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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

६४ राजतरंगिणी में आया है। श्रीकण्ठचरित (३.६) तथा जोन- राज ने महापद्म नाम से ही ऊलर लेक का सम्बो- धन किया है। स्टीन ने पद्म नाग को महापद्म नाग माना है। वह प्रमाण देते हैं। श्रीवर ने (१ ३३५) क्रमराज के बाढ़ के समय पद्मनगर से पानी प्राप्त करने का उल्लेख किया है। यह पद्मनगर ऊलर लेक के अतिरिक्त दूसरा कोई भिन्न सर नहीं हो सकता है। राजतरंगिणी, तरंग ४, श्लोक ८५ में पद्मनाग का उल्लेख भवतुंग के समीप हुए युद्ध के प्रसंग मे आया है। भवतुंग ग्राम बोतुंग गाँव है। जैनगिर परगना मे ऊलर लेकके पश्चिमी तट पर स्थित है। वितस्ता माहात्म्य (१४ ३५) में रत्नचूड़ नाग का उल्लेख है। पद्म सर के समीप आर्येस के पास है। यह सुक्रहोम परगना में अलुस ग्राम से ऊलर लेक के उत्तर-पश्चिम स्थित है। ऊलर लेक को महापद्म सर कहते हैं। भविष्य पुराण के ब्राह्म खण्ड मे नाग जाति का उल्लेख है। महापद्म नाग तथा पद्मनाग दो भिन्न नाग हैं। दोनो के रंग, दृष्टि, दशा तथा चिह्नों मे भिन्नता है। उनके कारण दोनो को पहचाना जा सकता है। महापद्म नाग का वर्ण वैश्य है। रंग पीत है। दृष्टि खाली है। दिशा वायव्य है। उसका चिह्न शूल है। पद्म नाग का वर्ण शूद्र है। रंग कृष्ण है। दृष्टि चंचल है। दिशा पश्चिम है। चिह्न पद्म है। शंखपाल किंवा शंखनाग का वर्ण क्षत्रिय है। रंग श्यामल है। दृष्टि निश्चेष्ट है। दिशा उत्तर है। चिह्न छत्र है। महापद्म तथा पद्म सर दोनों शब्दो का प्रयोग कालांतर में ऊलर लेक के लिये किया जाने लगा। कद्रू तथा विनता के पारस्परिक संघर्ष के कारण कद्रू की नाग संतानों ने विनता के पुत्र गरुड़ के भय से सतीसर में जाकर शरण ली। भगवान् विष्णु ने उन्हें शरण दी। काश्मीर उपत्यका के उत्तरी तथा दक्षिणी पर्वतमालाओं को उपमा नागो के बाहुओं से दी गई है। विशेष विवरण परिशिष्ट में द्रष्टव्य है। शंख नाग : फणिं वृश्चिं तथा निद्रां धनेशां नदकृद्वगम् । शंखपद्मौ निधी पूज्यौ भद्रकाली सरस्वती ॥ —585 : ७०६ पुत्निका शंखसख्यो च पालाशः रोदिमो यदिः । —889 हिलिहालः शंखपालो नागो चन्दननन्दनौ ॥ —883 : १०५३ शंख, शंखपाल तथा शंखाक्ष तीनो नाग भिन्न हैं। द्वौ पद्मौ द्वौ महापद्मौ द्वौ कालो द्वौ च कर्कोटकौ । द्वौ समुद्रौ समुद्राणौ द्वौ गर्तो द्वौ च तक्षकौ ॥ —884 : १०५४, १०५५ कश्यप तथा कद्रू द्वारा शंख नाग की उत्पत्ति हुई थी। सुमनाख्यो दधिमुखस्तथा विमलपिण्डकः । आप्तः करोटिरुद्दैश्च शंखः कालशिरस्तथा ॥ —आदिपर्व ३५ : ८ भगवान् नारद ने मातलि को शंख नाग का परिचय दिया था। सुमनो मुखो दधिमुखः शंखो नन्दोपनन्दकौ । आप्तः कोटरकश्चैव शिखि निष्ठुरिकस्तथा ॥ —उद्योगपर्व १०३ : १२ बलराम के स्वर्ग गमन के अवसर पर शंख नाग के आने का उल्लेख मिलता है। कर्कोटको वासुकिस्तक्षकश्च पृथुश्रवा अरुणः कुंजरश्च । मिश्रीशंखकुमुदः पुण्डरीकस्तथा नागो धृतराष्ट्रो महात्मा॥ —म० मौसलपर्व ४ : १७५ शंख तीर्थ : सरस्वती नदी के तट पर एक प्राचीन तीर्थ था। कश्मीर मे लार परगना के धरिन्छ लेक के समीप शंख नाग का स्थान माना गया है।

प्रथम तरंग ६५ उच्चावचांस्तथा भक्ष्यान् विप्रेभ्यो विप्रदाय सः । नीलवासास्तथा गच्छेदृक्षलतीर्थं महायशाः ॥१९ तत्रायच्छन्महाशंखं महामेरुमिवोच्छ्रितम् । श्वेतपर्वतसंकाशं ऋषिगन्धैर्निषेवितम् ॥२० सरस्वत्यास्तटे जातं नगं तालध्वजो बली । यक्ष विद्याधराश्चैव राक्षसाश्चाभितौजसः ॥२१ —म० शल्यपर्व ३७ : १९-२६ योगवासिष्ठ रामायण में महापद्म सर का उल्लेख कश्मीर के संदर्भ में किया गया है। कल्हण ने महापद्मसर अर्थात् उलर लेक का उतना सुन्दर वर्णन नहीं किया है जितना योगवासिष्ठ जैसे महान् ग्रन्थ में उपलब्ध है । जिन लोगों ने महापद्मसर को देखा है, यदि वे योगवासिष्ठ का वर्णन पढ़ें तो उन्हे प्रतीत होगा, जैसे कोई लेखक आज के लेक का आँखों देखा वर्णन लिख रहा है । वर्णन किया गया है : 'महापद्मसर कमल दल द्वारा पूर्ण रहता है। उसमें मछलियाँ होती हैं । ग्रीष्म काल में सारस विहार करते हैं ।' योगवासिष्ठ में महापद्म के साथ ही साथ पद्मसर की भी संज्ञा महापद्म के लिये दी गयी है । महापद्म तथा पद्मसर दोनों एक ही हैं । स्टीन का अनुमान सत्य है महापद्म सर पद्मसर है । स्टीन योगवासिष्ठ नही देखा था । 'अन्यथा उसका उल्लेख करता । स्टीन ने कितना गहन अध्य- यन कश्मीर के सम्बन्ध में किया था । यह इसी एक बात से अनुमान लगाया जा सकता है । महर्षि वाल्मीकि योगवासिष्ठ में महापद्मसर का वर्णन करते हैं, "पद्मसर श्वेत कमल पंक्तियों की माला से युक्त है । शेवाल, तरंगों से अत्यन्त सुशो- भित है। नील कमल की लताओं से पूर्ण है। आश्चर्य शीतल है ।" ( योगवासिष्ठ स्थिति प्रकरण ३२ : ५०१० ) निस्संदेह यह वर्णन आज भी महापद्मसर का जीता जागता रूप उपस्थित करता है। पद्मसर में सारस, नील कमल, उज्ज्वल कमल तथा पर्वती ९ शीतल मंद मंद समीरण में, हल्की लहरें, कश्मीर की अभिरामता बढ़ा देती हैं जिसे कोई पर्यटक भूल नहीं सकता । नाग एक जाति थी । वे मनुष्य थे । उनका यथास्थान विस्तृत वर्णन परिशिष्ट में किया गया है। भारतवर्ष में नागों के दो राज्य थे । मथुरा में सात नाग राजाओं ने राज्य किया था । इसी प्रकार चम्पावती में नव नाग राजाओं ने राज्य किया था । —वायु पुराण: ९८ : ४५३, ९९ : ३८२; ब्रह्माण्ड पुराण ३ : ७४ : १९४-५ २६७ । नवद्वीपों में इंद्रद्वीप, कसेरुमान, ताम्रवर्णी, गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य द्वीप, गन्धर्व द्वीप तथा कुमारी द्वीप हैं। इसमें नाग द्वीप का उल्लेख किया गया है । इससे प्रकट होता है। नाग जाति का एक देश था। वहाँ उनकी आबादी थी । राजशेखर ने काव्य मीमांसा में सम्राट् तथा चक्रवर्ती के अवधारणा के संदर्भ में विचार करते हुए नाग द्वीप का उल्लेख किया है । नागद्वीप का उल्लेख महाभारत ( भीष्मपर्व ६ : ५५ ) में है । उसे सुदर्शन द्वीप के अन्तर्गत एक द्वीप माना गया है । वह शशिमंडल की शशाकृति में कानस्वरूप दृष्टिगोचर होता है। नागद्वीप का उल्लेख पुराणों में विस्तृत रूप से देखा जा सकता है। ( भागवत ५:१६:२६; पद्मपुराण, सृष्टिखंड ३१ ) विष्णुपुराण अंश ४६३ में पद्मवतीपुरी में नाग लोगों के उपभोग करने का वर्णन किया गया है। अमरकोशकार ने नाग शब्द की परिभाषा की है—'अधो भुवनं पाताल-बलिसद्म-रसातलम् । नाग- लोकोऽथ कुहरं सुषिरं विवरं बिलम् ।' पाताल, रसातल और बलि का घर नाग लोकांतर्गत हैं । अमेरिका को कुछ लेखक पाताल देश मानते हैं । इस विवाद में न पड़कर यही कहना अलम् होगा । अमेरिका के मूल निवासी रेड इंडियनों में नाग पूजा प्रचलित थी । नाग की आकृतियाँ शिलाओं पर उत्कीर्ण मिली हैं ।

