राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ राजतरंगिणी चक्रधर मन्दिर का वर्णन माहात्म्य, जोनराज राजतरंगिणी (७६३), मख कवि के श्रीकंठ चरित (३:१२) तथा नीलमत पुराण (११७०) में उल्लेख मिलता है। इसके समीपवर्ती नरपुर नगर के अग्निकाण्ड के सम्बन्ध में भी इसका उल्लेख किया गया है। राजा उच्चल (११०१-११११) ने चक्रधर क्षेत्र के देवस्थान का जीर्णोद्धार कराया था। उनके समय में स्थान अत्यन्त जीर्णावस्था में था। (रा० त० ८:७८) राजा सुस्सल (सन् ११२१-११२८ ई०) के समय हुए भयंकर गृहयुद्ध के प्रसंग में चक्रधर मन्दिर का उल्लेख मिलता है। मन्दिर उद्र के समतल भूमि पर बना था। विजयेश्वर किंवा विजत्रोर में राजकीय सेना ने लोगो से स्थान खाली करा लिया। वहाँ उद्वासित तथा समीपवर्ती ग्रामो के लोग चक्रधर मन्दिर में शरण लिये थे। ऊँचाई पर होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से स्थान उपयुक्त माना गया है। विद्रोही सैनिको ने मन्दिर में स्थित पराजित सैनिको तथा नागरिकों को घेर लिया। मन्दिर की चहार दिवारी (प्राकार) मोटी लकड़ी की बनी थी। मालूम होता है यहाँ पत्थर के अभाव में लकड़ी का उपयोग किया गया था। उसमें द्वार बने थे। विद्रोहियो ने उसमें आग लगा दी। पहले लकड़ी की चहार दिवारी जलने लगी तत्प- श्चात् आग प्रांगण में फैली। लोग अग्नि से घिर कर भाग भी नहीं सके और वही जलकर मर गये। लकड़ी का घेरा वगैरह था अतएव मन्दिर का भग्नावशेष यहाँ नहीं मिलता। प्रोफेसर बूल्हर को उद्र उत्तरीय छोर पर जो एक निचली भूमि के कारण शेष भूखण्ड से अलग है। यहाँ एक आयताकार घेरा का चिह्न मिला था। वह घेरा ४० वर्गगज में था। उसमें regular गड्ढों के चिह्न थे। वह गड्ढे मालूम होता है कि चहार दीवारो के भस्मावशेष के चिह्न रह गये थे। उच्चल द्वारा जीर्णोद्धार के बाद मन्दिर में आग काण्ड हुआ था। कालान्तर में मन्दिर का जीर्णोद्धार किया गया था। विजत्रोर (विजयेश्वर) के अधोभाग में वितस्ता के वाम तट पर एक मील दूर एक (उद्र) अधित्यका पर यह देव स्थान था। इस अधित्यका का नाम आज भी तरुवदर उद्र है। कल्हण ने प्रायः चक्रधर पहाड़ी तथा मन्दिर का उल्लेख किया है। आपत्ति काल में सुरक्षा के लिये स्थान उपयोगी है। (रा० त० १: २६१, २७०; ४:१६१, ७:२५८, २६१,२६६, ८:७८, ८:९७१, ९९१, १००४, १०६४ में) इसका उल्लेख किया गया है। नीलमत पुराण चक्रधर को विष्णु का रूप मानता है। इस स्थान के सम्बन्ध में एक गाथा का वर्णन करता है। (नीलमत ९००, :११६६, ११४९: १३५९) हरचरितचिन्तामणि (८:६१) में भी उल्लेख मिलता है। इसकी भौगोलिक स्थिति एवं स्थान का पता (रा० त० ८:९७१) श्लोक द्वारा मिलता है। यह तीर्थ यात्रा में सम्मिलित नहीं किया जाता है। ३८ (२) विजयेश्वर : विजयेश्वर अत्यन्त प्राचीन काल से कश्मीर का प्रसिद्ध तथा पवित्र तीर्थ स्थान रहा है। विजयेश, ईशान तथा विजयभाड शब्द शिव का वाचक है। विजयेश्वर नाम पर नगर को संज्ञा दी गयी थी। विजयेश्वर का अप- भ्रंश विजत्रोर है। काश्मीर शब्द ब्रोर संस्कृत भट्टारक शब्द का अपभ्रंश है। उसका अर्थ ईश्वर है। काश्मीरी शब्द ब्रोर का अर्थ देवी है। सम्राट् अशोक के समय मन्दिर का जीर्णोद्धार हुआ था इसका वर्णन कल्हण करता है। यहाँ कुछ ध्वंसावशेष बिखरे पड़े हैं। विजयेश्वर माहात्म्य तथा हरचरित- चिन्तामणि में भिन्न-भिन्न गाथाएँ इसके सम्बन्ध में दी गई हैं। कुछ अँग्रेजी पुस्तकों में पंजाबी के आधार पर इसे बिजविहार का अपभ्रंश कहा गया है। यह गलत है। नीलमत पुराण में उल्लेख आता है :