भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

९८ राजतरंगिणी आसन्मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ । षड्द्विकपञ्चद्वियुतः शककालस्तस्य राज्यस्य ॥ ५६ ॥ ५६. जिस समय राजा युधिष्ठिर पृथ्वी पर शासन कर रहे थे उस समय मुनि१ मघा२ पर थे । युधिष्ठिर३ का राज्य काल शक संवत् से २५२६ वर्ष पूर्व था । पादटिप्पणियाँ : ५५ (१) संहिता : यहाँ पर संहिताकार से तात्पर्य बृहत्संहिताकार से है । कल्हण यहाँ बृहत् संहिता का ( १२ : ३ ) उल्लेख करता है । कल्हण ने उक्त श्लोक संख्या ५१ मे जिस मत का प्रतिपादन किया है। उसके प्रमाण में बृहत् सहिता का उल्लेख करता है। इस प्रकार कुरु पाण्डव और गोनन्द प्रथम का काल शक संवत् से २५२६ वर्ष पूर्व है। यह समय कलि संवत् ६५३ होता है । ५६ (१) मुनि का अर्थ यहाँ सप्तर्षि से है । (२) मघा से तात्पर्य मघा नक्षत्र से है । (३) युधिष्ठिर : युधिष्ठिर के राज्याभिषेक का समय कल्हण प्रथम गोनन्द का प्रथम वर्ष राजत्व काल देता है। यही समय उसने अपनी काल गणना के लिये आधार माना है । राजतरंगिणी श्लोक १८४ मे कल्हण गोनन्द प्रथम का पौत्र गोनन्द द्वितीय को कहता है । कल्हण गोनन्द द्वितीय को महाभारत काल का सम- कालीन मानता है । इसमे कोई विरोध नही मालूम होता। युधिष्ठिर के अभिषेक तथा महाभारत युद्ध काल के आरम्भ मे वर्षों का अन्तर है। इस मध्य- वर्ती काल मे एक राजा का घोर हो जाना कोई असम्भव नही बात मालूम पडती । महाराज युधिष्ठिर के काल निर्णय के सम्बन्ध में विभिन्न मत हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धव से श्रीमद्भागवत (एकादश स्कन्ध) मे कहा है कि उनकी मृत्यु के पश्चात् कलियुग का प्रवेश होगा। कल्हण कहता है कि मघा नक्षत्र पर जब सप्तर्षि थे । उस समय युधिष्ठिर राज्य कर रहे थे । श्री- मद्भागवत के बारहवें स्कन्ध के द्वितीय भाग में उल्लेख है कि जब सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर होंगे तब कलियुग का प्रवेश होगा। जिस दिन भगवान् श्रीकृष्ण का स्वर्गारोहण होगा उसी दिन कलियुग का आरम्भ होगा। कल्हण वराहमिहिर की तिथि मानता है। युधिष्ठिर शक संवत् से २५२६ वर्ष पूर्व हुए थे। अर्थात् कलि सवत् ६५३ था । दूसरे वह मानते हैं कि गोनन्द कलियुग के आरम्भ मे हुआ था। इस मत के मानने वाले कहते हैं कि महा- भारत द्वापर के अन्त में हुआ था । कल्हण और नीलमत पुराण दोनों गोनन्द से काश्मीर का इतिहास प्रारम्भ करते हैं। कलि संवत् का आरम्भ ३१०१ वर्ष ई० पू० से माना जाता है। यहोल के जैन शिलालेख से प्रकट होता है कि यहोल मन्दिर का निर्माण राजा पुलकेशिन द्वितीय चालुक्य वंशीय ने महाभारत के ३७३५ वर्ष पश्चात् अर्थात् वर्तमान प्रचलित शक संवत् ५५६ में कराया था । इस प्रकार स्पष्ट होता है कि इस समय के प्रचलित शक सवत् के ३१९७ वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ था । आइने अकबरी मे अबुलफजल लिखता है कि विक्रमादित्य से ३०४४ वर्ष पूर्व युधिष्ठिर राजा हुए थे । राजतरंगिणी के प्रथम तरंग के श्लोक ४४ तथा ४९ से प्रकट होता है कि महाभारत द्वापर के अन्त में हुआ था । मिताक्षरा की भूमिका में श्री बापूदेव शास्त्री लिखते हैं कि कलियुग की प्रथम शताब्दी में परीक्षित् का जन्म हुआ था। राजा