६६ राजतरंगिणी यत्तार्क्यभीत्या प्राप्तानां नागानां गुप्तये ध्रुवम् । प्रसारितभुजं पृष्ठे शैलप्राकारलीलया ॥३१॥ ३१. काश्मीर मंडल की प्राकार-स्वरूप पर्वतमालाएं जैसे भुजाएँ उठाये गरुड़ द्वारा ताड़ित शरणागत नागों की रक्षा कर रही हैं। भुक्तिमुक्तिफलप्राप्तिः काष्ठरूपमुमापतिम् । पापसूदनतीर्थान्तर्यत्र संस्पृशतां भवेत् ॥३२॥ ३२. पापसूदन१ तीर्थ में काष्ठ-स्वरूप उमापति के दर्शन एवं स्पर्श द्वारा भोग तथा मोक्ष दोनों फलों की प्राप्ति होती है। अफगानिस्तान का एक वर्ग नागवंशी कहा जाता है। बंगाल में एक वंश का पदगौरव नाग है। वे अपने को नागवंशीय कहते हैं। बंगाल के नाग महाशयों का गोत्र वासुकी नाग है। वासुकी नाग का स्थान कश्मीर का भद्रवा अंचल है। विशेष अध्ययन के लिए 'नाग' परिशिष्ट द्रष्टव्य है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३२ में 'काष्ठरूपम्' का 'कप- टेश्वरम्' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३२ (१) पापसूदन तीर्थ : वेरी नाग के लग- भग १० मील दूर अरपथ उपत्यका में पापसूदन तीर्थ स्थित है। पापसूदन तीर्थ का पवित्र जलकुंड कप- टेश्वर नाम से पूजित होता है। काकर ग्राम के निकट, परगना कुयर अर्थात् कपटेश्वर में एक अत्यन्त निर्मल जलपूर्ण कुंड है। वह एक जलस्रोत को बाँध- कर बनाया गया है। भगवान् शिव की कपटेश्वर नाम से यहाँ पूजा होती है। ये यहाँ कपट अर्थात् लकड़ी के रूप में जल पर तैरते प्रकट होते हैं। कप- टेश्वर के सम्बन्ध में एक पुरानी गाथा है— 'शिव दर्शन के इच्छुक ऋषि तथा मुनिगण दृषद्वती नदी के किनारे कुरुक्षेत्र में प्रस्थान किए। रात्रि में उन्हें शिव ने स्वप्न दिया। झील के निकास स्थान कश्मीर में वे जाँय। आनेपर उन लोगों ने वहाँ केवल लकड़ी के टुकड़े देखे। उसे उन्होंने इधर उधर फेंक दिया। कुछ समय पश्चात् कपटेश्वर में जल वेग से निकलने लगा। उन्होंने उसमें स्नान किया। स्नान करते ही ऋषि रुद्र हो गये। केवल वसिष्ठ अर्थात् गोरपराशर को कुछ कौतूहल हुआ। उन्होंने स्नान नही किया। वे उप- वास करने लगे। उनका शरीर सूख गया। शिव ने स्वप्न में उन्हें दर्शन दिया। उनसे वर माँगने के लिये कहा। वसिष्ठ ने निवेदन किया— 'आप सर्वदा इस पवित्र जलाशय में काष्ठ के टुकड़े तथा जल के रूप में निवास कीजिए। कलियुग में लोग काष्ठ रूप आपका दर्शन तथा स्नान कर पाप मुक्त हो जाँय।' शिव ने वर दिया। उसीके फल स्वरूप कपटेश्वर में जल पूर्ण रहता है और काष्ठ रूप में भगवान् प्रकट होते रहते हैं। मालवराज राजा भोज ने पुष्कल धन व्यय कर कपटेश्वर के कुंड का निर्माण कराया था। राजा यहाँ के पवित्र जल द्वारा नित्य मार्जन करते थे। उनकी यह प्रतिज्ञा थी। काँच कलश में कपटेश्वर का जल प्रतिदिन कश्मीर से मालवा भेजा जाता था। तत्कालीन कुंड निर्माण के भग्न विशाल शिला खंड यहाँ यत्र-तत्र पड़े है। गोलाकार कुंड है। शिला प्राकार द्वारा परि- वेष्टित है। उन्नीस वर्गगज क्षेत्रफल होगा। इस तीर्थ का उल्लेख नीलमत पुराण तथा हरिवरितामृत दोनो मे है। उसी के आधार पर कपटेश्वर माहात्म्य की रचना की गई है।

प्रथम तरंग ६७ अलवेरूनी कुंड के विषय में अपनी पुस्तक दृष्ट्वा धनेश्वरं देवं वितस्ताहासमीपतः । ( भाग २ पृष्ठ १८१ ) में एक गाथा का उल्लेख कपटेश्वरपार्श्वे च दृष्ट्वाऽगस्त्येन निर्मितम् ॥ करता है। कश्मीरियों से सुनकर लिखा था। उसने —100 : १७७८ स्वयं इस स्थान की यात्रा नहीं की थी। अन्यथा वह अपनी नैसर्गिक प्रतिभा से यहाँ के प्राकृतिक तोयमप्यगतं दृष्ट्वा संप्राप्तं कपटेश्वरम् । दृश्य का इतना सुन्दर वर्णन करता कि वह स्वयं गोसहस्रमवाप्नोति संपूज्याभीप्सतां गतिम् ॥ एक ऐतिहासिक काव्य हो जाता। वह कहता है— 920—१०२९:१२०२ 'महादेव द्वारा प्रेषित लकडी के टुकडे प्रतिवर्ष कुंड में उतराते हैं। इस कुंड का नाम कुंडैशह किंवा कपटेश्वर इत्युक्तं देवदेवस्य शूलिनः । कवडेइवर है। यह वितस्ता नदी के उद्गम स्थल के पुण्यमायतनं तस्य समुत्पत्तिं वदस्व मे ॥ वाम दिशा में स्थित है। यह आश्चर्यजनक घटना —1125 : १३२९ वैशाख मास के मध्य काल में होती है।' रुद्रलोकमवाप्नोति स्नात्वा तु कपटेश्वरे । हरचरितामृत (अध्याय १४:१२२) में इस विश्वलिंगह्रदे स्नात्वा रुद्रलोके महीयते ॥ स्थान का उल्लेख मिलता है। यहाँ का वर्णन तथा —1302 : १५१६ तीर्थ यात्रा का जो समय अलवेरुनी ने दिया है वह माहात्म्य में दिये गये समय तथा वर्णन से मिलता नीलमत पुराण में कपटेश्वर माहात्म्य के है। अलवेरुनी ने जिन सूत्रों के आधार पर यहाँ का विषय में निम्नलिखित वर्णन मिलता है। वर्णन लिखा है वह सत्य प्रतीत होता है। गौरपाराशर उवाच : अबुल फजल आइने अकबरी में कपटेश्वर के वरश्च दीयते देव मम कामांगनाशन । विषय में लिखता है-'अलवेरनी का कवडेइवर शब्द ऋषिभिस्त्वं यथा दृष्टः काष्ठरूपी महेश्वरः ॥ कपटेश्वर का अपभ्रंश है। कोटेहर ग्राम में एक —1143 : १३४८, १३४९ गहरा झरना है। उसके चारों ओर मंदिर बने हैं। इसका पानी जब घटता है तो चंदन की लकड़ी के महेश्वर उवाच : रूप में महादेव प्रकट होते हैं।" द्रक्ष्यन्ति ये जनाः सर्वे काष्ठरूपं समास्थितम् । कदाचिद् द्विजशार्दूल सर्वकालं तु न द्विज ॥ कल्हण ने (रा० त० ७:१९०) कपटेश्वर का —1143 : १३५०, १३५१ उल्लेख किया है। राजा मुचकुंद यहाँ के जल से स्वस्थ हो गये थे। स्थानीय जनश्रुति है। जल में अयं च सततं नन्दी काष्ठरूपी गणो मम । विलक्षण स्वास्थ्यदायक शक्ति है। कथासरित्सागर दर्शनं दास्यते नृणां तदनुग्रहकाम्यया ॥ में सोमदेव भट्ट ने कश्मीर में जाकर शिव पूजा —1144 : १३५३ के माहात्म्य का वर्णन किया है। कपटेश्वर में शिव पूजा का उल्लेख करते हुए लिखता है— मां च दृष्ट्वा न यास्यन्ति स्वशरीरेण रुद्रताम् । 'सुरेश्वर्याद्रिपु तया विजये कपटेश्वरे' कपटेन च दास्यामि नराणां दर्शनं यदा (९:१:४८) —1145 : १३५४, १३५५, नीलमत पुराण में कपटेश्वर के संबंध में निम्न- तदा संज्ञामवाप्स्यामि कपटेश्वर इत्यतः । लिखित उल्लेख मिलता है— तोयस्य बहुलीभावो देशेऽस्मिन् ब्राह्मणोत्तम ॥ —1146 : १३५५, १३५६

इस चित्र में कोई पाठ या सामग्री उपलब्ध नहीं है (चित्र रिक्त/खाली है)।

प्रथम तरंग ६९


कपटेश्वर तीन ओर से अत्यन्त हरित उत्तुंग देवदार तथा चीड़ वृक्षों की अवलियों से आवृत है। उत्तुंग हरित सुन्दर शिखर हैं। ऊपर निर्मल नील गगन है। गांव की दिशा की ओर पृष्ठ भागों में बहुत दूर हिमाच्छादित शिखर सूर्य किरणों के प्रतिबिम्ब में रंग बदलता दिखाई पड़ता है। यदि आँखें नीचे उठ गयीं, तो विस्तृत हरी-भरी उपत्यका, उनमें यत्र-तत्र बिखरे ग्राम छाया तुल्य दिखाई देते हैं।

स्थान की परिकल्पना अद्भुत है। विचित्र है। आज खंडहर हैं। इन खंडहरो में किंचित् कल्पना का आश्रय लेने पर स्थान की भव्यता का अनुभव होगा। मध्य में वृत्ताकार कुंड के चारों ओर पत्थर की सीढ़ियाँ हैं। जल के नीचे तक सीढ़ियाँ चली गयी हैं। जल के स्तर से दो-तीन फीट ऊपर २० छोटी-छोटी मन्दिराकार मड़ियाँ कुंड के तटपर बनी हैं। चारो दिशाओ से चार सीढ़ियाँ भूमि स्तर से जल तक आती हैं। प्रत्येक दो सीढ़ियों के मध्य उल्लिखित ५ मड़ियाँ मन्दिरा- कार बनी हैं। मडियों की छतें प्रस्फुटित कमल के चौकोर पत्थर से ढँकी हैं। मड़ियाँ चौकोर हैं। इस प्रकार की मड़ियों के निर्माण की प्रथा काशी तथा अन्य तीर्थ स्थानों में जलाशयों के तटों पर हैं। उनमें विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं। कहीं-कही मड़िया स्नान के पश्चात् वस्त्र परिवर्तन करने, साधुओं के निवास किंवा पूजापाठ करने के लिए काम में लाई जाती हैं। कपटेश्वर की मड़िया लगभग ३ फुट ऊँची तथा उतनी ही चौड़ी होंगी। प्रायः वर्गाकार हैं।

मड़िया केवल देवस्थान एवं मूर्ति स्थापन के लिए बनाई गई थी। एक मढ़ी में पत्थर का सिंहा- सन नष्ट होने से बच गया है। गाँववालों से मड़ियों के विषय में पूछने पर पता चला। उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना था। मड़ियों में विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ थीं। मुस्लिम काल में उन्हें उठाकर फेंक


