राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ९९ कश्मीरेन्द्रः स गोनन्दो वेल्लद्गङ्गादुकूलया । दिशा कैलासहासिन्या प्रतापी पर्युपास्यत ॥ ५७ ॥ ५७. वह दिशा १ जिसका तुषार मण्डित जाज्वल्यमान कैलास हास था, जिसका दुकूल कल्लोलिनी गंगा थी २, प्रतापी काश्मीरेन्द्र गोनन्द ३ की उपासना करती थी । जनमेजय के समय कलियुग के १२५ वर्ष व्यतीत हो चुके थे । श्री तारानाथ तर्कवाचस्पति का मत है कि कलियुग के ८० वर्ष बीतने पर राजा परीक्षित का जन्म हुआ था । ज्योतिष ग्रंथ खंड-खाद्य के रचनाकार ब्रह्मगुप्त थे । ( शक ५२० संवत् ) उसने प्राचीन ज्योतिष आर्यभट के आधार पर गणना की है कि विक्रमा- दित्य के समय कलि के ३०४४ वर्ष व्यतीत हो चुके थे । निर्णय सिन्धु से मालूम होता है कि शक संवत् में यदि ३१७९ वर्ष और जोड़ दिया जाय तो कलि- युग का आरम्भ तथा युधिष्ठिर के राज्यकाल का ज्ञान हो जायगा । नीलमत पुराण में गोनन्द का उल्लेख आता है । कल्हण ने गोनन्द सम्बन्धी सामग्री नीलमत से ली होगी । वहाँ नीलमत का कुछ श्लोक उद्धृत करना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित होगा । इममर्थं पुरा जातु गोनन्दाख्यो नृपोत्तमः । तीर्थयात्राप्रसंगेन बृहदश्वमुपागतम् ॥ २८ : ४८ गोनन्द उवाच : मन्वन्तरेषु पूर्वेषु नासीद्देशमिमं किल । काश्मीराख्यं बभूवास्मिन्कथं वैवस्वतेऽन्तरे ॥ २९ : ५० एवमुक्त्वा स गोनन्दो बृहदश्वेन भूभुजा । ३७२ : १५८ एवमुक्तोऽपि गोनन्दो बृहदश्वेन भूमिप । प्रावर्तयत् समुच्छिन्नानाचारान् कालदोषतः ॥ ८७५ : १०४६ काश्मीरकस्तु गोनन्दो बृहदश्वेन भाषितम् । श्रुत्वा स्वकीयम् आचारम् किमपृच्छदतः परम् ॥ ७७८ : १०४९ वैशम्पायन : काश्मीरकस्तु गोनन्दो बृहदश्वेन भाषितम् । श्रुत्वोवाच मुनिश्रेष्ठं बृहदश्वं नराधिपः ॥ ८७९ : १०४९ वैशम्पायन उवाच : एवमुक्त्वा स गोनन्दं बृहदश्वो नराधिपम् । धर्मात्मा तीर्थयात्रार्थं जगामाभीप्सितां गतिम् ॥ १३६६ : १५८२ बहु मेने तथात्मानम् गोनन्दः समरप्रियः । स प्रशास वसुधां राजा धर्मानुसारतः ॥ १३७९ : १५८३ गोनर्द और गोनन्द दो भिन्न नाम है । गोनर्द एक प्रदेश का नाम है । हेमचन्द्र ने गोनर्द को योग- सूत्र तथा महाभाष्य के रचयिता पतञ्जलि मुनि का निवास स्थान माना है । गोनर्द उत्तर प्रदेश के गोण्डा जिला का प्राचीन नाम है । गोनर्द व्यक्ति विशेष का नाम भी हो सकता है । पाठभेद : 'कश्मारेन्द्रा' का 'काश्मीरेन्द्रः'; 'नन्दा' का नदों' तथा 'दुकूलया' का 'दुगूलया' पाठभेद मिलता है । टिप्पणियाँ : ५७ (१) दिशा : यहाँ दिशा का अर्थ उत्तर दिशा होगा । कैलास तथा गंगा दोनो उत्तर दिशा मे हैं । कश्मीर स्वतः उत्तर दिशा में हैं । कश्मीर की सीमा का भी वर्णन परोक्ष रूप से कल्हण ने किया है।