भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 167

८६ राजतरंगिणी


के साथ करने की बात लिखी गयी है। इस समय चक्रधर तथा गम्भीर संगम के अतिरिक्त और किसी तीर्थ स्थान का पता नहीं लगता। नये पुल के समीप एक नवीन मन्दिर का निर्माण किया गया है। मैं जिस समय यहाँ आया था, पानी बरस रहा था। मैं कीचड़ों से गुजरता एक मन्दिर में पहुँचा। इस मन्दिर में एकादश लिंग एक ही अरघा में स्थापित किये गये हैं। प्रवेश द्वार के दोनों पाश्र्वों में किसी पुराने मन्दिर की खण्डित मूर्तियों के पत्थर लगे हैं। यहाँ के प्राचीन मन्दिर के कलश का आमलक मन्दिर के वाम पाश्र्व में भूमि पर पड़ा था। इस पत्थर को लड़के तथा लोग कौतूहल से देखते हैं। यदि ग्यारह व्यक्ति उँगली लगाकर उठायें तो वह उठ जाता है। एक आदमी यदि पूरा जोर लगाये तो भी।दोनो हाथो से नही उठता। मैंने वहाँ खड़े बालको को बुलाया। उन्हें मिलाकर ग्यारह की संख्या पूरी हो गयी तो उँगली लगाया। बच्चे क-क-क कहने लगे और पत्थर उठ गया। मन्दिर में ग्यारह शिवलिंग हैं। अतएव ग्यारह व्यक्ति के उँगली लगाने की बात शिवलिंग से सम्बन्धित कर दी गयी है। पुराने पुल के समीप एक दूसरा मन्दिर नगर में है। नवीन निर्माण है। इसके साथ एक धर्मशाला बनायी गयी है। 'विजयेश्वर सुधार कमेटी' विजयेश्वर तीर्थों के सुधार तथा उन्नति निमित्त गठित की गई है। इस कमेटी के कार्यकर्त्ताओं से बातचीत हुई थी। यहाँ के हिन्दू मुसलमान दोनों से बातें कीं। मालूम हुआ कि नगर पूर्वकाल में मन्दिरों से भरा था। किन्तु कालान्तर में वे नष्ट हो गये। नगर में ऊँचे नीचे बहुत स्थान मिलेंगे। इनके होने का एक यह भी कारण हो सकता है कि मन्दिरों के अधिष्ठान ऊँचे बनाये जाते थे। उनके आसपास की भूमि समतल कर दी जाती थी। मन्दिरों के नष्ट होने पर उनके स्थान पर दूसरी इमारतें बन गयीं अथवा मन्दिर के मलबों को पाटकर उन पर रहने आदि के स्थान बना लिये गये। अतएव मकान प्रायः ऊँची नीची भूमि पर बने मिलेंगे। समभूमि नगर में कठिनता से मिलेगी। नगर के बाहर चारों ओर समभूमि है। विजयेश्वर मन्दिर के ध्वंसावशेष की खोज में लग गया। नगर में घूमता हुआ बाबा साहब की जियारत में पहुँचा। यह बड़ा भारी घेरा है। कब्रि- स्तान घेरा के बाहर और भीतर दोनों जगहों पर है। जियारत के लगभग दो-तिहाई स्थान पर बड़ी-बड़ी कब्रें बनी हैं। शेष में छोटी छोटी कब्रें हैं। जियारत चौकोर है। इस जियारत में एक मसजिद है। जियारत तथा मसजिद के पत्थर मन्दिरों के ध्वंसा- वशेष हैं। जियारत की परिक्रमा करते चला जियारत के दाहिनी तरफ मुझे मन्दिर का विशाल आमलक तथा कलश एक ओर लुढ़का मिला। मन्दिरों के अलंकृत पत्थर बहुत दिखाई पड़े। मन्दिरों के शिखर पर कलश लगाने की प्रथा बौद्धों की अपेक्षा हिन्दू मन्दिरों में अधिक थी। यह विज- येश्वर किंवा अशोकेश्वर दो में से एक का मन्दिर होना चाहिए। किसका था कहना कठिन है। यहाँ पत्थर के सुन्दर खम्बे गोले चौपहले पड़े मिले। स्तम्भ का अधिष्ठान जियारत तथा बाहर दोनों जगहों पर लगा दिखाई पड़ेगा। कुछ कब्रों के पत्थर मन्दिर के अधिष्ठान के शिलाखण्ड के थे। अतएव यह निश्चय है कि वह स्थान प्राचीन मन्दिर था। रतन हाजी की मसजिद के बाहर भद्रपीठ का बड़ा शिला खण्ड पड़ा मिला। मसजिद के अन्दर स्तम्भ लगे हैं। मसजिद के आस-पास प्राचीन पत्थरों के टुकड़े बिखरे पड़े थे। विजयेश्वर की इस समय काफी उन्नति हो रही है। प्राचीन विजयेश्वर नगर से आबादी उठकर श्रीनगर-बनिहाल सड़क पर आकर आबाद हो रही है। मैं नगर में घूम रहा था। पानी बरस चुका था। कुछ झींसी पड़ रही थी। नव निर्मित मन्दिर का द्वार बन्द था। स्वयं सिकड़ी खोलकर अन्दर गया। यहाँ चारों ओर मुसलिम आबादी है। एक मुसलमान सज्जन ने यहाँ के पुजारी को बुला दिया।