दिया गया। मन्दिर गिरा दिए गए। इस प्रकार कुफ्र एक का गढ़ नष्ट हो गया। ईमान की विजय हुई।

मड़ियों के ऊपर भूमि का विस्तृत ऊपरी स्तर है। यह चौड़ा स्तर चारों ओर चौकोर हैं। स्तर के मूल से भूमि बांध की तरह उठती गयी है। उस ऊँची भूमि पर चारो दिशाओ में चार भव्य मन्दिरों का निर्माण कराया गया था। इस समय केवल एक का आकार शेष रह गया है। शेष तीन मंदिर तोड़ दिए गए हैं। खँड़हर बन गए हैं। उनके पत्थर ग्रामीण उठा ले गये हैं। जारी चारों मन्दिरों के द्वार से जल तक पहुँचने के लिए चारो दिशाओं से उतरती सीढ़ियाँ कुंड में जाकर लीन हो जाती हैं। ऊपरी मंदिर जलस्तर से लगभग एक सौ फुट ऊँचाई पर होगा।

ग्राम की तरफ जल एक प्रणाली से निकलता है। प्रणाली के तल में कुछ खंडित देवताओं की मूर्तियाँ तथा शिवलिंग रखे हैं। वे तोड़कर छोड़ दिये गये थे उनकी दयनीय स्थिति जगत् को दिखाने के लिए उन्हें मारियों में ईंटों की तरह रख दिया गया है। इस स्थान से जल लेकर आचमन किया जाता है।

ग्राम तथा कुंड की मध्यवर्ती भूमिपर इस समय मंदिरों के विशाल ध्वंसावशेष मिलेंगे। एक छोटा मंदिर गांव की ओर वाली ऊँची भूमि तथा सरोवर की दीवार के मध्य स्थित है। तीनों मंदिरों के मुख किंवा द्वार सरोवर की तरफ हैं। दोनों विशाल मन्दिरों का अधिष्ठान भूमि से १५ फुट ऊँचाई पर है। मन्दिर के अन्तराल तक पहुँचने के लिए ९ सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी। उन्नत दोनों विशाल मन्दिरो की पट्टिका के ऊपर का ढांचा बिल्कुल लोप हो गया है। भित्तियों का कहीं पता नहीं है। केवल चारों भित्तियों का मूल आकार मात्र शेष रह गया है।

मन्दिरों के पत्थर ग्रामीण तोड़-तोड़कर उठा ले गये हैं। केवल भूमि से अन्तराल तक पहुँचनेवाली

६८ राजतरंगिणी

दर्शनस्य मदीयस्य पूर्वजं भविष्यति । इत्येतत्कथितं गुह्यं कपटेश्वरसंज्ञकम् ॥ —1147 : १२५९, १२६०,

कपटेश्वर प्रत्यक्ष होकर जाना चाहिए। वैरी- नाग से होते हुए कपटेश्वर जाना पहले चाहे सुविधा- जनक रहा हो, परन्तु सड़कों तथा परिवहन के साधना के कारण, अनन्त नाग तथा अनवल होकर जाना अधिक सरल तथा सुविधाजनक हो गया है। अनवल के डाक बंगला के दक्षिण पार्श्व में एक पक्की सड़क कपटेश्वर जाती है। उससे कुछ आगे जाने पर एक कच्ची सड़क मिलती है। संभव है कुछ समय पश्चात् यह सड़क भी पक्की बन जाय। यह सड़क देवदार के सुरम्य वनों द्वारा कोठर ग्राम पहुँचती है। मार्ग की वन-श्री सुन्दर है। मन करता है। चुप-चाप यहाँ बैठकर प्रकृति की अभिरामता दखते रहें।

सड़क चढ़ाव-उतार से होकर गुजरती है। कुछ आगे जाने पर दूसरी ओर की उपत्यका का मनोरम प्राकृतिक दृश्य मिलता है। पगडण्डी कोठर गाँव तथा कपटेश्वर पर्वत के पादमूल तक पहुँच जाती है। ग्राम से सड़क के दाहिनी तरफ अखरोट, विलों की हरित झूमती सघन तरु पंक्तियाँ मिलेंगी। ऊपर से किंचित् कल-कल ध्वनि के साथ उतरता निर्झर दिखाई देगा। यह जल पापसूदन कुंड द्वारा निकला निर्मल उज्ज्वल शीतल जल है। निर्झर प्रणाली पर दो एक लकड़ी के बने स्नानकुट अर्थात् 'स्नान गृह' रखे थे। काश्मीरी जलाशयों के समीप सर्वत्र लकड़ी निर्मित महिलाओं के स्नान निमित्त स्नानकुट रखे मिलते हैं।

सड़क त्यागकर पगडण्डी पकड़नी पड़ती है। लगभग २ फर्लांग की सरल चढ़ाई है। पाँच मिनट की चढ़ाई के पश्चात् पापसूदन तीर्थ का मनोरम दर्शन मिलता है।

वैरीनाग अर्थात् नीलकुण्ड के समान यहाँ एक विस्तीर्ण कुण्ड दियां गया सा है। वैरीनाग से बहुत बड़ा है। जल वैरी नाग की तरह स्थिर, शान्त तथा औषम शय है। जल में एक प्रकार की चंचलता दिखाई पड़ती है। जैसे कुंड की पाषाण जल स्तर पर फिर रही हो। एक श्रोता से जल गोमुख सदृश द्वारा बाहर निकलता रहता है। नदी के जल त्रिविद् प्रवाह का रूप धारण करता है। ग्राम के जल प्रणाली का रूप ले लेता है। ग्राम की स्तर से लगभग २०० फीट की ऊँचाई पर पापसूदन तीर्थ का पवित्र कुंड स्थित है।

स्थान शान्त है। चारों ओर वन देखकर मन पुलकित हो जाता है। यहाँ की प्रकृति सुषमा में जीवन है। चेतना का अनुभव होता है। बहुधा स्थानों के सुन्दर होने पर भी उनमें चेतना का अनुभव नहीं होता। यहाँ मुझे जीवन तथा चेतना का योग प्रकृति के शान्त वातावरण में होने लगा। जिस समय यह स्थान अपनी पूर्ण गरिमा में रहा होगा उस समय वैरीनाग इसके सम्मुख तुच्छ प्रतीत होता होगा। इसकी सुन्दरता की कल्पना में नील नाग दिया वैरी नाग की सुन्दरता नगण्य मालूम होगी।

कपटेश्वर धार्मिक तीर्थ था। मन्दिरों का अद्भुत समूह था। बुतपरस्ती का एक बड़ा मरकज होने के कारण इसके विनाश अथवा इसे सुन्दर बनाने का प्रयास हिन्दू राजाओं के पश्चात् मुस्लिम राजाओं ने नहीं किया। यह स्थान श्रीनगर से दूर है। मुख्य राजपथ से दूर है। यहाँ आना कठिन है। अतएव इसका महत्त्व घटता गया। वैरीनाग सुगम होने के कारण महत्त्व प्राप्त करता गया। मुगलों के कारण, राजकीय संरक्षण के कारण, विकास की सुनियोजित योजना के कारण, वैरीनाग ने सुन्दरता का परिधान पहन लिया है। वितस्ता का उद्गम स्थान होने के कारण साधारण जनता की दृष्टि में इसका मान बढ़ता गया। चाहे वे हिन्दू हों अथवा मुसलमान।

प्रथम तरंग ६९ [स्तम्भ १] कपटेश्वर तीन ओर से अत्यन्त हरित उत्तुंग देवदार तथा चीड वृक्षों की अवलियों से आवृत है। उत्तुंग हरित सुन्दर शिखर हैं। ऊपर निर्मल नील गगन है। गाँव की दिशा की ओर पृष्ठ भागों में बहुत दूर हिमाच्छादित शिखर सूर्य किरणों के प्रतिबिंब में रंग बदलता दिखाई पड़ता है। यदि आँखें नीचे उठ गयीं, तो विस्तृत हरी-भरी उपत्यका, उनमें यत्र-तत्र बिखरे ग्राम छाया तुल्य दिखाई देते हैं। स्थान की परिकल्पना अद्भुत है। विचित्र है। आज खंडहर हैं। इन खंडहरों में किंचित् कल्पना का आश्रय लेने पर स्थान की भव्यता का अनुभव होगा। मध्य में वृत्ताकार कुंड के चारो ओर पत्थर की सीढ़ियाँ हैं। जल के नीचे तक सीढ़ियाँ चली गयी हैं। जल के स्तर से दो-तीन फीट ऊपर २० छोटी-छोटी मन्दिराकार मढ़ियाँ कुंड के तटपर बनी हैं। चारों दिशाओं से चार सीढ़ियाँ भूमि स्तर से जल तक आती हैं। प्रत्येक दो सीढ़ियों के मध्य उल्लिखित ५ मढ़ियाँ मन्दिरा- कार बनी हैं। मंडयों की छतें प्रस्फुटित कमल के चौकोर पत्थर से ढँकी हैं। मढ़ियाँ चौकोर हैं। इस प्रकार की मढ़ियों के निर्माण की प्रथा काशी तथा अन्य तीर्थ स्थानों में जलाशयों के तटों पर है। उनमें विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं। कहीं-कहीं मढ़िया स्नान के पश्चात् वस्त्र परिवर्तन करने, साधुओं के निवास किंवा पूजापाठ करने के लिए काम में लाई जाती हैं। कपटेश्वर की मढ़िया लगभग ३ फुट ऊँची तथा उतनी ही चौड़ी होंगी। प्रायः वर्गाकार हैं। मढ़िया केवल देवस्थान एवं मूर्ति स्थापन के लिए बनाई गई थीं। एक मढ़ी में पत्थर का सिंहा- सन नष्ट होने से बच गया है। गाँववालों से मढ़ियों के विषय में पूछने पर पता चला। उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना था। मढ़ियों में विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ थीं। मुसलिम काल में उन्हें उठाकर फेंक [स्तम्भ २] दिया गया। मन्दिर गिरा दिए गए। इस प्रकार कुफ़्र एक का गढ़ नष्ट हो गया। ईमान की विजय हुई। मढ़ियों के ऊपर भूमि का विस्तृत ऊपरी स्तर है। यह चौड़ा स्तर चारों ओर चौकोर है। स्तर के मूल से भूमि बाँध की तरह उठती गयी हैं। उस ऊँची भूमि पर चारों दिशाओं में चार भव्य मन्दिरों का निर्माण कराया गया था। इस समय केवल एक का आकार शेष रह गया है। शेष तीन मंदिर तोड़ दिए गए हैं। खँडहर बन गए हैं। उनके पत्थर ग्रामीण उठा ले गये हैं। चारो चारों मन्दिरों के द्वार से जल तक पहुँचने के लिए चारों दिशाओं से उतरती सीढ़ियाँ कुंड में जाकर लोप हो जाती हैं। ऊपरी मंदिर जलस्तर से लगभग एक सौ फुट ऊँचाई पर होगा। ग्राम की तरफ जल एक प्रणाली से निकलता है। प्रणाली के तल में कुछ खंडित देवताओं की मूर्तियाँ तथा शिवलिंग रखे हैं। वे तोड़कर छोड़ दिये गये थे उनकी दयनीय स्थिति जगत् को दिखाने के लिए उन्हें नारियों में ईंटों की तरह रख दिया गया है। इस स्थान से जल लेकर आचमन किया जाता है। ग्राम तथा कुंड की मध्यवर्ती भूमिपर इस समय मंदिरों के विशाल ध्वंसावशेष मिलेंगे। एक छोटा मंदिर गाँव की ओर वाली ऊँची भूमि तथा सरोवर की दीवार के मध्य स्थित है। तीनो मंदिरों के मुख किंवा द्वार सरोवर की तरफ हैं। दोनों विशाल मन्दिरों का अधिष्ठान भूमि से १५ फुट ऊँचाई पर हैं। मन्दिर के अन्तराल तक पहुंचने के लिए ९ सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी। उक्त दोनों विशाल मन्दिरों की पट्टिका के ऊपर का ढाँचा बिल्कुल लोप हो गया है। भित्तियों का कहीं पता नहीं है। केवल चारों भित्तियों का मूल आधार मात्र शेष रह गया है। मन्दिरों के पत्थर ग्रामीण तोड़-फोड़कर उठा ले गये हैं। केवल भूमि से अन्तराल तक पहुँचनेवाली

