राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ८३ चक्रभृद्विजयेशादिकेशवेशानभूषिते तिलाङ्गोऽपि न यत्राऽस्ति पृथ्व्यास्तीर्थैर्बहिष्कृतः ॥३८॥ ३८. चक्रभृत्¹, विजयेश², आदिकेशव³ तथा ईशान द्वारा विभूषित इस भूमि पर तिल मात्र.ऐसा स्थान नहीं है, जो तीर्थों से बहिष्कृत हो । नदी सरस्वती नाम यस्यां स्नातो दिवं व्रजेत् । पूर्वं दक्षिणभागे तु स्थिता देवसरस्यपि ॥ —1984 : १४९६ पादटिप्पणियाँ : कल्हण ने यहाँ शैव तथा वैष्णव दोनों मता- नुयायियो की समानता का ध्यान रखा है। चक्र- धर अर्थात् विष्णु उसके पश्चात् शिव विजयेश पुनः विष्णु आदिकेशव तथा अन्त में शिव ईशान से समाप्त करता है। विष्णु पालक है। रक्षक है। शिव प्रलय, संहार, समाप्ति के देवता हैं। अतएव उनके नाम के साथ वह देवों का क्रम समाप्त करता है । ३८ (१) चक्रभृत् चक्र चक्रवर्ती राजा का चिह्न तथा विष्णु एवं कृष्ण का आयुध है। वायु पुराण (७ : ६८ ) तथा महाभारत स्वर्गारोहण पर्व (४ : १२७) के अनुसार चक्र के धारण करने के कारण विष्णु का नाम चक्रधर रखा गया है । चक्रभृत्, केशव तथा चक्रधर भगवान् विष्णु के पर्यायवाची नाम हैं। वैदिक साहित्य में चक्र रथ के पहिए के लिए प्रयुक्त किया गया है। ऋग्वेद में दो-तीन तथा आठ चक्रों के रथ का उल्लेख मिलता है। कुम्भकार के चाक को भी चक्र कहते हैं । चक्रधर विष्णु तथा विजयेश शिव दोनों का मन्दिर पास ही पास था । यहाँ पर चक्रधर के स्थान पर कल्हण ने 'चक्रभृत्' शब्द का प्रयोग किया है । चक्रधर एक अधित्यका ( उदर ) पर स्थित था । उसे अब तस्करदर कहते हैं। राजतरंगिणी के प्रथम तरंग २६१ में नागराज सुश्रुवा के प्रसंग में चक्रधर मन्दिर का उल्लेख आता है । राजतरंगिणी (४ : १९१) में इसका वर्णन पुनः मिलता है । ललितादित्य ने वितस्ता नदी पर रहट लगवाया था। इसका उल्लेख पुनः (रा० त० ८.१७१ ) मिलता है । चक्रतीर्थ— सन्नीतिं तां तथा दृष्ट्वा चक्रतीर्थं तथैव च । यदर्धं भारदोद्गीतं गया चरितभूतले ॥ 129 : १७२ अहो लोकस्य निर्बन्ध आदित्यग्रहणं प्रति । चक्रतीर्थेन पर्यस्तं महाद् दशगुणं फलम् ॥ 130 : १७३ तं दृष्ट्वा चक्रतीर्थाख्यं तथा तीर्थं पृथूदकम् । दृष्ट्वा विष्णुपदं पुण्यं तथा चमरपर्वतम् ॥ 131 : १७४ ब्रह्मणो यागभूमिश्च तत्र पुण्या महोदये । चक्रतीर्थं देवतीर्थं तीर्थं ब्राह्मणकुण्डिकाम्॥ 1449 : १४६२ वह्नितीर्थं चन्द्रतीर्थं नागतीर्थं तथैव च । चक्रतीर्थं वामनं च गोप्रदानफलं लभेत् ॥ 1317 : १५३१ चक्रधर का मन्दिर हस्तिकर्ण से १ मील दक्षिण वितस्ता नदी एक बड़ा मोड़ लेती है । इस प्रकार बने Renemsula में एक छोटा उदर बन गया है। वह सबसे अलग और ऊँचाई पर होने के कारण इस क्षेत्र में अनायास लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। यहीं पर विष्णु चक्रधर का प्राचीन मन्दिर था।