राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ७१ सन्ध्यादेवी जलं यस्मिन् धत्ते निस्सलिले गिरौ । दर्शनं पुण्यपापादामन्वयव्यतिरेकयोः ॥ ३३ ॥ ३३. काश्मीर मण्डल के निःसलिल गिरि पर सन्ध्या देवी के जल धारण द्वारा प्रत्यक्ष प्रकट होता है कि वहाँ पुण्य का अस्तित्व तथा पाप का अभाव है ।
[बायाँ स्तम्भ] मैं गाँव में आकर ठहर गया । इन ग्रामीणों के पूर्वज कभी इन मंदिरों के उपासक थे । उनके पुरोहित लेकिन आज उस ओर उलट कर देखने में हिचकते हैं । उपासकों के वंशज कहलाने में संकोच करते हैं । बल्कि नापसन्द करते हैं । स्त्रियाँ काम कर रही थीं । मैं खड़ा हो गया । वे मक्के की वालों में दाने निकाल रही थी । ओखली होती है । लम्बे मूसल होते हैं । ओखली में बाल डालकर कूटती हैं । मक्के के दाने तथा खुखडी अलग हो जाते हैं । वे हमें चकित होकर देखने लगी । खेलते बच्चे कुछ सहम कर खड़े हो गए । हमारा मन यहाँ से हट जाने के लिये कहने लगा । गाँव में अखरोट के वृक्षों की बहुलता है । ग्रामीणों का सीधा सादा सरल जीवन अच्छा लगा । वे शहरी वातावरण से दूर थे । उनकी जीविका अखरोट, शाली तथा मक्का की उपज पर निर्भर थी । अखरोट का मौसम था । अखरोट घाम में सूखने के लिये फैलाए गए थे । मुझे देखकर बच्चे अखरोट के पास खड़े हो गये । बालजन्य दुर्बलता उनमें आ गई । कहो मैं अखरोट, उनकी एकमात्र सम्पत्ति उठा न लूँ । मैं उन्हें देखकर मुस्कराया । चुपचाप उन्हें देखने लगा । मूसल चलाती स्त्रियाँ जैसे कुछ समझ न पाकर मूसल चलाना रोक कर मेरी ओर देखने लगी । मैं कुछ बोलना चाहा । बोल न सका । अपनी राह पकड़ा । स्थान रम्य है । सुहावना.है । विकास करने पर आदर्श पर्यटन केन्द्र बन सकता है । केन्द्र होने पर स्थानीय निर्धन ग्रामीणों की आर्थिक दशा सुधर सकती है । पर्यटकों को कश्मीर का, कभी का भूला, एक तीर्थस्थान दर्शनार्थ मिलेगा ।
[दायाँ स्तम्भ] पाठभेद : श्लोक ३३ में 'धत्ते' की जगह 'दत्ते' पाठ भेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३३ (१) सन्ध्या देवी : सन्ध्या देवी ब्रह्मा की मानस कन्या कही जाती हैं । यहाँ सन्ध्या देवी प्रसिद्ध त्रिसन्ध्या निर्झर रूप में प्रकट होती है । वह उप- त्यका के एक तरफ है । देवल गोम ग्राम के दक्षिण दिशा में यह निर्झर है । यहाँ के एक लघु ग्राम का नाम मुन्दब्रार है । ब्रार का अर्थ देवी होती है । यह शब्द सन्ध्या का अपभ्रंश है । ग्राम अब निर्झर के निकट है । इस निर्झर के समीप ही एक छोटा और झरना सप्तर्षियों के नाम से सम्बन्धित है । किन्तु चमत्कार के कारण त्रिसन्ध्या को ही विशेष महत्त्व दिया गया है । सन्ध्या माहात्म में वर्णन मिलता है कि भद्रेश्वर वतु के पुत्र माया वतु ने सन्ध्या गंगा को अपने आश्रम देवल ग्राम के समीप लाया था । चमत्कार : यह निर्झर ज्येष्ठ तथा आषाढ मास में तीन बार दिन तथा तीन बार रात्रि में चलता है । त्रैकालिक सन्ध्या की उपमा झरने से दी गई है । निर्झर का त्रिसन्ध्या नामकरण किया गया है । अत्यन्त प्राचीन काल से यह कश्मीर का पवित्र तीर्थस्थान रहा है । इसका उल्लेख नीलमत पुराण में किया गया है । त्रिसन्ध्या माहात्म्य में उत्पत्ति उद्ग- मादि का वर्णन मिलता है । झरना वर्ष में अधिक दिनों तक सूखा रहता है । कश्मीर उपत्यका में यह एक आश्चर्यजनक चमत्कार माना जाता है । कल्हण कपटेश्वर के पश्चात् इसका वर्णन करता है ।