७० राजतरंगिणी सीढियां शेष रह गयी हैं। यह दोनों मन्दिर दीवार तथा कुंड के मध्यवर्ती भूमि की सीढ़ियों के दक्षिण में स्थित हैं। लघु मन्दिर वाम पार्श्व में हैं। लघु मन्दिर में दो साधू अपना सामान रखते हैं। उसमें प्रतिमा किंवा शिवलिंग नही है। लगभग तीन वर्षों से वे यहाँ निवास करते हैं। समीप फौज की छावनी है। फौज के सिपाहियों ने अपने प्रयास से एक तिरपाल डालकर अस्थायी टेंट बना दिया है। टेंट में बाबाजी भोजन बनाते हैं। रात्रि में सोते हैं। उनमें एक हरिद्वार तथा दूसरा प्रयाग का साधु था। बाहरी दीवाल की मध्यवर्ती सीढ़ियों के दोनों पार्श्व में १० गवाक्ष की तरह मढ़ियाँ बनी हैं। इस प्रकार एक दिशा की दीवाल में २० ताखा थे। चारो ओर की दीवालो में कुल ८० मढ़ियाँ रही होंगी। शेष तीन तरफ की दीवालों में कोई मढ़ी शेष नहीं रह गयी है। दीवालों का आकार तथा रूप समाप्तप्राय हैं। इन मढ़ियों की छतें पत्थर पर खुदे उत्फुल्ल कमल की बनी हैं। एक ओर लघु मन्दिर उक्त छोटे मन्दिर के सम्मुख कुछ हटकर हैं। भग्ना- वस्था में हैं। दोनों छोटे मन्दिर ऊँचे अधिष्ठान पर बने हैं। मैंने साधुओ से बहुत देर तक बातें कीं। उनका कहना था। दो वर्ष पूर्व तक यहाँ बहुत पत्थर थे। शनैः शनैः सब चोरी हो गये हैं। लोग उठा ले गये। गाँववाले मकान बनाने तथा कब्रों में लगाने के लिए ले जाते हैं। रक्षा के अभाव में प्रतीत होता हैं, यहाँ के सब ध्वंसावशेष समाप्त हो जाएँगे। उसी भूमि पर एक ओर एक और मन्दिर शेष रह गया है। मैंने गाँववालो से यहाँ की बातें जाननी चाही। पूछने पर पता चला। पचास-साठ वर्ष पूर्व उनका चिह्न था। किंतु वे गिरते ही गए। कोई मरम्मत नहीं होती थी। मंदिरों में देवता नहीं थे। अतएव हिंदू डोगरा राज काश्मीर में होने पर भी उनकी ओर ध्यान नहीं दिया गया। पत्थर ले जाने वालों को कोई रोकने वाला नहीं था। इसलिए पत्थर आदि गायब होने लगे। मन्दिरों के स्थान पर मढ़ियों के ढूहे रह गये है। कुछ समय पश्चात् ढूहे जो पुराने चूनों और सुर्ख़ियों के अवशेष थे, उन्हें गधों तथा छतों में लगाने के लिए लोग ढो ले गये। चैत्र तृतीया को यहाँ मेला लगता हैं। स्थानीय मुसलमानों से इस मन्दिर तथा स्थान के विषय में सर्वदा कुछ न कुछ विवाद रहता है। ग्राम में पीने तथा सिंचाई का एक मात्र स्रोत इस तीर्थ का जल है। जब से यहाँ साधु लोग रहने लगे हैं, स्थान की सुरक्षा होने लगी है। टेंट लगने के पहले साधु लोग वृक्षों के नीचे बैठकर तुषारपात जैसे भयंकर काल को काट देते थे। साधुओं की कोई आमदनी नहीं है। मुसलमान कभी कुछ देते नहीं। यात्री आते नहीं। कभी कोई भूला भटका आ गया तो दो-चार पैसा दे दिया। लकड़ियाँ वृक्षों से तोड़ लेते हैं। धूनी सतत जलती रहती है। साग-पात मिल गया। पका लिया। नहीं मिला तो चुपचाप पड़े रहे। उनका सन्तोष, उनकी शांति मुझे पसन्द आई। इस विरोधी वाता- वरण में, आकाश के नीचे, बिना किसी साधन के, बिना किसी आशा के, अपने घरों से हजारों मील दूर पड़े रहना, उनकी धार्मिकता, उनकी कठोर लगन का ज्वलन्त उदाहरण था। मेरा मन यहाँ उदास हो गया। स्थान जितना सुन्दर था, उतना ही उपेक्षित था। प्रकृति ने उसे सुषमा दी। मनुष्यो ने उसे सजाया। और मनुष्यो ने ही उसे नष्टकर खंडहर बना दिया। मानव कंकाल- तुल्य अपनी करुण गाथा सुनाने के लिए उसे छोड़ दिया। मैं मन मारे चुपचाप कल-कल नाद करते जल प्रणाली के साथ गाँव की ओर उतर चला। इस स्थान को सर्वदा के लिए नमस्कार कर, इसके रचनाकारों के प्रति श्रद्धा प्रकट कर, और इसके नष्ट करने वालों की मानवीय दुर्बलता पर अफसोस करते।

प्रथम तरंग ७१ सन्ध्यादेवी जलं यस्मिन् धत्ते निस्सलिले गिरौ । दर्शनं पुण्यपापादामन्वयव्यतिरेकयोः ॥ ३३ ॥ ३३. काश्मीर मण्डल के निःसलिल गिरि पर सन्ध्या देवी के जल धारण द्वारा प्रत्यक्ष प्रकट होता है कि वहाँ पुण्य का अस्तित्व तथा पाप का अभाव है ।

[बायाँ स्तम्भ] मैं गाँव में आकर ठहर गया । इन ग्रामीणों के पूर्वज कभी इन मंदिरों के उपासक थे । उनके पुरोहित लेकिन आज उस ओर उलट कर देखने में हिचकते हैं । उपासकों के वंशज कहलाने में संकोच करते हैं । बल्कि नापसन्द करते हैं । स्त्रियाँ काम कर रही थीं । मैं खड़ा हो गया । वे मक्के की वालों में दाने निकाल रही थी । ओखली होती है । लम्बे मूसल होते हैं । ओखली में बाल डालकर कूटती हैं । मक्के के दाने तथा खुखडी अलग हो जाते हैं । वे हमें चकित होकर देखने लगी । खेलते बच्चे कुछ सहम कर खड़े हो गए । हमारा मन यहाँ से हट जाने के लिये कहने लगा । गाँव में अखरोट के वृक्षों की बहुलता है । ग्रामीणों का सीधा सादा सरल जीवन अच्छा लगा । वे शहरी वातावरण से दूर थे । उनकी जीविका अखरोट, शाली तथा मक्का की उपज पर निर्भर थी । अखरोट का मौसम था । अखरोट घाम में सूखने के लिये फैलाए गए थे । मुझे देखकर बच्चे अखरोट के पास खड़े हो गये । बालजन्य दुर्बलता उनमें आ गई । कहो मैं अखरोट, उनकी एकमात्र सम्पत्ति उठा न लूँ । मैं उन्हें देखकर मुस्कराया । चुपचाप उन्हें देखने लगा । मूसल चलाती स्त्रियाँ जैसे कुछ समझ न पाकर मूसल चलाना रोक कर मेरी ओर देखने लगी । मैं कुछ बोलना चाहा । बोल न सका । अपनी राह पकड़ा । स्थान रम्य है । सुहावना.है । विकास करने पर आदर्श पर्यटन केन्द्र बन सकता है । केन्द्र होने पर स्थानीय निर्धन ग्रामीणों की आर्थिक दशा सुधर सकती है । पर्यटकों को कश्मीर का, कभी का भूला, एक तीर्थस्थान दर्शनार्थ मिलेगा ।

[दायाँ स्तम्भ] पाठभेद : श्लोक ३३ में 'धत्ते' की जगह 'दत्ते' पाठ भेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३ (१) सन्ध्या देवी : सन्ध्या देवी ब्रह्मा की मानस कन्या कही जाती हैं । यहाँ सन्ध्या देवी प्रसिद्ध त्रिसन्ध्या निर्झर रूप में प्रकट होती है । वह उप- त्यका के एक तरफ है । देवल गोम ग्राम के दक्षिण दिशा में यह निर्झर है । यहाँ के एक लघु ग्राम का नाम मुन्दब्रार है । ब्रार का अर्थ देवी होती है । यह शब्द सन्ध्या का अपभ्रंश है । ग्राम अब निर्झर के निकट है । इस निर्झर के समीप ही एक छोटा और झरना सप्तर्षियों के नाम से सम्बन्धित है । किन्तु चमत्कार के कारण त्रिसन्ध्या को ही विशेष महत्त्व दिया गया है । सन्ध्या माहात्म में वर्णन मिलता है कि भद्रेश्वर वतु के पुत्र माया वतु ने सन्ध्या गंगा को अपने आश्रम देवल ग्राम के समीप लाया था । चमत्कार : यह निर्झर ज्येष्ठ तथा आषाढ मास में तीन बार दिन तथा तीन बार रात्रि में चलता है । त्रैकालिक सन्ध्या की उपमा झरने से दी गई है । निर्झर का त्रिसन्ध्या नामकरण किया गया है । अत्यन्त प्राचीन काल से यह कश्मीर का पवित्र तीर्थस्थान रहा है । इसका उल्लेख नीलमत पुराण में किया गया है । त्रिसन्ध्या माहात्म्य में उत्पत्ति उद्ग- मादि का वर्णन मिलता है । झरना वर्ष में अधिक दिनों तक सूखा रहता है । कश्मीर उपत्यका में यह एक आश्चर्यजनक चमत्कार माना जाता है । कल्हण कपटेश्वर के पश्चात् इसका वर्णन करता है ।

