भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 984 में से

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पृष्ठ 151

७० राजतरंगिणी सीढियां शेष रह गयी हैं। यह दोनों मन्दिर दीवार तथा कुंड के मध्यवर्ती भूमि की सीढ़ियों के दक्षिण में स्थित हैं। लघु मन्दिर वाम पार्श्व में हैं। लघु मन्दिर में दो साधू अपना सामान रखते हैं। उसमें प्रतिमा किंवा शिवलिंग नही है। लगभग तीन वर्षों से वे यहाँ निवास करते हैं। समीप फौज की छावनी है। फौज के सिपाहियों ने अपने प्रयास से एक तिरपाल डालकर अस्थायी टेंट बना दिया है। टेंट में बाबाजी भोजन बनाते हैं। रात्रि में सोते हैं। उनमें एक हरिद्वार तथा दूसरा प्रयाग का साधु था। बाहरी दीवाल की मध्यवर्ती सीढ़ियों के दोनों पार्श्व में १० गवाक्ष की तरह मढ़ियाँ बनी हैं। इस प्रकार एक दिशा की दीवाल में २० ताखा थे। चारो ओर की दीवालो में कुल ८० मढ़ियाँ रही होंगी। शेष तीन तरफ की दीवालों में कोई मढ़ी शेष नहीं रह गयी है। दीवालों का आकार तथा रूप समाप्तप्राय हैं। इन मढ़ियों की छतें पत्थर पर खुदे उत्फुल्ल कमल की बनी हैं। एक ओर लघु मन्दिर उक्त छोटे मन्दिर के सम्मुख कुछ हटकर हैं। भग्ना- वस्था में हैं। दोनों छोटे मन्दिर ऊँचे अधिष्ठान पर बने हैं। मैंने साधुओ से बहुत देर तक बातें कीं। उनका कहना था। दो वर्ष पूर्व तक यहाँ बहुत पत्थर थे। शनैः शनैः सब चोरी हो गये हैं। लोग उठा ले गये। गाँववाले मकान बनाने तथा कब्रों में लगाने के लिए ले जाते हैं। रक्षा के अभाव में प्रतीत होता हैं, यहाँ के सब ध्वंसावशेष समाप्त हो जाएँगे। उसी भूमि पर एक ओर एक और मन्दिर शेष रह गया है। मैंने गाँववालो से यहाँ की बातें जाननी चाही। पूछने पर पता चला। पचास-साठ वर्ष पूर्व उनका चिह्न था। किंतु वे गिरते ही गए। कोई मरम्मत नहीं होती थी। मंदिरों में देवता नहीं थे। अतएव हिंदू डोगरा राज काश्मीर में होने पर भी उनकी ओर ध्यान नहीं दिया गया। पत्थर ले जाने वालों को कोई रोकने वाला नहीं था। इसलिए पत्थर आदि गायब होने लगे। मन्दिरों के स्थान पर मढ़ियों के ढूहे रह गये है। कुछ समय पश्चात् ढूहे जो पुराने चूनों और सुर्ख़ियों के अवशेष थे, उन्हें गधों तथा छतों में लगाने के लिए लोग ढो ले गये। चैत्र तृतीया को यहाँ मेला लगता हैं। स्थानीय मुसलमानों से इस मन्दिर तथा स्थान के विषय में सर्वदा कुछ न कुछ विवाद रहता है। ग्राम में पीने तथा सिंचाई का एक मात्र स्रोत इस तीर्थ का जल है। जब से यहाँ साधु लोग रहने लगे हैं, स्थान की सुरक्षा होने लगी है। टेंट लगने के पहले साधु लोग वृक्षों के नीचे बैठकर तुषारपात जैसे भयंकर काल को काट देते थे। साधुओं की कोई आमदनी नहीं है। मुसलमान कभी कुछ देते नहीं। यात्री आते नहीं। कभी कोई भूला भटका आ गया तो दो-चार पैसा दे दिया। लकड़ियाँ वृक्षों से तोड़ लेते हैं। धूनी सतत जलती रहती है। साग-पात मिल गया। पका लिया। नहीं मिला तो चुपचाप पड़े रहे। उनका सन्तोष, उनकी शांति मुझे पसन्द आई। इस विरोधी वाता- वरण में, आकाश के नीचे, बिना किसी साधन के, बिना किसी आशा के, अपने घरों से हजारों मील दूर पड़े रहना, उनकी धार्मिकता, उनकी कठोर लगन का ज्वलन्त उदाहरण था। मेरा मन यहाँ उदास हो गया। स्थान जितना सुन्दर था, उतना ही उपेक्षित था। प्रकृति ने उसे सुषमा दी। मनुष्यो ने उसे सजाया। और मनुष्यो ने ही उसे नष्टकर खंडहर बना दिया। मानव कंकाल- तुल्य अपनी करुण गाथा सुनाने के लिए उसे छोड़ दिया। मैं मन मारे चुपचाप कल-कल नाद करते जल प्रणाली के साथ गाँव की ओर उतर चला। इस स्थान को सर्वदा के लिए नमस्कार कर, इसके रचनाकारों के प्रति श्रद्धा प्रकट कर, और इसके नष्ट करने वालों की मानवीय दुर्बलता पर अफसोस करते।

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