन करते हैं, "पद्मसर श्वेत कमल पंक्तियों की माला से युक्त है । शेवाल, तरंगों से अत्यन्त सुशो- भित है। नील कमल की लताओं से पूर्ण है। आश्चर्य शीतल है ।" ( योगवासिष्ठ स्थिति प्रकरण ३२ : ५०१० ) निस्संदेह यह वर्णन आज भी महापद्मसर का जीता जागता रूप उपस्थित करता है। पद्मसर में सारस, नील कमल, उज्ज्वल कमल तथा पर्वती ९ शीतल मंद मंद समीरण में, हल्की लहरें, कश्मीर की अभिरामता बढ़ा देती हैं जिसे कोई पर्यटक भूल नहीं सकता । नाग एक जाति थी । वे मनुष्य थे । उनका यथास्थान विस्तृत वर्णन परिशिष्ट में किया गया है। भारतवर्ष में नागों के दो राज्य थे । मथुरा में सात नाग राजाओं ने राज्य किया था । इसी प्रकार चम्पावती में नव नाग राजाओं ने राज्य किया था । —वायु पुराण: ९८ : ४५३, ९९ : ३८२; ब्रह्माण्ड पुराण ३ : ७४ : १९४-५ २६७ । नवद्वीपों में इंद्रद्वीप, कसेरुमान, ताम्रवर्णी, गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य द्वीप, गन्धर्व द्वीप तथा कुमारी द्वीप हैं। इसमें नाग द्वीप का उल्लेख किया गया है । इससे प्रकट होता है। नाग जाति का एक देश था। वहाँ उनकी आबादी थी । राजशेखर ने काव्य मीमांसा में सम्राट् तथा चक्रवर्ती के अवधारणा के संदर्भ में विचार करते हुए नाग द्वीप का उल्लेख किया है । नागद्वीप का उल्लेख महाभारत ( भीष्मपर्व ६ : ५५ ) में है । उसे सुदर्शन द्वीप के अन्तर्गत एक द्वीप माना गया है । वह शशिमंडल की शशाकृति में कानस्वरूप दृष्टिगोचर होता है। नागद्वीप का उल्लेख पुराणों में विस्तृत रूप से देखा जा सकता है। ( भागवत ५:१६:२६; पद्मपुराण, सृष्टिखंड ३१ ) विष्णुपुराण अंश ४६३ में पद्मवतीपुरी में नाग लोगों के उपभोग करने का वर्णन किया गया है। अमरकोशकार ने नाग शब्द की परिभाषा की है—'अधो भुवनं पाताल-बलिसद्म-रसातलम् । नाग- लोकोऽथ कुहरं सुषिरं विवरं बिलम् ।' पाताल, रसातल और बलि का घर नाग लोकांतर्गत हैं । अमेरिका को कुछ लेखक पाताल देश मानते हैं । इस विवाद में न पड़कर यही कहना अलम् होगा । अमेरिका के मूल निवासी रेड इंडियनों में नाग पूजा प्रचलित थी । नाग की आकृतियाँ शिलाओं पर उत्कीर्ण मिली हैं ।