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

७२ राजतरंगिणी [बायाँ स्तम्भ] डाक्टर श्री वरनियर ने सन् १६६५ ई० में अपने संरक्षक दानिशमन्द खां के साथ यहाँ की यात्रा की थी। उनका वर्णन प्राचीन शास्त्रीय वर्णन से मिलता है। उसने यहाँ की भौगोलिक स्थिति का अध्ययन किया था। इस चमत्कार के कारण देने का भी प्रयास किया है। वह लिखता है—"मई मास मे जब बर्फ गलती है तो वह झरना ५ दिन तक दिन मे तीन वार चल कर बन्द हो जाता है। वह उषाकाल, मध्याह्नकाल तथा सायंकाल चलता है। लगभग ४५ मिनट झरना चलता है। उसमे से काफी पानी निकलता है। वह १० या १२ फुट वर्गाकार और उतने ही गहरे कुण्ड को भरने के लिए काफी होता है। वह झरना बन्द हो जाता है। वर्षा ऋतु मे अन्य झरनो के समान निस्सन्देह इसमे पानी आ जाता है।" कुण्ड के समीप हिन्दुओं का एक मंदिर है। उसमे देवी की मूर्ति है। अतएव इस स्थान को संड कहते है। लोग पूजा निमित्त आते हैं। यहाँ के सम्बन्ध मे अनेक गाथाएँ तथा कपोल कल्पनाएँ हैं। बर्नियर लिखता है। मै यहाँ ६ दिन इस चमत्कार को देखने के लिए रहा। मैने यहाँ के पर्वत का अच्छी तरह अध्ययन किया। पर्वत मूल मे वह झरना स्थित है। मै इस चमत्कार का कारण जांचने के के लिए चारों तरफ कदम कदम देखता पर्वत के ऊपर पहुँचा। यह पर्वत उत्तर से दक्षिण फैला है। दूसरे पहाड़ो मे अलग है। इसका रूप गधे की पीठ की तरह है। यह लम्बा अधिक है। चोटी कठिनाई से १०० पद चौडी होगी। पूर्व की तरफ यह पहाड़ घासों से ढंका है। पश्चिम की तरफ वृक्ष तथा झाड़ियाँ हैं। दूसरी तरफ पहाड़ होने के कारण सूर्य की रोशनी इस पर आठ बजे प्रातः काल के पहले नही पड़ती। मैने विचार किया। संभव है। सूर्य की गरमी के कारण यह चमत्कार उत्पन्न होता है। मै समझता हूँ। शीत काल में समस्त भूमि तुषाराच्छादित हो

[दायाँ स्तम्भ] जाती है। पर्वत के उस भागमें जम जाती है जहां प्रातः कालीन उगते सूर्य की किरणें पड़ती है। वरफ पिघलती है। जल झरने मे जाता है। इसी प्रकार मध्याह्न काल में बर्फ पिघल कर धीरे-धीरे झरने में पहुँच जाती है। इसी प्रकार सूर्य की किरण जब पश्चिम की ओर झुकती हैं तो बर्फ गल कर दूसरे स्रोत से पहुँचती है। इस प्रकार सायंकालीन जल झरने मे आ जाता है। सायंकालीन जल झरने मे इसलिए कम आता है कि पश्चिमी तरफ वाले पहाड़ पर वृक्ष तथा झाडियाँ लगे हैं। उसके कारण सूर्य की किरणें इस तरफ वरफ पिघलाने के लिए अधिक नहीं पहुँच सकती। पानी पन्द्रह दिनों में इसलिए समाप्त होकर बन्द हो जाता है कि पहले दिनों मे पानी ज्यादा चलता है। धीरे-धीरे कम होता हुआ पन्द्रहवें दिन बन्द हो जाता है। बर्फ जो पर्वत मे जमी रहती है वह धीरे-धीरे गलकर समाप्त होती रहती है। जल का आना एक-सा नही रहता। कभी दोपहर में अधिक आता है। कभी देखा गया है कि प्रातः काल अधिक आता है। कभी प्रातः काल अधिक तथा मध्याह्न काल में कम हो जाता है। इसका कारण यह है कि किसी दिन ज्यादा ठंडक होती है और किसी दिन कम। किसी दिन बादल आ जाने के कारण ठंडक बढ़ जाती है। और गर्मी असमान रूप से पड़ने लगती है।"—Berneirs Travels in the Mogul Empire, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ ४१०-४१३ हरचरितचिन्तामणि मे वर्णन मिलता है। यदि कोई पापी इस स्थान पर आ जाय तो उसे निर्झर का आश्चर्यजनक कार्य नहीं दिखाई पड़ेगा (४ ५०)। सिख गवर्नर कर्नल मियान सिंह यहाँ आये थे। निर्झर का चलना बंद हो गया था। उन्होंने लम्बा उपवास किया। विचित्र निर्झर पुनः चलने लगा। नीलमत पुराण में संध्या शब्द एक स्थान पर नदी और दूसरे पर पुष्करिणी के लिए व्यवहृत किया गया है। अतएव उन्हें एक नहीं मानना

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

प्रथम तरंग ७३ स्वयम्भूर्यत्र हुतभुक् भुवो गर्भात् समुन्मिषन् । जुह्वतां प्रतिगृह्णाति ज्वालाभुजवनैर्हविः ॥ ३४ ॥ ३४ स्वयम् अग्निज्वाला पृथ्वी गर्भ से निकल कर जैसे अपनी भुजाओं द्वारा होताओं की हवि प्रतिग्रहण करती है ।

[बायाँ स्तम्भ] चाहिए । नीलमत पुराण उनमें स्पष्ट भेद करता है । सन्ध्या नदी : भव्यायां नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । सन्ध्याम् नाम नदीम् दृष्ट्वा मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥ —1252 : १४०१ सन्ध्या पुष्करिणी : सन्ध्या पुष्करिणी त्वन्या पूर्वतुल्यफलप्रदा । अवगाह्य नरो भक्त्या पुण्याम् माह्मणकुण्डिकाम् ॥ —1287 : १४९९ पादटिप्पणियाँ : ३४ (१) स्वयंभू—यह ब्रह्मा के पुत्र हैं । इनसे प्रजा की उत्पत्ति हुई है । ( मत्स्य पुराण : ३:३१ ) इनका शरीर धर्धनारी का था । एक भाग नारी तथा दूसरा नर का था । ब्रह्मा ने एक ही शरीर के दोनों भागों को अलग करने का आदेश दिया । उन्ही से मानव जगत् में नर एवं नारी का सृजन हुआ है । नारी शरीर से सतरूपा तथा नर शरीर से स्वयंभू हुए हैं । (मार्कण्डेय पुराण - ५०; विष्णु ' ७:६; भागवत : ३:१२:५३ ) बाइबिल में वर्णित आदम तथा हौवा की कथा इसमें मिलती है । उसमें भी वर्णन मिलता है । भगवान् ने पहले आदम को पैदा किया । आदम की एक पसली से हौवा स्त्री पैदा हुई । इस प्रकार आदम नर तथा हौवा अर्थात् ईव नारी हुई ! उन्हीं से सृष्टि चली । स्थानीय ग्रामीण स्थान को 'सुयम' कहते हैं । यह स्थान 'नीच होम' ग्राम से आधा मील दक्षिण पश्चिम दिशा में स्थित है । मच्छीपुर परगना में है । यहाँ पर ज्वालामुखी का प्रतिभास एक नीची भूमि में बालू तथा भूमि के मध्य होता है । किसी १०

[दायाँ स्तम्भ] वर्ष इसमे से उष्ण वाष्प निकलने लगती है । स्थान इतना गरम हो जाता है कि यात्री खाद्य की वस्तु उस पर रख देते हैं । वह पक जाती है । श्री स्टीन सन् १८९२ में इस स्थान पर आये थे । वहाँ वालों से उन्हें मालूम हुआ कि वाष्प अथवा ज्वाला गत १५ वर्षों से नहीं निकली है । श्री स्टीन ने देखा । वहाँ के छिछले स्थान की भूमि ईंट की तरह चमकीली तथा लाल थी । वह जली मिट्टी की तरह थी । वह संकोर्ण विवर हल चला जैसा मालूम होता था । सन् १८७६ में पण्डित गोविन्द कौल यहाँ की तीर्थ यात्रा करने आये थे । उस समय इसकी यह क्रिया लगभग दस मास तक चलती रही । वाइन ने अपने यात्रा विवरण में लिखा है । यह आश्चर्यजनक प्रतिभास इस शताब्दी के आरम्भ में देखा गया था । अबुलफजल ने आइने अकबरी ( २.३६५ ) में लिखा है—पुरंगो के समीप एक दर्रा है । उसे सोयुम कहते हैं । उसके छोर पर एक स्थान लगभग १० जरीब के क्षेत्रफल में होगा । जिस समय बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करता है उस समय लगभग एक मास तक भूमि इतनी गरम हो जाती है कि समीपवर्ती वृक्ष सूख जाते हैं । यदि कोई पशु या पक्षी इस भूमि पर रख दिया जाय तो भुन जायगा । इस स्थान के समीप आबादी है । कमराज से जो दर्रा इस तरफ आता है वह दूसरी तरफ कासगर से जाकर मिल जाता है । इसके पश्चिम तरफपक्तहे है जहाँ सोना मिलता है । मैं सन् १९६४ में इस स्थान पर आया था । उस समय यहाँ की भूमि गरम नहीं थी । स्थानीय लोगों में यहाँ के सम्बन्ध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं ।

