राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ राजतरंगिणी ने मधुमती नदी का उल्लेख किया है । यह वर्तमान नदी ( मोहर ) है । पिपीलिका का वर्णन महाभारत में मिलता है । तद् वै पिपीलिकं नाम उद्धृतं यत् पिपीलिकैः । जातिरूपं द्रोणमेयमहापुंः पञ्चशो नृपः ॥ ( सभापर्व : ५२-४, ) हिरोडोटस भी पिपीलिका का वर्णन करता है जो चींटियों द्वारा एकत्रित किया जाता था । ( ३:१:१०५ ) परशुराम भगवान् ने क्षत्रियों का २१ बार संहार कर, मधुमती के तटपर केशव की मूर्ति स्था- पित की थी । यहाँ पर बलि के साथ पूजा की जाती थी । परशुराम ने गृद्धकूट पर्वत पर भी विष्णु की प्रतिमा स्थापित की थी । नीलमत पुराण परशुराम को भगवान् का अवतार नहीं मानता । इन्द्रकीलम् समारुह्य गोसहस्रफलम् लभेत् । तथा मधुमतीतीरे शाण्डिल्येन निवेशितम् ॥ —1230 : १४४३, १४४४ शाण्डिलीमधुमत्योश्च स्नातो यः संगमे नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोक स गच्छति ॥ —1233 : १४४६ मधुमत्यास्तयोश्चैत्र स्नातस्य नृप संगमे । कथितं मुनिभिः पुण्यमश्वदानस्य यत्फलम् ॥ —1239 : १४५२, १४५३ ततः प्रभवमासाद्य मधुमत्या मनोहरम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोके महीयते ॥ —1240 : १४५३, १४५४ काश्मीर में एक दूसरी मधुमती का वर्णन मिलता है । यह वितस्ता नदी में मिलनेवाला बन्द पोर नाला है । कृष्णावितस्तासंयोगे गोसहस्रफलम् लभेत् । वितस्तामधुमत्योश्च संगमे त्रिदिवम् व्रजेत् ॥ —1229 : १४४२ कुलारणी पापहरा च कृष्णा नदीसुपुण्या मधुमत्यथापि । नदी परुष्णी च तथात्र पुण्या प्रयान्ति दिव्या वरदां वितस्ताम् ॥ —1390 : १५०८ (३) सरस्वती : शारदा तीर्थ के ठीक दूसरी तरफ उत्तर मे तुषारमण्डित पर्वतमाला है । चिलास से वही एक बड़ी नदी कृष्णगंगा में आकर मिलती है । इस नदी को कनकतोरी कहते हैं । यही शारदा माहात्म्य मे वर्णित सरस्वती नदी है। यह नदी पंजाब की सरस्वती नदी नहीं है । एक और नदी शाण्डिली का उल्लेख मिलता है । मधुमती तथा दुर्गा मन्दिर के समीप इसका स्थान माना गया है । नीलमत पुराण में पंजाब की सरस्वती तथा काश्मीर दोनों का उल्लेख मिलता है : यमुनां यमपाशाङ्गी शतद्रु ं द्रुतगामिनीम् । सरयू ं यूपसंपन्नां तथा देवीं सरस्वतीम् ॥ —91 : १३२, १३३ उत्तीर्य यमुनां देवीं तथा देवीं सरस्वतीम् । कुरुक्षेत्रं तथा दृष्ट्वा सञ्चितैर्यन्त्र विधुता ॥ —126 : १६९ मकरेण ययौ गंगा कूर्मेण यमुना नदी । वृषारूढ़ा शतद्रुश्च महिषेण सरस्वती ॥ —153 : २०४, २०५ ऋद्धियुग्दिस्तथा निद्रां धनेशं नलकूबरम् । शंखपद्मौ निधी पूज्यौ भद्रकाली सरस्वती ॥ —585 : ७०६ सरस्वत्यौघनाशा च सुवेरुः विमलोदका । पुष्करादीनि तीर्थानि वितस्ताद्याश्च निम्नगाः ॥ —600 : ७२१, ७२२ शुद्धा सरस्वती चैव संयोगं यत्र गच्छतः । तत्र स्नातस्य रामस्य करौ शुद्धिमुपागतौ ॥ —1183 : १३९५