भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 984 में से

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पृष्ठ 181

१०० राजतरंगिणी विहाय देहं शेषाहेर्र्विषाश्लेषभयादिव । भूर्गारुत्मतरत्नाङ्के भेजे तस्य भुजे स्थितिम् ॥ ५८ ॥ ५८. पृथ्वी शेषनाग के विष के भयभीत होकर शेष नाग के शरीर का त्याग कर गरुड़ के पवित्र रत्नों द्वारा आभूषित राजा की भुजाओं का आश्रय थी।

काश्मीर के उत्तर पूर्व निस्सन्देह कैलास है। गंगा काश्मीरो सिन्धु नदी को गंगा तथा वितस्ता का पूर्व में पडती है। वह कश्मीर की कभी सीमा यमुना कहा गया है। नीलमत पुराण का उल्लेख नहीं हो सकती। किन्तु कश्मीर में गंगा से अभि- यहाँ संगत होगा। प्राय सिन्धु नदी से भी लिया जाता रहा है। नील- गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता यमुना तथा।' मत पुराण के पद- 'गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता —294 : २९७-२१८ यमुना तथा' से प्रतीत होता है कि यहाँ उस सिन्धु ५७ (३) गोनन्द : गोनन्द काल से सीमा का से तात्पर्य है जो दरस उपत्यका से प्रवाहित होती अनुमान किया जा सकता है। नीलमत पुराण में इस काश्मीरी प्रयाग के समीप वितस्ता में आकर मिलती काल का उल्लेख है : है। जोनराज भी सिन्धु से मनसबल सरोवर कुरुपाण्डववेलायां भूमिर्भगवता स्वयम् । में नहर लाने की बात का उल्लेख करता है। प्राचीन पाचित्वाभूरितिसुतानवतीर्णान् जघान यत् ॥ लेखकों ने सिन्धु का उद्गम गंगा झील अर्थात् गंगबल 10 : १० के उत्तर पूर्व हरमुख शिखर के हिमानी को माना तस्मिन् कालेऽथ सम्भूतू राजा विशदकीर्तिमान् । है। कश्मीर में अनेक जल स्रोतों को गंगा नाम काश्मीरान् पालयन् सौम्य गोनन्द इति संज्ञया ॥ दिया गया है। यहाँ दुकूल अर्थात् सूक्ष्म वस्त्र से 11 : ११ अर्थ इसी नदी से लगाना चाहिए। मैं जोजिला युधिष्ठिर तथा अर्जुन के नामो का उल्लेख मुझे पास से श्रीनगर लौट रहा था। मार्ग में सडक नीलमत में नहीं मिला। कश्मीर के प्रसिद्ध नागों सिन्धु के तट से जाती है। मुझे कल्हण का यह में युधिष्ठिर तथा अर्जुन का नाम आता है। महा- श्लोक याद था। सिन्धु का जल पाषाण शिलाओं से भारत के राजा तथा उसके पात्र के रूप में वर्णन टकराता उछलता इस प्रकार चलता है कि मालूम नही मिलता। पडता है उज्ज्वल महीन दुकूल हवा में भर कर उड़ने हवोत्सवः शठः शाक्यः शत्रुघ्नो रामलक्ष्मणौ । की कोशिश कर रहा है। यह मत मान्य नहीं किया महादेवः कामपालो गोशिराः सयुधिष्ठिरः ॥ जा सकता कि इस श्लोक द्वारा कश्मीर मण्डल की 913 : १०७९ : १०८० सीमा गोनन्द के समय कैलास तथा वर्तमान गंगा पानीयइचाप्यनीकश्च कनकाख्यः कलिककः । नदी अर्थात् उत्तर प्रदेश तक थी। अर्जुनः पौण्डरीकश्च धनदो नदकूबरः ॥ 886 : १०५६ (२) गंगा- काश्मीरी साहित्य में सिन्धु को पाठभेद : गंगा अर्थात् उत्तर गंगा नाम से सम्बोधित किया श्लोक स० ५८ में 'देहम्' का 'दिशम्'; 'विषाश्ले' गया है। यह हरमुख शिखर के ईशान कोणीय को 'दोर्विषाश्ले' तथा 'रत्नाङ्के' का 'रत्नाङ्के' हिमानी अर्थात् ग्लेशियर के अधोभाग में है। सिन्धु पाठभेद मिलता है। नदी द्रस उपत्यका तथा हरमुख पर्वत के उत्तरी पर्व- तीय क्षेत्रों के जल को ग्रहण करती है। वितस्ता की सिन्धु सबसे बड़ी शाखा नदी है।

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