७२ राजतरंगिणी

डाक्टर श्री बरनियर ने सन् १६६५ ई० मे अपने संरक्षक दानिशमन्द खां के साथ यहाँ की यात्रा की थी। उनका वर्णन प्राचीन शास्त्रीय वर्णन से मिलता है। उसने यहाँ की भौगोलिक स्थिति का अध्ययन किया था। इस चमत्कार के कारण देने का भी प्रयास किया है। वह लिखता है—"मई मास मे जब बर्फ गलती है तो वह झरना ५ दिन तक दिन मे तीन बार चल कर बन्द हो जाता है। यह उषाकाल, मध्याह्नकाल तथा सायंकाल चलता है। लगभग ४५ मिनट झरना चलता है। उसमे से काफी पानी निकलता है। वह १० या १२ फुट वर्गाकार और उतने ही गहरे कुण्ड को भरने के लिए काफी होता है। वह झरना बन्द हो जाता है। वर्षा ऋतु में अन्य झरनों के समान निस्सन्देह इसमें पानी आ जाता है।" कुण्ड के समीप हिन्दुओ का एक मंदिर है। उसमे देवी की मूर्ति है। अतएव इस स्थान को संड कहते हैं। लोग पूजा निमित्त आते है। यहाँ के सम्बन्ध में अनेक गाथाएँ तथा कपोल कल्पनाएँ हैं। बरनियर लिखता है। मैं यहाँ ६ दिन इस चमत्कार को देखने के लिए रहा। मैने यहाँ के पर्वत का अच्छी तरह अध्ययन किया। पर्वत मूल में यह झरना स्थित है। मैं इस चमत्कार का कारण जांचने के के लिए चारों तरफ कदम कदम देखता पर्वत के ऊपर पहुँचा। यह पर्वत उत्तर से दक्षिण फैला है। दूसरे पहाड़ो से अलग है। इसका रूप गधे की पीठ की तरह है। यह लम्बा अधिक है। चोटी कठिनाई से १०० पद चौड़ी होगी। पूर्व की तरफ यह पहाड़ घासों से ढँका है। पश्चिम की तरफ वृक्ष तथा झाड़ियाँ हैं। दूसरी तरफ पहाड़ होने के कारण सूर्य की रोशनी इस पर आठ बजे प्रातः काल के पहले नही पड़ती। मैने विचार किया। संभव है। सूर्य की गरमी के कारण यह चमत्कार उत्पन्न होता है। मैं समझता हूँ। शीत काल में समस्त भूमि तुषाराच्छादित हो जाती है। पर्वत के उस भागमें जम जाती है जहाँ प्रातः कालीन उगते सूर्य की किरणें पड़ती हैं। बर्फ पिघलती है। जल झरने में जाता है। इसी प्रकार मध्याह्न काल में बर्फ पिघल कर धीरे-धीरे झरने में पहुँच जाती है। इसी प्रकार सूर्य की किरण जब पश्चिम की ओर झुकती है तो बर्फ गल कर दूसरे स्रोत में पहुंचती है। इस प्रकार सायंकालीन जल झरने में आ जाता है। सायंकालीन जल झरने मे इसलिए कम आता है कि पश्चिमी तरफ वाले पहाड़ पर वृक्ष तथा झाड़ियाँ लगीं है। उसके कारण सूर्य की किरणें इस तरफ बर्फ पिघलाने के लिए अधिक नही पहुँच सकतीं। पानी पन्द्रह दिनों में इसलिए समाप्त होकर बन्द हो जाता है कि पहले दिनों में पानी ज्यादा चलता है। धीरे-धीरे कम होता हुआ पन्द्रहवें दिन बन्द हो जाता है। बर्फ जो पर्वत में जमी रहती है यह धीरे-धीरे गलकर समाप्त होती रहती है। जल का आना एक-सा नही रहता। कभी दोपहर में अधिक आता है। कभी देखा गया है कि प्रातः काल अधिक आता है। कभी प्रातः काल अधिक तथा मध्याह्न काल में कम हो जाता है। इसका कारण यह है कि किसी दिन ज्यादा ठंडक होती है और किसी दिन कम; किसी दिन बादल आ जाने के कारण ठंडक बढ़ जाती है। और गर्मी असमान रूप से पड़ने लगती है।"—Berneirs Travels in the Mogul Empire, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ ४१०-४१३. हरचरितचिन्तामणि मे वर्णन मिलता है। यदि कोई पापी इस स्थान पर आ जाय तो उसे निर्झर का आश्चर्यजनक कार्य नही दिखाई पडेगा (४:५०)। सिख गवर्नर कर्नल मियान सिंह यहाँ आये थे। निर्झर का चलना बंद हो गया था। उन्होने लम्बा उपवास किया। विचित्र निर्झर पुनः चलने लगा। नीलमत पुराण मे संध्या शब्द एक स्थान पर नदी और दूसरे पर पुष्करिणी के लिए व्यवहृत किया गया है। अतएव उन्हें एक नही मानना

प्रथम तरंग ७३ स्वयम्भूर्यत्र हुतभुक् भुवो गर्भात् समुन्मिषन् । जुह्वतां प्रतिगृह्णाति ज्वालाभुजवनैर्हविः ॥ ३४ ॥ ३४ स्वयम् अग्निज्वाला पृथ्वी गर्भ से निकल कर जैसे अपनी भुजाओं द्वारा होताओं की हवि प्रतिग्रहण करती है । चाहिए । नीलमत पुराण उनमें स्पष्ट भेद करता है । सन्ध्या नदी : मडवायां नरः स्नात्वा गोसहस्रम् फलम् लभेत् । सन्ध्याम् नाम नदीम् दृष्ट्वा मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥ —1252 : १४७१ सन्ध्या पुष्करिणी : सन्ध्या पुष्करिणी त्वन्या पूर्वतुल्यफलप्रदा । अवगाह्य नरो भक्त्या पुण्याम् ब्राह्मणकुण्डिकाम् ॥ —1287 : १४९९ पादटिप्पणियाँ : ३४ (१) स्वयंभू—यह ब्रह्मा के पुत्र हैं । इनसे प्रजा की उत्पत्ति हुई है । ( मत्स्य पुराण : ३:३१ ) इनका शरीर अर्धनारी का था । एक भाग नारी तथा दूसरा नर का था । ब्रह्मा ने एक ही शरीर के दोनों भागों को अलग करने का आदेश दिया । उन्ही से मानव जगत् में नर एवं नारी का सृजन हुआ है। नारी शरीर से सतरूपा तथा नर शरीर से स्वयंभू हुए हैं । (मारकण्डेय पुराण : ५०; विष्णु ' ७:६; भागवत : ३:१२:५३ ) बाइबिल मे वर्णित आदम तथा होवा की कथा इसमें मिलती है। उसमें भी वर्णन मिलता है। भगवान् ने पहले आदम को पैदा किया । आदम की एक पसली से होवा स्त्री पैदा हुई । इस प्रकार आदम नर तथा होवा अर्थात् ईव नारी हुई । उन्ही से सृष्टि चली । स्थानीय ग्रामीण स्थान को 'सुयम' कहते हैं । यह स्थान 'नीच होम' ग्राम से आधा मील दक्षिण पश्चिम दिशा में स्थित है । मच्छीपुर परगना में है । यहाँ पर ज्वालामुखी का प्रतिभास एक नीची भूमि में बालू तथा भूमि के मध्य होता है। किसी १० वर्ष इसमें से उष्ण वाष्प निकलने लगती है । स्थान इतना गरम हो जाता है कि यात्री श्राद्ध की वस्तु उस पर रख देते हैं । वह पक जाती हैं । श्री स्टीन सन् १८९२ में इस स्थान पर आये थे । वहाँ वालों से उन्हें मालूम हुआ कि वाष्प अथवा ज्वाला गत १५ वर्षों से नहीं निकली है । श्री स्टीन ने देखा । वहाँ के छिछले स्थान की भूमि ईंट की तरह चमकीली तथा लाल थी । वह जली मिट्टी की तरह थी । वह संकीर्ण विवर हल चला जैसा मालूम होता था । सन् १८७६ में पण्डित गोविन्द कौल यहाँ की तीर्थ यात्रा करने आये थे । उस समय इसकी यह क्रिया लगभग दस मास तक चलती रही । वाइन ने अपने यात्रा विवरण मे लिखा है । यह आश्चर्यजनक प्रतिभास इस शताब्दी के आरम्भ मे देखा गया था । अबुलफजल ने आइने अकबरी ( २:३६५ ) मे लिखा है—गुरंगो के समीप एक दर्रा है। उसे मोयुम कहते हैं । उसके छोर पर एक स्थान लगभग १० जरीब के क्षेत्रफल में होगा । जिस समय बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करता है , समय लगभग एक मास तक भूमि इतनी गरम होती है कि समीपवर्ती वृक्ष सूख जाते है । यदि पशु या पक्षी इस भूमि पर रख दिया जाय तो भुन जाय । इस स्थान के समीप आबादी है। कमरा जो दर्रा इस तरफ आता है वह दूसरी तरफ जाकर मिल जाता है । इसके पश्चिम यहाँ सोना मिलता है । मै सन् १९६४ में पर आया था । उस समय यहाँ की भूमि ठण्डी थी । स्थानीय लोगों में यहाँ के सम्बन्ध में अनेक चर्चाएँ है ।

७४ राजतरंगिणी देवी भेदगिरेः शृङ्गे गङ्गोद्भेदशुचौ स्वयम् । सरोऽन्तर्दृश्यते यत्र हंसरूपा सरस्वती ॥ ३५ ॥ ३५ गङ्गा के स्रोत से पावन भेदगिरि पर स्थित सरोवर में देवी सरस्वती हंस रूप में दिखायी देती हैं।

