भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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७४ राजतरंगिणी देवी भेदगिरेः शृङ्गे गङ्गोद्भेदशुचौ स्वयम् । सरोऽन्तर्दृश्यते यत्र हंसरूपा सरस्वती ॥ ३५ ॥ ३५ गङ्गा के स्रोत से पावन भेदगिरि पर स्थित सरोवर में देवी सरस्वती हंस रूप में दिखायी देती हैं।

सोमदेव भट्ट कथासरित्सागर में स्वयम्भू का वर्णन करता है। यह लिखता है कि कश्मीर में बहुत-से स्वयम्भू तीर्थ हैं वहाँ जाकर पूजा करना चाहिए—‘काश्मीरेषु स्वयंभूनि गत्वा क्षेत्राणि पूजयेत्।’ (१:१४५) निस्सन्देह स्वयम्भू एक प्राचीन तीर्थस्थान है। नीलमत पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। सप्तर्षीणाम् तथैवाशां शुशुम्नस्य समीपगा। शृंगवाणं च परदं च स्वयंभुवम् ॥१२७१॥ स्वायंभुवं यदिश्रं तथा वै पिंगलेश्वरम् । विन्दुनादेश्वरं देयं देयं भद्रेश्वरं तथा ॥१२९३॥ नीलमत पुराण काल में भी स्वयंभू के सम्बन्ध में अग्नि का उल्लेख किया गया है। अग्नि के कारण भूमि तप्त होती है। यह स्थान सर्वदा पवित्र कश्मीर में माना गया है। कश्मीर के राजा उच्चल ने (सन् ११०१ ई०) स्वयंभू की तीर्थ यात्रा की थी। (रा० त० ८.२५०) स्वयंभू माहात्म्य से प्रकट होता है कि देवता लोग असुरों से त्रस्त किये गये थे। उनके निवेदन करने पर भगवान् शिव ने यहाँ कालाग्नि रुद्र का रूप धारण किया था। स्वयंभू का अर्थ होता है जो स्वयं पैदा हो जाता है। स्वयंभू मनु से तथा पुराणों के वर्णित अन्य स्वयंभू देवताओ से कश्मीर के स्वयंभू को मिलाना नहीं चाहिए। (मत्स्य पुराण ४:२६, २:२७, २:३०; तथा वायु पुराण ४:४४) थे। यह विपुल उपेक्षित तीर्थ स्थान है। श्री स्टीन ने इसका पता लगाया था। कश्मीर के सामाजिक तथा धार्मिक जीवन में इस स्थान का बहुत महत्त्व रहा है। 'परिशिष्ट' में विस्तृत वर्णन इस स्थान का दिया है। श्री स्टीन ने जो कुछ वहाँ देखकर लिखा है उसमें बहुत कुछ अन्तर पड़ गया है। स्वयं इस स्थान पर बड़ी कठिनाई से पहुँच पाया था। श्री स्टीन ने लिखा है- गिरि शिखर पर लगभग २० फीट चौकोर का एक जलकुण्ड है। उसमें पत्थर की सीढ़ियाँ चारों तरफ बनी हैं। ये जीर्ण शीर्ण हो गयी हैं। कुण्ड से ६ फीट दूर पर प्राचीन प्राचीर का चिह्न मिलेगा। यह उत्तर पूर्व तथा उत्तर पश्चिम अच्छी हालत में है। (यह लोप हो चुकी है) उत्तर पूर्व की ओर एक द्वार बना है। द्वार पर उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी हैं। (यह भी लोप हो चुका है) निर्माण में लगे शिला खण्ड अलंकृत हैं। द्वार के निम्न भाग में एक जल-स्रोत है। यह कुण्ड के जल को बहाता रहता है। द्वार के समीप एक भद्रपीठ पर ३ शिवलिंग हैं। (यह भी लोप हो चुका है) इस भद्र पीठ पर मूर्तियाँ भी बनी हैं। यहाँ से सौ फीट की ऊँचाई पर एक खुला सीढ़ीनुमा मैदान है। उस पर कुछ ऊँचा डूह है। उसपर प्राचीन काल की कुछ लाल ईंटें बची पड़ी हैं। (मैंने केवल चार ईंटें वहाँ देखीं)। दीवाल का चिह्न ८० वर्ग गज में दिखाई देगा। श्री स्टीन को यहाँ के गूजरों से मालूम हुआ था। 'आज से १५० वर्ष पूर्व यहाँ ब्राह्मण लोग आते थे। वाव में स्नान कर श्राद्ध करते थे। वे अब वहाँ श्राद्ध करने नहीं आते।'

पादटिप्पणियाँ : ३५ (१) भेद समाहर्ते—गङ्गोद्भेद तीर्थ : इस अत्यन्त प्राचीन स्थान को लोग भूल गये