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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

प्रथम तरंग ९७ प्रायस्तृतीयगोनन्दादारभ्य शरदां तदा । द्वे सहस्रे गते त्रिंशदधिकं च शतत्रयम् ॥ ५३॥ ५३. प्रायः१ गोनन्द तृतीय के राज्याभिषेक से अबतक २३३० वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। वर्षाणां द्वादशशती षष्टिः षड्भिश्च संयुक्ता । भूभुजां कालसंख्यायां तद्द्वापञ्चाशतो मता ॥ ५४ ॥ ५४. उन बावन लुप्त राजाओं का राज्य काल ऐसा मत है कि १२६६ वर्ष होता है। ऋक्षादृक्षं शतेनाब्दैर्यात्सु चित्रशिखण्डिषु । तच्चारे संहिताकारैरेवं दत्तोऽत्र निर्णयः ॥ ५५ ॥ ५५. सप्तर्षि एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र पर एक सौ वर्षों में जाते हैं। इस प्रकार की गति के कारण संहिताकार ने इस समस्या के निराकरण निमित्त हल निकाल दिया है।

कलि संवत् पच्चीस चैत्र सुदी एक को ईसापूर्व ३०७५-७६ होता है। शक संवत् सन् ईस्वी से ७८ वर्ष पश्चात् आरम्भ होता है। कल्हण ने राज- तरंगिणी की रचना शक संवत् १०७० में प्रारम्भ की थी । यह काल लौकिक संवत् का ४२२४ वाँ वर्ष होता है। यह कश्मीरी संवत् अबतक कश्मीर तथा उसके आस पास पर्वतीय क्षेत्र में चलता है। लौकिक संवत् २५ कलि संवत् से आरम्भ होता है। शक संवत् का प्रारम्भ ३१५४ वर्ष में होता है। कल्हण के और शक संवत् के समय में १०७० वर्ष का अन्तर होता है। इस प्रकार ३१५४ + १०७० वर्ष मिलकर ४२२४ वर्ष हो जाते हैं।

पाठभेद : श्लोक संख्या ५३ में 'गोनन्दादा' का पाठभेद, 'गोनर्दादा' मिलता है ।

पादटिप्पणियाँ : ५३ (१) प्राय — प्रायः शब्द का प्रयोग कल्हण ने किया है। वह निश्चित रूप से समय निर्धारित नही कर सका है। उसके समय जो कुछ सामग्री प्राप्त थी उसी पर उसने मोटे तौर पर हिसाब लगाया था ।

श्लोक संख्या ४८ में दिया गया वर्ष काल २२६८ वर्ष है। कल्हण के दिये 'राजत्व के वर्ष कालों का योग तरंग दो से आठ तक का १३२८ वर्ष मोटे तौर पर होता है। इस २२६८ वर्ष मे तरंग एक के राजाओं का १२६६ वर्ष दिया काल श्लोक सं० ५४ का घटा दें तो १००२ वर्ष आता है। यह काल गोनन्द तृतीय से युधिष्ठिर प्रथम का राजत्व काल होता है। यदि वर्ष काल १३२८ + १००२ का योग कर दिया जाय तो २३३० वर्ष काल आता है। यही काल गोनन्द तृतीय से कल्हण तक का राज्य काल होगा ।

५४ (१) मत : कल्हण ने मत शब्द का यहाँ प्रयोग किया है। उसने काल गणना स्वयं की थी । तत्कालीन प्राप्त सामग्रियों के आधार पर वह एक निश्चित 'मत' पर पहुँचा होगा । अतएव इस श्लोक में उसने अपना मत प्रकट किया है। किसी प्राचीन काल गणना के आधार पर निश्चयात्मक बात नहीं कहा है। मत में विभिन्नता हो सकती है। कोई मत नही मान सकता । अथवा भविष्य में यह मत गलत हो सकता है। किन्तु एक बात निश्चयात्मक रूप से कह देने से वह प्रमाण मान लिया जाता है। कल्हण स्पष्ट संकेत करता है कि यह काल गणना स्वतः प्रमाण नहीं किन्तु मत मात्र है ।

पाठभेद : श्लोक सख्या ५५ में 'तच्चारे' का पाठभेद 'उच्चारे' मिलता है ।

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