सोमदेव भट्ट कथासरित्सागर में स्वयम्भू का वर्णन करता है। यह लिखता है कि कश्मीर में बहुत-से स्वयम्भू तीर्थ हैं वहाँ जाकर पूजा करना चाहिए—‘काश्मीरेषु स्वयंभूनि गत्वा क्षेत्राणि पूजयेत्।’ (१:१४५) निस्सन्देह स्वयम्भू एक प्राचीन तीर्थस्थान है। नीलमत पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। सप्तर्षीणाम् तथैवाशां शुशुम्नस्य समीपगा। शृंगवाणं च परदं च स्वयंभुवम् ॥१२७१॥ स्वायंभुवं यदिश्रं तथा वै पिंगलेश्वरम् । विन्दुनादेश्वरं देयं देयं भद्रेश्वरं तथा ॥१२९३॥ नीलमत पुराण काल में भी स्वयंभू के सम्बन्ध में अग्नि का उल्लेख किया गया है। अग्नि के कारण भूमि तप्त होती है। यह स्थान सर्वदा पवित्र कश्मीर में माना गया है। कश्मीर के राजा उच्चल ने (सन् ११०१ ई०) स्वयंभू की तीर्थ यात्रा की थी। (रा० त० ८.२५०) स्वयंभू माहात्म्य से प्रकट होता है कि देवता लोग असुरों से त्रस्त किये गये थे। उनके निवेदन करने पर भगवान् शिव ने यहाँ कालाग्नि रुद्र का रूप धारण किया था। स्वयंभू का अर्थ होता है जो स्वयं पैदा हो जाता है। स्वयंभू मनु से तथा पुराणों के वर्णित अन्य स्वयंभू देवताओ से कश्मीर के स्वयंभू को मिलाना नहीं चाहिए। (मत्स्य पुराण ४:२६, २:२७, २:३०; तथा वायु पुराण ४:४४) थे। यह विपुल उपेक्षित तीर्थ स्थान है। श्री स्टीन ने इसका पता लगाया था। कश्मीर के सामाजिक तथा धार्मिक जीवन में इस स्थान का बहुत महत्त्व रहा है। 'परिशिष्ट' में विस्तृत वर्णन इस स्थान का दिया है। श्री स्टीन ने जो कुछ वहाँ देखकर लिखा है उसमें बहुत कुछ अन्तर पड़ गया है। स्वयं इस स्थान पर बड़ी कठिनाई से पहुँच पाया था। श्री स्टीन ने लिखा है- गिरि शिखर पर लगभग २० फीट चौकोर का एक जलकुण्ड है। उसमें पत्थर की सीढ़ियाँ चारों तरफ बनी हैं। ये जीर्ण शीर्ण हो गयी हैं। कुण्ड से ६ फीट दूर पर प्राचीन प्राचीर का चिह्न मिलेगा। यह उत्तर पूर्व तथा उत्तर पश्चिम अच्छी हालत में है। (यह लोप हो चुकी है) उत्तर पूर्व की ओर एक द्वार बना है। द्वार पर उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी हैं। (यह भी लोप हो चुका है) निर्माण में लगे शिला खण्ड अलंकृत हैं। द्वार के निम्न भाग में एक जल-स्रोत है। यह कुण्ड के जल को बहाता रहता है। द्वार के समीप एक भद्रपीठ पर ३ शिवलिंग हैं। (यह भी लोप हो चुका है) इस भद्र पीठ पर मूर्तियाँ भी बनी हैं। यहाँ से सौ फीट की ऊँचाई पर एक खुला सीढ़ीनुमा मैदान है। उस पर कुछ ऊँचा डूह है। उसपर प्राचीन काल की कुछ लाल ईंटें बची पड़ी हैं। (मैंने केवल चार ईंटें वहाँ देखीं)। दीवाल का चिह्न ८० वर्ग गज में दिखाई देगा। श्री स्टीन को यहाँ के गूजरों से मालूम हुआ था। 'आज से १५० वर्ष पूर्व यहाँ ब्राह्मण लोग आते थे। वाव में स्नान कर श्राद्ध करते थे। वे अब वहाँ श्राद्ध करने नहीं आते।'

पादटिप्पणियाँ : ३५ (१) भेद समाहर्ते—गङ्गोद्भेद तीर्थ : इस अत्यन्त प्राचीन स्थान को लोग भूल गये

प्रथम तरंग ७५ एक वृद्ध गूजर से श्री स्तीन को मालूम हुआ था। कुण्ड न तो कभी जमता है और न उसका जल बढ़ता या घटता है।' स्तीन का मत है— बुदब्रार ही भेदा देवी का स्थान है। कुण्ड का नाम गंग भेद है। यह स्थान ७८०० फीट समुद्र की सतह से ऊंचा है। यहाँ की दुर्गम यात्रा से बचने के लिए एक दूसरे स्थान पर भेदा देवी की मूर्ति स्थापित कर दी गयी है। बुदब्रार से द्राव गाँव तथा पीर पंजाल दर्रा को मिलाता है। यह मार्ग बुदब्रार के दक्षिण पार्श्व से पहाड़ी पर चढ़ता है। यह आगे चलकर पीर पंजाल के मुख्य मार्ग से दुबजी के पास जाकर मिल जाता है। श्रीवरने जैन तरंगिणी में भेद वनपय का वर्णन किया है। उसमे भी स्तीन का वर्णन मिलता है। गंगोद्‌भेद माहात्म्य की कथा है। पुलस्त्य ऋषि ने सती की भूमि में लम्बी तपस्या की। उनके यज्ञ के लिये गंगा नदी हिमवंत पर्वत से चलकर यहाँ निकल पड़ीं। तपस्या के पश्चात् ऋषि पुलस्त्य जल यथावत् प्रवाहित रहने देना चाहते थे। उसी समय सरस्वती देवी की आकाशवाणी श्रवण गत हुई 'गिरि शिखर पर जिस स्थान से भेद अरण्य में जल उद्भूत हुआ है उस तीर्थ का नाम गगोद्‌भेद होगा। पर्वत के ऊपर जहाँ दश धनुष परिणाम लम्बा चौड़ा स्थान है वहाँ एक बड़ा कुण्ड शुद्ध जल का बन जायगा। पर्वत के पूर्वीय मूल भाग से एक सरिता 'अभय' निकलेगी। वह सब पापो को धोएगी। गंगा जी इसी रूप से यहाँ प्रकट होगी। इसका जल कभी समाप्त नही होगा। सरिता 'अभय' पर्वत से उछलती नहीं गिरेगी। गंगा का यह जल वर्ष के तृतीयाश काल में ही प्रवाहित रहेगा।' शेष काल में गंगा का जल स्वर्ग तथा नरक में बहता रहेगा।' पुलस्त्य ऋषि ने निवेदन किया—देवी, पर जल यहाँ वर्ष पर्यन्त बनता रहना चाहिए।' देवी ने सर्वदा जल प्रवाहित रहने का वचन दिया। एक सहस्र वर्ष और पुलस्त्य ने यहाँ तपस्या की। आकाश में राजहंस रूप से देवी सरस्वती ने दर्शन दिया। चैत्र शुक्ल अष्टमी तथा नवमी को पूजा प्राप्त कर देवी ने वहाँ अपनी ६ प्रकृतियों का वर्णन किया। प्रकृतियों के भेद वर्णन करने के कारण देवी का नाम 'भेद' दिया गया। ऋषि पुलस्त्य ने देवी सरस्वती की पूजा देवी वागेश्वरी भेद रूप से प्रारम्भ की। पूजा चैत्र शुक्ल चतुर्दशी तथा पूर्णिमा को आरम्भ की। अतएव स्थान का नाम गंगोद्‌भेद तीर्थ पड़ा। चार दिन पूजा होने लगी। 'भेद' देवी माहात्म्य का वर्णन कर माहात्म्य सहसा समीपवर्ती तीर्थ स्थानो का वर्णन करने लगता है। गोवर्धनधर विष्णु उल्लेख करता कहता है कि वहाँ पर १२५ हस्त परिणाम में कभी तुषार-पात नही होता। माहात्म्य से एक बात स्पष्ट होती है। यहाँ के प्राकृतिक दृश्य का उसने जो वर्णन किया है वह अक्षरशः मिलता है। कुण्ड का माप भी जो दिया गया है वह ठीक है। अतएव निस्सन्देह कहा जा सकता है कि श्री स्तीन ने इस स्थान को मूल गंगोद्‌भेद माना है वह ठीक है। नील मत पुराण में गंगोद्‌भेद तीर्थ का वर्णन मिलता है। तावन्मुद्देयं समं पुण्यं प्रयागेण नराधिप । गंगोद्भेदे नरः स्नात्वा भेदा देवी मर्चायते ॥ —1522 यहाँ पर यम की देवी मूर्ति जिसे ओजम कहते है ऋषियों के निमित्त स्थापित की गयी थी। इसकी पूजा आश्वयुज अर्थात् आश्विन बदी चतुर्दशी को होती है। माहात्म्य वहाँ के समीपस्थ तीर्थ रामाश्रम, रामह्रदा, सप्तर्षि आश्रम तथा वैतरणी नदी का वर्णन करता है। तात्पर्य यह है कि गंगोद्‌भेद की यात्रा के समय उनकी भी यात्रा करनी चाहिए।

७६ राजतरंगिणी नन्दिक्षेत्रे हरावासप्रासादे द्युचरार्पिताः । अद्याऽपि यत्र व्यज्यन्ते पूजाचन्दनबिन्दवः ॥ ३६ ॥ ३६ हर के आवास के प्रासाद स्वरूप नन्दि क्षेत्र में देवताओं द्वारा अर्पित पूजा के चन्दन बिन्दु दिखाई पड़ते हैं। महाभारत में गंगोद्भेद तीर्थ का वर्णन मिलता विगाह्य पुष्करम् तीर्थम् अतिरात्रफलम् लभेत् । है। यह स्थान 'भेदा' देवी कश्मीर का स्थान तीर्थं सप्तर्षीणाम् च वह्निस्तोमफलम् लभेत् ॥ है या दूसरा इसपर विशेष अनुसन्धान की आवश्य- ---1343 कता है। वनपर्व में तीर्थों की महिमा का वर्णन (विशेष द्रष्टव्य 'भेदादेवी' परिशिष्ट) ऋषि पुलस्त्य ने किया है। उसमे भारत के प्रसिद्ध पाठभेद : तीर्थों के साथ गंगोद्भेद का भी उल्लेख किया है। श्लोक ३६ में 'हरावास' का 'सुरावास' पाठ भेद मिलता है। गंगोद्भेदं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । पादटिप्पणियाँ : वाजपेयमवाप्नोति ब्रह्मभूतो भवेत् सदा ॥ ३६ (१) नन्दि क्षेत्र :---इसका उल्लेख नील वनपर्व : ८४ : ३५. मत तथा हरमुकुट माहात्म्य में है। हरमुकुट माहात्म्य 'गंगोद्भेद तीर्थ में तीन रात उपवास करने में नन्दि क्षेत्र संज्ञा उस भाग को दी गयी है, जो एक वाला मनुष्य वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करता है। उत्तुंग पर्वतीय उपत्यका हरमुख शिखर के पूर्वार्ध सर्वदा के लिये ब्रह्मभूत हो जाता है।' हिमानी अर्थात् ग्लेशियर मूल में है। उसी स्थान रामतीर्थ का उल्लेख नीलमत पुराण करता है : पर कालोदक सरोवर है। उसे नन्द कुण्ड कहा जाता स्नात्वा नारायणस्थानं विष्णुलोके महीयते । है। स्थान १३ हजार फीट ऊंचाई पर स्थित है। रामतीर्थे भवेत्तप्ते च फलम् पूतम् प्रकीर्तितम् ॥ गंगासर किंवा उत्तर मानस तीर्थ यात्रा मार्ग के 1312 मुख्य पड़ाव पर है। नीलमत पुराण कालोदक का वैतरणी का उल्लेख मिलता है : वर्णन करता है। कपितीर्थं नरः स्नात्वा निर्मलो मुनिविद् भवेत् । तस्य शृङ्गस्य पूर्वार्धे सरोऽस्ति विमलोदके । वैतरण्याम् नरः स्नात्वा न दुर्गतिम् अवाप्नुयात् ॥ कालोदकमिति ख्यातम् सर्वकिल्विषनाशनम् ॥ ---1315 1048 : १२३२, १२३३ गंगोद्भेद का उल्लेख नीलमत में आता है : तत्रैव देवदेवेशः समाप्ते ब्रह्मणः क्रतौ । मणिभद्रम् तथा दृष्ट्वा धनवान् अभिजायते । सर्वैर् देवगणैः सार्धम् ययौ कालोदकम् शरः॥ पुलस्त्यनिर्मिता देवी भुवि भेदेति विश्रुता ॥ 1099 : १२९७, १२९८ ---1010 बालखिल्ये कृतेऽगस्त्ये तुल्यतेजा महर्षिभिः । गंगोद्भेदे नरः स्नात्वा भेदे देवीसमीपतः । कालोदकं नन्दिकुण्डम् शङ्खचक्रौ गदामृताथा । गंगास्नानफलम् प्राप्य स्वर्गलोके महीयते ॥ ---1243 : १४५८, १४५९ ---1309 कालोदकम् यत्र याति नदी मानससंभवा । सप्तर्षि आश्रम का भी उल्लेख नीलमत करता है : ततः स्नातस्य दृश्यन्ते सर्वपापान्यशेषतः ॥ ---1247 : १४६१

