राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ राजतरंगिणी नन्दिक्षेत्रे हरावासप्रासादे द्युचरार्पिताः । अद्याऽपि यत्र व्यज्यन्ते पूजाचन्दनबिन्दवः ॥ ३६ ॥ ३६ हर के आवास के प्रासाद स्वरूप नन्दि क्षेत्र में देवताओं द्वारा अर्पित पूजा के चन्दन बिन्दु दिखाई पड़ते हैं। महाभारत में गंगोद्भेद तीर्थ का वर्णन मिलता विगाह्य पुष्करम् तीर्थम् अतिरात्रफलम् लभेत् । है। यह स्थान 'भेदा' देवी कश्मीर का स्थान तीर्थं सप्तर्षीणाम् च वह्निस्तोमफलम् लभेत् ॥ है या दूसरा इसपर विशेष अनुसन्धान की आवश्य- ---1343 कता है। वनपर्व में तीर्थों की महिमा का वर्णन (विशेष द्रष्टव्य 'भेदादेवी' परिशिष्ट) ऋषि पुलस्त्य ने किया है। उसमे भारत के प्रसिद्ध पाठभेद : तीर्थों के साथ गंगोद्भेद का भी उल्लेख किया है। श्लोक ३६ में 'हरावास' का 'सुरावास' पाठ भेद मिलता है। गंगोद्भेदं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । पादटिप्पणियाँ : वाजपेयमवाप्नोति ब्रह्मभूतो भवेत् सदा ॥ ३६ (१) नन्दि क्षेत्र :---इसका उल्लेख नील वनपर्व : ८४ : ३५. मत तथा हरमुकुट माहात्म्य में है। हरमुकुट माहात्म्य 'गंगोद्भेद तीर्थ में तीन रात उपवास करने में नन्दि क्षेत्र संज्ञा उस भाग को दी गयी है, जो एक वाला मनुष्य वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करता है। उत्तुंग पर्वतीय उपत्यका हरमुख शिखर के पूर्वार्ध सर्वदा के लिये ब्रह्मभूत हो जाता है।' हिमानी अर्थात् ग्लेशियर मूल में है। उसी स्थान रामतीर्थ का उल्लेख नीलमत पुराण करता है : पर कालोदक सरोवर है। उसे नन्द कुण्ड कहा जाता स्नात्वा नारायणस्थानं विष्णुलोके महीयते । है। स्थान १३ हजार फीट ऊंचाई पर स्थित है। रामतीर्थे भवेत्तप्ते च फलम् पूतम् प्रकीर्तितम् ॥ गंगासर किंवा उत्तर मानस तीर्थ यात्रा मार्ग के 1312 मुख्य पड़ाव पर है। नीलमत पुराण कालोदक का वैतरणी का उल्लेख मिलता है : वर्णन करता है। कपितीर्थं नरः स्नात्वा निर्मलो मुनिविद् भवेत् । तस्य शृङ्गस्य पूर्वार्धे सरोऽस्ति विमलोदके । वैतरण्याम् नरः स्नात्वा न दुर्गतिम् अवाप्नुयात् ॥ कालोदकमिति ख्यातम् सर्वकिल्विषनाशनम् ॥ ---1315 1048 : १२३२, १२३३ गंगोद्भेद का उल्लेख नीलमत में आता है : तत्रैव देवदेवेशः समाप्ते ब्रह्मणः क्रतौ । मणिभद्रम् तथा दृष्ट्वा धनवान् अभिजायते । सर्वैर् देवगणैः सार्धम् ययौ कालोदकम् शरः॥ पुलस्त्यनिर्मिता देवी भुवि भेदेति विश्रुता ॥ 1099 : १२९७, १२९८ ---1010 बालखिल्ये कृतेऽगस्त्ये तुल्यतेजा महर्षिभिः । गंगोद्भेदे नरः स्नात्वा भेदे देवीसमीपतः । कालोदकं नन्दिकुण्डम् शङ्खचक्रौ गदामृताथा । गंगास्नानफलम् प्राप्य स्वर्गलोके महीयते ॥ ---1243 : १४५८, १४५९ ---1309 कालोदकम् यत्र याति नदी मानससंभवा । सप्तर्षि आश्रम का भी उल्लेख नीलमत करता है : ततः स्नातस्य दृश्यन्ते सर्वपापान्यशेषतः ॥ ---1247 : १४६१