भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 177

२६ राजतरंगिणी लौकिकेऽब्दे चतुर्विंशे शककालस्य सांप्रतम् । सप्तत्याऽभ्यधिकं यातं सहस्रं परिवत्सराः ॥ ५२ ॥ ५२. लौकिक संवत् का चौबीसवां वर्ष है; इस प्रकार संवत् के एक हजार सत्तर वर्ष अब तक व्यतीत हो चुके हैं।

श्रीवर ने तृतीय राजतरंगिणी लिखी। इसमें जैनुल आवदीन से मुहम्मद शाह ( सन् १४८४ ई० ) तक का वर्णन मिलेगा । उसने अपनी आंखो देखा वर्णन किया है। श्रीवर के पश्चात् श्री प्रजाभट्ट ने राजा- वली पिटक लिखा। उसने सन् १४८५ से सन् १५१३ ई० अर्थात् लौकिक संवत् ६१ से ८६ तक अर्थात् २८ वर्ष का मुहम्मद शाह ( सन् १४८४- १४८६ ) तथा फतह शाह (सन् १४८६-१५१४ ई०) का इतिहास दिया है। तत्कालीन अराजकता से ऊबकर प्रजाभट्ट ने आगे नही लिखा। प्रजाभट्ट ने जहाँ तक लिखा था उसके पश्चात् बुध्यात्मज के पुत्र शुक ने मुगल शासन काल तक का इतिहास लिखा है। इसी को चौथी राजतरंगिणी की संज्ञा दी गयी है। उसने फतह शाह ( सन् १४८६-१५१४ ई० ) के समय से लेकर मोमरा खाँ (सन् १५७८-१५८६) तक अर्थात् किस प्रकार जलालुद्दीन अकबर ने कश्मीर को अपने राज्य मे मिलाया। लगभग १०० वर्षों की घटनाओ का वर्णन किया है। शुक ने अपनी राजतरंगिणी में मंगलाचरण के पश्चात् कल्हण के प्रायरुथन की शैली अपनाया है। उसने अपने पूर्व के इतिहासकारों का वर्णन किया है। भारतीय संस्कृत साहित्य तथा कश्मीर का यह अन्तिम इतिहास ग्रन्थ है। चारो राजतरंगिणियो की विशेषता यह है कि निष्पक्ष रूप से विचारो को व्यक्त किया गया है। इसके पश्चात् मुमलिम इतिहासकारो का उदय होता है। सबका आधार राजतरंगिणी है। परन्तु उसे तोड़-मरोड़ कर रखने का प्रयास किया गया है। साधिकारिक कश्मीर के इतिहास का वर्णन पुनः अकबर के राज्यकाल में मिलता है। अकबर के नवरत्न तथा मन्त्री अबुल फजल ने आइने अकबरी मे 'सूबा कश्मीर' पर एक अध्याय लिखा है। उसमें कश्मीर के हिन्दू राजाओं और मुगलों तक हुए मुस्लिम राजाओ की तालिका दी गयी है। उनका संक्षिप्त वर्णन लिखा गया है। कश्मीर की तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था, रीति-रिवाज, तौल, बाट, शासन और दर्शनीय स्थानों का वर्णन निष्पक्ष भाव से किया गया है। आज तक लिखे इतिहासों का मूल साधिकारिक स्रोत, उक्त ग्रन्थ है। अतएव मैंने भी उनका ही आश्रय लिया है। मध्यकालीन तथा कुछ आधुनिक लेखको ने जिस तरह कश्मीर के इतिहास को तोड़-मरोड कर उसे दूसरे रंग मे डालने का प्रयास किया है। उसका मैने उदाहरण देकर आलोचना की है। सर्व साधारण में उनके लेखों के कारण भ्रम उत्पन्न हो गया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ५२ में 'त्याभ्यधि' का पाठभेद 'त्याह्यधि' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ५२ (१) लौकिक संवत् : कश्मीरी संवत् को लौकिक किंवा सप्तर्षि संवत् कहते हैं। अल्बेरुनी ने अपने पर्यटन वर्णन में काश्मीरी संवत् का उल्लेख किया है। कश्मीर में शताब्दी छोड़कर लिखने की प्रथा है। अतएव शताब्दी न देकर केवल चौबीस का उल्लेख कल्हण ने किया है। सन् ईसवी लिखते समय आज भी प्रथा है कि १९६८ न लिखकर केवल ६८ लिखा जाता है। अतएव लौकिक वर्ष २४ का अर्थ है २४२४ लौकिक वर्ष। वह जिस समय राजतरं- गिणी लिख रहा था उसका लौकिक संवत् देता है। इस प्रकार उसका राजतरंगिणी का रचना काल साधिकारिक रूप से प्रकट हो जाता है।