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७८ राजतरंगिणी [बायाँ स्तम्भ] नन्दी सर्वदा भूतेश्वर में रहते हैं। भगवान् शिव भी नन्दी के कारण वहाँ निवास करते हैं। नीलमत पुराण में उपाख्यान का निम्नलिखित रूप मिलता है : शिलादो नाम विप्रोऽभूत् पुरा पुत्रविवर्जितः । तेन वर्षशतं भुक्त्वा शिलाचूर्णं नराधिप । नन्दिपर्वतमासाद्य महादेवप्रसादतः ॥ 1033 । १२०५, १२०६ पुत्रार्थे तु तदा तस्य देवदेवो अनुकम्पया । पुत्रत्वे नन्दिनम् प्रादात् स्वगणेशम् महाबलम् ॥ 1033 । १२०६, १२०७ दीयमानस्तु पुत्रत्वे नन्दी प्रोवाच शंकरम् । अनुग्रहाद् द्विजस्यास्य पुत्रोऽहं भविता प्रभो ॥ 1034 । १२०८, १२०८ किं त्वयोनिभवो देव भवेयं तस्य पुत्रकः । चिरम् च न च वत्सेऽहं मानुषे त्वद्विनाकृतः ॥ 1035 । १२०८, १२०९ तमुवाच हरो देवः प्रहसन्ननुकम्पया । उमाविवाहे शप्तोऽसि भृगुना त्वम् गणोत्तम ॥ 1036 । १२०९, १२१० अपूजितेन मानुष्ये तेनापि भविता ध्रुवम् । तेन चैव शरीरेण मत्समीपमुपेष्यसि ॥ 1037 । १२१०, १२११ ततः प्रभृति मानुष्ये वत्स्यसि त्वम गणोत्तम । वत्स्यसे मत्समीपे च प्राकाम्येन यथा सुखम् ॥ 1038 । १२११, १२१२ वत्स्यसे किम् च मानुष्ये भृगुशापबलाकृतः । तत्रापि तेऽहं वत्स्यामि प्राकाम्येन गणेश्वर ॥ 1039 । १२१२, १२१३ एवम् भूतेश्वरे नन्दी नित्यम् वसति पार्थिव । प्राकाम्येन हरो देवस्तथा त्वदनुकम्पया ॥ 1040 । १२१३, १२१४ [दायाँ स्तम्भ] ३६ (२) हरमुकुट : हरमुख पर्वत का शिखर हरमुकुट है। मुकुट मस्तक पर धारण किया जाता है। तुषाराच्छादित हिमालय शिखर की उपमा कवियों ने भारत माता के किरीट से दी है—तुषार किरीट धारिणीम् । अलबेरूनी ने इस पर्वत के विषय में लिखा है। ( २:३६३ ) दुधसुट पास की पूर्वीय दिशा में पर्वतमाला उठते उठते हरमुख शिखर में परिणत हो जाती है। यह शिखर लगभग १७ हजार फीट ऊँचा है। इसके चारो तरफ हिमानी अर्थात् ग्लेशियर है। कश्मीर उपत्यका से हरमुकुट पर्वत का सुन्दर दृश्य दृष्टि- गोचर होता है। पर्वत के मूल में स्थित सरोवर सुदूर प्राचीन काल से पवित्र तथा पुण्य स्थल माना जाता है। भगवान् शिव का हरमुकुट शिखर आवास है। पर्वत के समीपवर्ती तीर्थों की गाथाएं भगवान् शिव से सम्बन्धित की गयी हैं। हरचरित चिन्तामणि में इसका विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। नीलमत पुराण हरमुकुट के विषय में लिखता है। हरमुकुटमिति ख्यातम् शृंगम् हिमवतः शुभम् । जगाम सहसा नन्दी तपसे कृतनिश्चयः ॥ 1047 तस्यैव सरसोऽभ्यासे शृंगं त्रैलोक्यविश्रुतम् । हरिमुकुटमिति ख्यातं आरुरोह मुदान्वितः ॥ 1118 । १३२३ कश्मीर में एक जनश्रुति बहुत प्रचलित थी और है। हरमुकुट शिव का आवास है। मानव पद वहाँ नहीं पड़ सकता। आजकल भी कश्मीर के हिन्दू तथा मुसलमान दोनों वहाँ जाने से हिचकते हैं। ३६ (३) चन्दन बिन्दु : श्री स्टीन सितम्बर मास सन् १८९४ में इस शिखर पर पहुँचे थे। लौटने

प्रथम तरंग ७९ आलोक्य शारदां देवीं यत्र संप्राप्यते क्षणात् । तरङ्गिणो मधुमती वाणी च कविसेविता ॥ ३७ ॥ वहाँ देवी शारदा की तीर्थयात्रा के समय यात्री कवि पूजित तरंगिणी मधुमती एवं सरस्वती दोनों के समीप पहुँच जाता है । पर लोगों से उन्होंने अपनी यात्रा का वर्णन किया । परन्तु कश्मीरियों ने उसपर विश्वास नहीं किया । उनका कहना था । जिस शिखर पर श्री स्टीन पहुँचे थे । वह हरमुकुट नहीं था । वहाँ किसी प्राणी का पहुँचना कठिन है । श्री स्टीन के साथ एक मुसलमान कुली था । उससे पूछा गया । शिखर पर पहुँचे थे या नहीं । उसने शिखर पर चढ़ने की बात पूर्णतया अस्वीकार कर दी । वह शिखर पर चढ़ने की कल्पना भी नहीं कर सकता था । ३७ ( १ ) जनश्रुति है । आद्य श्री शंकराचार्य का कश्मीर मे आगमन हुआ था । वे शारदा मन्दिर में जाना चाहते थे । उन्हे मन्दिर प्रवेश करने की आज्ञा तत्कालीन पण्डितों ने नहीं दी । शारदा पीठ प्राचीन काल में काशी की तरह विद्या की राजधानी थी । वहाँ के विद्वानो का समस्त भारत में आदर तथा सम्मान किया जाता था । शारदा पीठ के विद्वानों ने पुरानी परम्परा के अनुसार शंकराचार्य के सम्मुख एक शर्त रखी । वे यदि शारदा पीठ के विद्वानो के प्रश्नों का उत्तर दे दें तो उनका प्रवेश मन्दिर में हो सकता था । कल्हण वर्णित चन्दन बिन्दु के सम्बन्ध में श्री स्टीन ने श्लोक की टिप्पणी में लिखा है कि उन्हें किसी पुस्तक तथा स्थानीय जनश्रुति परम्परा से इसका समर्थन नही मिल सका । श्री स्टीन सितम्बर मास में शिखर पर पहुँचे थे । उन्होने विस्तृत वर्णन नहीं लिखा है । कश्मीर में यह महीना श्रेष्ठ समझा जाता है । बरफ गिरने का भी यह समय नहीं है । कश्मीर का एक पुराकालीन नाम शारदा पीठ अथवा शारदा क्षेत्र था । शारदी का स्थान पठन पाठन तथा विद्याध्ययन के लिये प्रसिद्ध था । विद्या का केन्द्र माना जाता था । बौद्ध जगत् के तक्षशिला तथा नालन्द विद्या- केन्द्र थे । हिन्दू जगत् में यह धर्म तथा विद्या का केन्द्र था । कश्मीर में उसे वही स्थान प्राप्त था जो उत्तर भारत में काशी, पूर्व मे नवद्वीप तथा दक्षिण मे कांची को था । मैं भूतेश्वरादि स्थानो तथा हरमुख पर्वत के मूल तक पहुँचा था । शिखर १७ हजार फोट की ऊँचाई पर है । मैं हाईब्लड प्रेसर का मरीज हूँ । पैदल इतनी ऊँचाई पर चढ़ना मेरे लिए असम्भव था । मैने जो वर्णन लिखा है उसका मुझे गौण ज्ञान है । श्री स्टाइनादि लेखकों तथा स्थानीय लोगो द्वारा सुनी बातो के आधार पर लिखा है । इस स्थान के विषय में श्रीनगर स्थित वृद्ध ब्राह्मणों से मैने कुछ जानकारी प्राप्त करनी चाही । एक आस्तिक वयोवृद्ध पण्डित ने बताया । पुरानी पद्धति के अनुयायी पण्डितो में अब भी प्रथा प्रच- लित है । जिस दिन शारदा में स्नातको को प्रमाण पत्र दिया जाता था उसे ही किसी न किसी रूप में प्रचलित देखने के लिये आज भी सनातन धर्मावलम्बी ब्राह्मण अपने विद्यार्थियो को प्रमाणपत्र देते हैं । अथवा विद्यार्थी को स्नातक बना देते हैं । किसी युवक अनुसन्धानप्रिय विद्वान् को यहाँ की यात्रा कर वास्तविकता का पता लगाना चाहिए । कल्हण ने जो बातें लिखी है वे प्रायः सत्य सिद्ध हुई हैं । चन्दन बिन्दु किस रूपक के आधार पर लिखा था । इन्हें जानना चाहिए । पर कथानक कपटेश्वर में तैरते काट टुकड़ों से मिलता है ।