भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 149

६८ राजतरंगिणी

दर्शनस्य मदीयस्य पूर्वजं भविष्यति । इत्येतत्कथितं गुह्यं कपटेश्वरसंज्ञकम् ॥ —1147 : १२५९, १२६०,

कपटेश्वर प्रत्यक्ष होकर जाना चाहिए। वैरी- नाग से होते हुए कपटेश्वर जाना पहले चाहे सुविधा- जनक रहा हो, परन्तु सड़कों तथा परिवहन के साधना के कारण, अनन्त नाग तथा अनवल होकर जाना अधिक सरल तथा सुविधाजनक हो गया है। अनवल के डाक बंगला के दक्षिण पार्श्व में एक पक्की सड़क कपटेश्वर जाती है। उससे कुछ आगे जाने पर एक कच्ची सड़क मिलती है। संभव है कुछ समय पश्चात् यह सड़क भी पक्की बन जाय। यह सड़क देवदार के सुरम्य वनों द्वारा कोठर ग्राम पहुँचती है। मार्ग की वन-श्री सुन्दर है। मन करता है। चुप-चाप यहाँ बैठकर प्रकृति की अभिरामता दखते रहें।

सड़क चढ़ाव-उतार से होकर गुजरती है। कुछ आगे जाने पर दूसरी ओर की उपत्यका का मनोरम प्राकृतिक दृश्य मिलता है। पगडण्डी कोठर गाँव तथा कपटेश्वर पर्वत के पादमूल तक पहुँच जाती है। ग्राम से सड़क के दाहिनी तरफ अखरोट, विलों की हरित झूमती सघन तरु पंक्तियाँ मिलेंगी। ऊपर से किंचित् कल-कल ध्वनि के साथ उतरता निर्झर दिखाई देगा। यह जल पापसूदन कुंड द्वारा निकला निर्मल उज्ज्वल शीतल जल है। निर्झर प्रणाली पर दो एक लकड़ी के बने स्नानकुट अर्थात् 'स्नान गृह' रखे थे। काश्मीरी जलाशयों के समीप सर्वत्र लकड़ी निर्मित महिलाओं के स्नान निमित्त स्नानकुट रखे मिलते हैं।

सड़क त्यागकर पगडण्डी पकड़नी पड़ती है। लगभग २ फर्लांग की सरल चढ़ाई है। पाँच मिनट की चढ़ाई के पश्चात् पापसूदन तीर्थ का मनोरम दर्शन मिलता है।

वैरीनाग अर्थात् नीलकुण्ड के समान यहाँ एक विस्तीर्ण कुण्ड दियां गया सा है। वैरीनाग से बहुत बड़ा है। जल वैरी नाग की तरह स्थिर, शान्त तथा औषम शय है। जल में एक प्रकार की चंचलता दिखाई पड़ती है। जैसे कुंड की पाषाण जल स्तर पर फिर रही हो। एक श्रोता से जल गोमुख सदृश द्वारा बाहर निकलता रहता है। नदी के जल त्रिविद् प्रवाह का रूप धारण करता है। ग्राम के जल प्रणाली का रूप ले लेता है। ग्राम की स्तर से लगभग २०० फीट की ऊँचाई पर पापसूदन तीर्थ का पवित्र कुंड स्थित है।

स्थान शान्त है। चारों ओर वन देखकर मन पुलकित हो जाता है। यहाँ की प्रकृति सुषमा में जीवन है। चेतना का अनुभव होता है। बहुधा स्थानों के सुन्दर होने पर भी उनमें चेतना का अनुभव नहीं होता। यहाँ मुझे जीवन तथा चेतना का योग प्रकृति के शान्त वातावरण में होने लगा। जिस समय यह स्थान अपनी पूर्ण गरिमा में रहा होगा उस समय वैरीनाग इसके सम्मुख तुच्छ प्रतीत होता होगा। इसकी सुन्दरता की कल्पना में नील नाग दिया वैरी नाग की सुन्दरता नगण्य मालूम होगी।

कपटेश्वर धार्मिक तीर्थ था। मन्दिरों का अद्भुत समूह था। बुतपरस्ती का एक बड़ा मरकज होने के कारण इसके विनाश अथवा इसे सुन्दर बनाने का प्रयास हिन्दू राजाओं के पश्चात् मुस्लिम राजाओं ने नहीं किया। यह स्थान श्रीनगर से दूर है। मुख्य राजपथ से दूर है। यहाँ आना कठिन है। अतएव इसका महत्त्व घटता गया। वैरीनाग सुगम होने के कारण महत्त्व प्राप्त करता गया। मुगलों के कारण, राजकीय संरक्षण के कारण, विकास की सुनियोजित योजना के कारण, वैरीनाग ने सुन्दरता का परिधान पहन लिया है। वितस्ता का उद्गम स्थान होने के कारण साधारण जनता की दृष्टि में इसका मान बढ़ता गया। चाहे वे हिन्दू हों अथवा मुसलमान।