राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ८७ विजयेते पुण्यबलैर्बलैर्नैतु न शस्त्रिणाम्। परलोकात् ततो भीतिर्यस्मिन् निवसतं परम् ॥ ३९ ॥ ३९. उसपर पुण्य बल द्वारा ही विजय प्राप्त किया जा सकता है। अतएव वहां के निवासी केवल परलोक से भयभीत रहते हैं न कि शस्त्रधारियों से।
मन्दिर के आगन के एक तरफ गीता अध्ययन के लिए स्थान बना है। जिस समय मै गलियों में घूम रहा था तो खिड़कियों से औरतें तथा बच्चे कौतूहल पूर्वक झांक कर मुझे देखते थे। मै धोती, चट्टी, तथा कुरता पहने था। मै टोपी नहीं लगाता। कश्मीर के हिन्दू धोती नही पहनते ? धोती पहनना अपवाद माना जायेगा। सर पर टोपी अथवा पगड़ी अवश्य होगी । मैं एक कौतूहल की सामग्री था। मुझे स्मरण होकर रोमाच हो जाता था। यहाँ के लोग कभी हिन्दू थे। हमारे जैसे धोती पहनते थे। उनके लिए धोती आज कौतूहल की वस्तु बन गई है। भरद्ोम ग्राम प्राचीन मदयाधम के समीप विसाड तथा रामन्यार नदियों के संगम पर है। यह संगम वितस्ता संगम के कुछ ऊपर है। दोनो की मिली धारा को गम्भीर नदी कहते हैं। संगम स्थान को गम्भीर संगम कहा जाता है। गम्भीर नदी बहुत गहरी है। विजयेश्वर तथा श्रीनगर मार्ग पर होने के कारण इसका सैनिक महत्त्व है। एक गम्भीर नदी और है। वह राजस्थान में चित्तोर दुर्ग के समीप बहती है। उसे लौकिक भाषा मे गम्भीरा नदी कहते हैं। (३) आदि केशव : आदि केशव का स्थान कश्मीर में कहाँ था कहना कठिन है। मैंने पता लगाने का प्रयास किया। कुछ स्थान बताये गये परन्तु वे ऐतिहासिक तुला पर ठीक उतरे नहीं। विष्णु के रूप केशव हैं। केशव के अनेक नाम तथा रूप हैं। आदि शब्द प्रारम्भ मे जोडने से मूल केशव का अर्थ वराह मूल किंवा मूल वराह की तरह प्रकट होता है। केशव के और भी मन्दिर कश्मीर में थे। अतएव सबसे प्राचीन केशव के मन्दिर अथवा मूर्ति का नाम आदि केशव रख दिया गया होगा। आदिशब्द देवताओं तथा पुस्तको में लगा देने से उनके मौलिक रूप की ओर संकेत हो जाता है । काशी में आदि विश्वेश्वर तथा आदि केशव के मन्दिर हैं। आदि विश्वेश्वर उस स्थान को कहते हैं जहाँ प्रथम विश्वनाथ जी का मन्दिर अलप्तगीन के समय में तोड़ा गया था। काशी में मुस्लिम राज्य समाप्त होने पर पार्श्व में एक मन्दिर बना दिया गया। वाराणसी प्राचीन काल में वरुणा गंगा के संगम से प्रारम्भ होकर अस्सो गंगा के संगम पर समाप्त होती थी । वरुणा गंगा के संगम पर आदि केशव का मन्दिर है। यही वाराणसी का आदि किंवा प्रारम्भ है। काशी में केशव तथा विश्वेश्वर के अनेक मन्दिर हैं। परन्तु आदि शब्द से यही प्रतीत होता है कि सबसे प्राचीन मन्दिर को आदि का विशेषण दे दिया गया। यही बात काश्मीर मण्डल के साथ भी हुई होगी। (४) ईशान : यह शब्द रुद्र किंवा शिव के लिये आता है। पारस्करगृह्यसूत्र (३: १३: ४) में समिति के सभापति के लिये इस शब्द का व्यवहार किया गया है—'अस्या . पर्षदः ईशान :-। अमर कोष (१: १२-३६) कार ने शिव के अड़तालीस नामों में 'ईशान' भी एक नाम दिया है। ईशान सन्धि-मति के गुरु थे। उनकी स्मृति में ईशेश्वर नामक एक मन्दिर निर्मित किया गया था। ईशेश्वर तथा दशावर स्थान को ईशान स्थान से मिलाना गलत होगा। विशेष प्रकाश रा० २: १३४ श्लोक में डाला गया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३९ में 'पुण्य' का पाठभेद 'मूल्य' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : इस श्लोक द्वारा कल्हण कश्मीरियो की वीरता