भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग ७५ एक वृद्ध गूजर से श्री स्तीन को मालूम हुआ था। कुण्ड न तो कभी जमता है और न उसका जल बढ़ता या घटता है।' स्तीन का मत है— बुदब्रार ही भेदा देवी का स्थान है। कुण्ड का नाम गंग भेद है। यह स्थान ७८०० फीट समुद्र की सतह से ऊंचा है। यहाँ की दुर्गम यात्रा से बचने के लिए एक दूसरे स्थान पर भेदा देवी की मूर्ति स्थापित कर दी गयी है। बुदब्रार से द्राव गाँव तथा पीर पंजाल दर्रा को मिलाता है। यह मार्ग बुदब्रार के दक्षिण पार्श्व से पहाड़ी पर चढ़ता है। यह आगे चलकर पीर पंजाल के मुख्य मार्ग से दुबजी के पास जाकर मिल जाता है। श्रीवरने जैन तरंगिणी में भेद वनपय का वर्णन किया है। उसमे भी स्तीन का वर्णन मिलता है। गंगोद्‌भेद माहात्म्य की कथा है। पुलस्त्य ऋषि ने सती की भूमि में लम्बी तपस्या की। उनके यज्ञ के लिये गंगा नदी हिमवंत पर्वत से चलकर यहाँ निकल पड़ीं। तपस्या के पश्चात् ऋषि पुलस्त्य जल यथावत् प्रवाहित रहने देना चाहते थे। उसी समय सरस्वती देवी की आकाशवाणी श्रवण गत हुई 'गिरि शिखर पर जिस स्थान से भेद अरण्य में जल उद्भूत हुआ है उस तीर्थ का नाम गगोद्‌भेद होगा। पर्वत के ऊपर जहाँ दश धनुष परिणाम लम्बा चौड़ा स्थान है वहाँ एक बड़ा कुण्ड शुद्ध जल का बन जायगा। पर्वत के पूर्वीय मूल भाग से एक सरिता 'अभय' निकलेगी। वह सब पापो को धोएगी। गंगा जी इसी रूप से यहाँ प्रकट होगी। इसका जल कभी समाप्त नही होगा। सरिता 'अभय' पर्वत से उछलती नहीं गिरेगी। गंगा का यह जल वर्ष के तृतीयाश काल में ही प्रवाहित रहेगा।' शेष काल में गंगा का जल स्वर्ग तथा नरक में बहता रहेगा।' पुलस्त्य ऋषि ने निवेदन किया—देवी, पर जल यहाँ वर्ष पर्यन्त बनता रहना चाहिए।' देवी ने सर्वदा जल प्रवाहित रहने का वचन दिया। एक सहस्र वर्ष और पुलस्त्य ने यहाँ तपस्या की। आकाश में राजहंस रूप से देवी सरस्वती ने दर्शन दिया। चैत्र शुक्ल अष्टमी तथा नवमी को पूजा प्राप्त कर देवी ने वहाँ अपनी ६ प्रकृतियों का वर्णन किया। प्रकृतियों के भेद वर्णन करने के कारण देवी का नाम 'भेद' दिया गया। ऋषि पुलस्त्य ने देवी सरस्वती की पूजा देवी वागेश्वरी भेद रूप से प्रारम्भ की। पूजा चैत्र शुक्ल चतुर्दशी तथा पूर्णिमा को आरम्भ की। अतएव स्थान का नाम गंगोद्‌भेद तीर्थ पड़ा। चार दिन पूजा होने लगी। 'भेद' देवी माहात्म्य का वर्णन कर माहात्म्य सहसा समीपवर्ती तीर्थ स्थानो का वर्णन करने लगता है। गोवर्धनधर विष्णु उल्लेख करता कहता है कि वहाँ पर १२५ हस्त परिणाम में कभी तुषार-पात नही होता। माहात्म्य से एक बात स्पष्ट होती है। यहाँ के प्राकृतिक दृश्य का उसने जो वर्णन किया है वह अक्षरशः मिलता है। कुण्ड का माप भी जो दिया गया है वह ठीक है। अतएव निस्सन्देह कहा जा सकता है कि श्री स्तीन ने इस स्थान को मूल गंगोद्‌भेद माना है वह ठीक है। नील मत पुराण में गंगोद्‌भेद तीर्थ का वर्णन मिलता है। तावन्मुद्देयं समं पुण्यं प्रयागेण नराधिप । गंगोद्भेदे नरः स्नात्वा भेदा देवी मर्चायते ॥ —1522 यहाँ पर यम की देवी मूर्ति जिसे ओजम कहते है ऋषियों के निमित्त स्थापित की गयी थी। इसकी पूजा आश्वयुज अर्थात् आश्विन बदी चतुर्दशी को होती है। माहात्म्य वहाँ के समीपस्थ तीर्थ रामाश्रम, रामह्रदा, सप्तर्षि आश्रम तथा वैतरणी नदी का वर्णन करता है। तात्पर्य यह है कि गंगोद्‌भेद की यात्रा के समय उनकी भी यात्रा करनी चाहिए।