राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ७९ आलोक्य शारदां देवीं यत्र संप्राप्यते क्षणात् । तरङ्गिणो मधुमती वाणी च कविसेविता ॥ ३७ ॥ वहाँ देवी शारदा की तीर्थयात्रा के समय यात्री कवि पूजित तरंगिणी मधुमती एवं सरस्वती दोनों के समीप पहुँच जाता है । पर लोगों से उन्होंने अपनी यात्रा का वर्णन किया । परन्तु कश्मीरियों ने उसपर विश्वास नहीं किया । उनका कहना था । जिस शिखर पर श्री स्टीन पहुँचे थे । वह हरमुकुट नहीं था । वहाँ किसी प्राणी का पहुँचना कठिन है । श्री स्टीन के साथ एक मुसलमान कुली था । उससे पूछा गया । शिखर पर पहुँचे थे या नहीं । उसने शिखर पर चढ़ने की बात पूर्णतया अस्वीकार कर दी । वह शिखर पर चढ़ने की कल्पना भी नहीं कर सकता था । ३७ ( १ ) जनश्रुति है । आद्य श्री शंकराचार्य का कश्मीर मे आगमन हुआ था । वे शारदा मन्दिर में जाना चाहते थे । उन्हे मन्दिर प्रवेश करने की आज्ञा तत्कालीन पण्डितों ने नहीं दी । शारदा पीठ प्राचीन काल में काशी की तरह विद्या की राजधानी थी । वहाँ के विद्वानो का समस्त भारत में आदर तथा सम्मान किया जाता था । शारदा पीठ के विद्वानों ने पुरानी परम्परा के अनुसार शंकराचार्य के सम्मुख एक शर्त रखी । वे यदि शारदा पीठ के विद्वानो के प्रश्नों का उत्तर दे दें तो उनका प्रवेश मन्दिर में हो सकता था । कल्हण वर्णित चन्दन बिन्दु के सम्बन्ध में श्री स्टीन ने श्लोक की टिप्पणी में लिखा है कि उन्हें किसी पुस्तक तथा स्थानीय जनश्रुति परम्परा से इसका समर्थन नही मिल सका । श्री स्टीन सितम्बर मास में शिखर पर पहुँचे थे । उन्होने विस्तृत वर्णन नहीं लिखा है । कश्मीर में यह महीना श्रेष्ठ समझा जाता है । बरफ गिरने का भी यह समय नहीं है । कश्मीर का एक पुराकालीन नाम शारदा पीठ अथवा शारदा क्षेत्र था । शारदी का स्थान पठन पाठन तथा विद्याध्ययन के लिये प्रसिद्ध था । विद्या का केन्द्र माना जाता था । बौद्ध जगत् के तक्षशिला तथा नालन्द विद्या- केन्द्र थे । हिन्दू जगत् में यह धर्म तथा विद्या का केन्द्र था । कश्मीर में उसे वही स्थान प्राप्त था जो उत्तर भारत में काशी, पूर्व मे नवद्वीप तथा दक्षिण मे कांची को था । मैं भूतेश्वरादि स्थानो तथा हरमुख पर्वत के मूल तक पहुँचा था । शिखर १७ हजार फोट की ऊँचाई पर है । मैं हाईब्लड प्रेसर का मरीज हूँ । पैदल इतनी ऊँचाई पर चढ़ना मेरे लिए असम्भव था । मैने जो वर्णन लिखा है उसका मुझे गौण ज्ञान है । श्री स्टाइनादि लेखकों तथा स्थानीय लोगो द्वारा सुनी बातो के आधार पर लिखा है । इस स्थान के विषय में श्रीनगर स्थित वृद्ध ब्राह्मणों से मैने कुछ जानकारी प्राप्त करनी चाही । एक आस्तिक वयोवृद्ध पण्डित ने बताया । पुरानी पद्धति के अनुयायी पण्डितो में अब भी प्रथा प्रच- लित है । जिस दिन शारदा में स्नातको को प्रमाण पत्र दिया जाता था उसे ही किसी न किसी रूप में प्रचलित देखने के लिये आज भी सनातन धर्मावलम्बी ब्राह्मण अपने विद्यार्थियो को प्रमाणपत्र देते हैं । अथवा विद्यार्थी को स्नातक बना देते हैं । किसी युवक अनुसन्धानप्रिय विद्वान् को यहाँ की यात्रा कर वास्तविकता का पता लगाना चाहिए । कल्हण ने जो बातें लिखी है वे प्रायः सत्य सिद्ध हुई हैं । चन्दन बिन्दु किस रूपक के आधार पर लिखा था । इन्हें जानना चाहिए । पर कथानक कपटेश्वर में तैरते काट टुकड़ों से मिलता है ।