राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ९५ शतेषु षट्सु सार्धेषु त्र्यधिकेषु च भूतले । कलेर्गतेषु वर्षाणामभूवन् कुरुपाण्डवाः ॥ ५१ ॥ ५१. कलियुग के छः सौ तिरपन वर्ष व्यतीत हो गये तो इस भूतल पर कौरव एवं पाण्डव हुए थे । पद्ममिहिर ने अशोक के पूर्व कालीन ५२ राजाओं तथा लव के पश्चात् ८ राजाओं का और वर्णन किया है। पद्म मिहिर ने इन आठो नामों को हेलाराज की पुरानी पुस्तक 'पार्थिवावली' से लिया था । इतिहासकार छविल्लकार ने बावन राजाओं में अशोक से अभिमन्यु तक के पाँच राजाओ का और वर्णन किया है। इस लेखक के विषय में विशेष जानकारी नहीं है। अशोक, जलोक, दामोदर, हुष्क, जुष्क, कनिष्क का वर्णन कल्हण ने इसी कवि के आधार पर राजतरंगिणी में किया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ५१ में 'मभूवन्' का पाठभेद 'मभवन्' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ५१. क्षेमेंद्र के लगभग एक शताब्दी पश्चात् अर्थात् सन् ११४८-११४९ ई० में कवि कल्हण ने राजतरंगिणी की रचना की थी। कल्हण के लगभग ३०० वर्ष पश्चात् जोनराज ने (सन् १४७१-१४७२ ई०) में मुसलिम शासन-काल में राजतरंगिणी लिखी । श्रीवर ने जैन राजतरंगिणी सन् १४८६ ई० में कश्मीर के बादशाह जैनुल आबदीन के समय में लिखी थी। प्रज्ञाभट्ट ने सन् १५१२ ई० में राजावलो पटक लिखा। कश्मीर के संस्कृत इतिहासकारों में शुक ने अपनी राजतरंगिणी सन् १५९६ ई० में लिखी थी। वह प्राचीन शैली का अन्तिम लेखक था। उसके पश्चात् किसी प्रसिद्ध किंवा अप्रसिद्ध इतिहासकार का पता नहीं चलता। जिसकी लेखनी वैज्ञानिक ढंग से कश्मीर का वास्तविक इतिहास लिखती। इसके पश्चात् मुसलिम इतिहास लेखकों का काल आता है। वे प्राचीन भारतीय शैली परम्परा तथा संस्कृत ज्ञान से अनभिज्ञ थे। अतएव उनका लेखन भ्रामक हो गया है। सुलतान सिकन्दर बुतशिकन (१३६३-१४१६ ई०) के समय में प्रायः सभी प्राचीन तथा हिन्दू धर्म सम्बन्धी ग्रन्थ जलवा दिये गये। शेष को जल समाधि दे दी गयी। अथवा किसी प्रकार नष्ट कर दिये गये । सुलतान जैनुल आबदीन ने १५ राज- तरंगिणियों का पता लगाया था। परन्तु आज वे प्राप्त नहीं हैं। उनके नाम का पता अभी तक नहीं चल सका है। यदि वे मिल जांय तो कश्मीर के इतिहास पर कुछ और प्रकाश पड़ सकता है। कल्हण ने लौकिक संवत् ४२२४ तदनुसार सन् ११४८-११४९ ई० में राजतरंगिणी लिखी। सन् १३३६ ई० में कोटा रानी के पश्चात् मुसलिम शासक कश्मीर में हुए। मुसलिम अधिकार में कश्मीर रणजीत सिंह के समय तक रहा। सिकन्दर बुतशिकन (सन् १३८९-१४१६ ई०) का समय कश्मीर के इतिहास का भयंकर काल था। सभी मन्दिर नष्ट कर दिये गये। पुस्तकें फूंक दी गयीं। केवल ११ ब्राह्मण घरों के अतिरिक्त सभी मुसलमान हो गये थे। कुछ भी इतिहास सामग्री शेष नहीं रह गयी। जैनुल आबदीन बादशाह (सन् १४२०-७० ई०) के समय जोनराज ने (१४७१-१४७२ ई०) राजतरं- गिणी लिखना प्रारम्भ किया। कल्हण की मृत्यु के ३२१ वर्ष पश्चात् पुनः राजतरंगिणी की श्रृंखला जोड़ी गई। उसने सन् प्रायः ११५० से जैनुल आवदीन के काल तक का इतिहास लिखा। जैनुल आवदीन के जीवन काल