भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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७८ राजतरंगिणी [बायाँ स्तम्भ] नन्दी सर्वदा भूतेश्वर में रहते हैं। भगवान् शिव भी नन्दी के कारण वहाँ निवास करते हैं। नीलमत पुराण में उपाख्यान का निम्नलिखित रूप मिलता है : शिलादो नाम विप्रोऽभूत् पुरा पुत्रविवर्जितः । तेन वर्षशतं भुक्त्वा शिलाचूर्णं नराधिप । नन्दिपर्वतमासाद्य महादेवप्रसादतः ॥ 1033 । १२०५, १२०६ पुत्रार्थे तु तदा तस्य देवदेवो अनुकम्पया । पुत्रत्वे नन्दिनम् प्रादात् स्वगणेशम् महाबलम् ॥ 1033 । १२०६, १२०७ दीयमानस्तु पुत्रत्वे नन्दी प्रोवाच शंकरम् । अनुग्रहाद् द्विजस्यास्य पुत्रोऽहं भविता प्रभो ॥ 1034 । १२०८, १२०८ किं त्वयोनिभवो देव भवेयं तस्य पुत्रकः । चिरम् च न च वत्सेऽहं मानुषे त्वद्विनाकृतः ॥ 1035 । १२०८, १२०९ तमुवाच हरो देवः प्रहसन्ननुकम्पया । उमाविवाहे शप्तोऽसि भृगुना त्वम् गणोत्तम ॥ 1036 । १२०९, १२१० अपूजितेन मानुष्ये तेनापि भविता ध्रुवम् । तेन चैव शरीरेण मत्समीपमुपेष्यसि ॥ 1037 । १२१०, १२११ ततः प्रभृति मानुष्ये वत्स्यसि त्वम गणोत्तम । वत्स्यसे मत्समीपे च प्राकाम्येन यथा सुखम् ॥ 1038 । १२११, १२१२ वत्स्यसे किम् च मानुष्ये भृगुशापबलाकृतः । तत्रापि तेऽहं वत्स्यामि प्राकाम्येन गणेश्वर ॥ 1039 । १२१२, १२१३ एवम् भूतेश्वरे नन्दी नित्यम् वसति पार्थिव । प्राकाम्येन हरो देवस्तथा त्वदनुकम्पया ॥ 1040 । १२१३, १२१४ [दायाँ स्तम्भ] ३६ (२) हरमुकुट : हरमुख पर्वत का शिखर हरमुकुट है। मुकुट मस्तक पर धारण किया जाता है। तुषाराच्छादित हिमालय शिखर की उपमा कवियों ने भारत माता के किरीट से दी है—तुषार किरीट धारिणीम् । अलबेरूनी ने इस पर्वत के विषय में लिखा है। ( २:३६३ ) दुधसुट पास की पूर्वीय दिशा में पर्वतमाला उठते उठते हरमुख शिखर में परिणत हो जाती है। यह शिखर लगभग १७ हजार फीट ऊँचा है। इसके चारो तरफ हिमानी अर्थात् ग्लेशियर है। कश्मीर उपत्यका से हरमुकुट पर्वत का सुन्दर दृश्य दृष्टि- गोचर होता है। पर्वत के मूल में स्थित सरोवर सुदूर प्राचीन काल से पवित्र तथा पुण्य स्थल माना जाता है। भगवान् शिव का हरमुकुट शिखर आवास है। पर्वत के समीपवर्ती तीर्थों की गाथाएं भगवान् शिव से सम्बन्धित की गयी हैं। हरचरित चिन्तामणि में इसका विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। नीलमत पुराण हरमुकुट के विषय में लिखता है। हरमुकुटमिति ख्यातम् शृंगम् हिमवतः शुभम् । जगाम सहसा नन्दी तपसे कृतनिश्चयः ॥ 1047 तस्यैव सरसोऽभ्यासे शृंगं त्रैलोक्यविश्रुतम् । हरिमुकुटमिति ख्यातं आरुरोह मुदान्वितः ॥ 1118 । १३२३ कश्मीर में एक जनश्रुति बहुत प्रचलित थी और है। हरमुकुट शिव का आवास है। मानव पद वहाँ नहीं पड़ सकता। आजकल भी कश्मीर के हिन्दू तथा मुसलमान दोनों वहाँ जाने से हिचकते हैं। ३६ (३) चन्दन बिन्दु : श्री स्टीन सितम्बर मास सन् १८९४ में इस शिखर पर पहुँचे थे। लौटने