राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ६९
कपटेश्वर तीन ओर से अत्यन्त हरित उत्तुंग देवदार तथा चीड़ वृक्षों की अवलियों से आवृत है। उत्तुंग हरित सुन्दर शिखर हैं। ऊपर निर्मल नील गगन है। गांव की दिशा की ओर पृष्ठ भागों में बहुत दूर हिमाच्छादित शिखर सूर्य किरणों के प्रतिबिम्ब में रंग बदलता दिखाई पड़ता है। यदि आँखें नीचे उठ गयीं, तो विस्तृत हरी-भरी उपत्यका, उनमें यत्र-तत्र बिखरे ग्राम छाया तुल्य दिखाई देते हैं।
स्थान की परिकल्पना अद्भुत है। विचित्र है। आज खंडहर हैं। इन खंडहरो में किंचित् कल्पना का आश्रय लेने पर स्थान की भव्यता का अनुभव होगा। मध्य में वृत्ताकार कुंड के चारों ओर पत्थर की सीढ़ियाँ हैं। जल के नीचे तक सीढ़ियाँ चली गयी हैं। जल के स्तर से दो-तीन फीट ऊपर २० छोटी-छोटी मन्दिराकार मड़ियाँ कुंड के तटपर बनी हैं। चारो दिशाओ से चार सीढ़ियाँ भूमि स्तर से जल तक आती हैं। प्रत्येक दो सीढ़ियों के मध्य उल्लिखित ५ मड़ियाँ मन्दिरा- कार बनी हैं। मडियों की छतें प्रस्फुटित कमल के चौकोर पत्थर से ढँकी हैं। मड़ियाँ चौकोर हैं। इस प्रकार की मड़ियों के निर्माण की प्रथा काशी तथा अन्य तीर्थ स्थानों में जलाशयों के तटों पर हैं। उनमें विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं। कहीं-कही मड़िया स्नान के पश्चात् वस्त्र परिवर्तन करने, साधुओं के निवास किंवा पूजापाठ करने के लिए काम में लाई जाती हैं। कपटेश्वर की मड़िया लगभग ३ फुट ऊँची तथा उतनी ही चौड़ी होंगी। प्रायः वर्गाकार हैं।
मड़िया केवल देवस्थान एवं मूर्ति स्थापन के लिए बनाई गई थी। एक मढ़ी में पत्थर का सिंहा- सन नष्ट होने से बच गया है। गाँववालों से मड़ियों के विषय में पूछने पर पता चला। उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना था। मड़ियों में विभिन्न देवताओं की मूर्तियाँ थीं। मुस्लिम काल में उन्हें उठाकर फेंक
दिया गया। मन्दिर गिरा दिए गए। इस प्रकार कुफ्र एक का गढ़ नष्ट हो गया। ईमान की विजय हुई।
मड़ियों के ऊपर भूमि का विस्तृत ऊपरी स्तर है। यह चौड़ा स्तर चारों ओर चौकोर हैं। स्तर के मूल से भूमि बांध की तरह उठती गयी है। उस ऊँची भूमि पर चारो दिशाओ में चार भव्य मन्दिरों का निर्माण कराया गया था। इस समय केवल एक का आकार शेष रह गया है। शेष तीन मंदिर तोड़ दिए गए हैं। खँड़हर बन गए हैं। उनके पत्थर ग्रामीण उठा ले गये हैं। जारी चारों मन्दिरों के द्वार से जल तक पहुँचने के लिए चारो दिशाओं से उतरती सीढ़ियाँ कुंड में जाकर लीन हो जाती हैं। ऊपरी मंदिर जलस्तर से लगभग एक सौ फुट ऊँचाई पर होगा।
ग्राम की तरफ जल एक प्रणाली से निकलता है। प्रणाली के तल में कुछ खंडित देवताओं की मूर्तियाँ तथा शिवलिंग रखे हैं। वे तोड़कर छोड़ दिये गये थे उनकी दयनीय स्थिति जगत् को दिखाने के लिए उन्हें मारियों में ईंटों की तरह रख दिया गया है। इस स्थान से जल लेकर आचमन किया जाता है।
ग्राम तथा कुंड की मध्यवर्ती भूमिपर इस समय मंदिरों के विशाल ध्वंसावशेष मिलेंगे। एक छोटा मंदिर गांव की ओर वाली ऊँची भूमि तथा सरोवर की दीवार के मध्य स्थित है। तीनों मंदिरों के मुख किंवा द्वार सरोवर की तरफ हैं। दोनों विशाल मन्दिरों का अधिष्ठान भूमि से १५ फुट ऊँचाई पर है। मन्दिर के अन्तराल तक पहुँचने के लिए ९ सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी। उन्नत दोनों विशाल मन्दिरो की पट्टिका के ऊपर का ढांचा बिल्कुल लोप हो गया है। भित्तियों का कहीं पता नहीं है। केवल चारों भित्तियों का मूल आकार मात्र शेष रह गया है।
मन्दिरों के पत्थर ग्रामीण तोड़-तोड़कर उठा ले गये हैं। केवल भूमि से अन्तराल तक पहुँचनेवाली