भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[Page Header] प्रथम तरंग १०१

[Verse 59] साहायकार्थमाहूतो जरासन्धेन बन्धुना । स संरुरोध कंसारेर्मथुरां पृथुभिर्बलैः ॥ ५९ ॥

[Hindi Translation] ५९. अपने बन्धु जरासन्ध १ के सहायतार्थ आवाहन पर राजा गोनन्द ने २ कंस के शत्रुओं को मथुरा नगर में अपनी सेना से घेर लिया ।


[Left Column] पादटिप्पणियाँ : ५८ गरुडप्रियरत्न : गरुड का प्रिय रत्न मरकत किंवा हरिमणि । यहाँ कल्हण अत्यन्त सुन्दर रूपक खींचा है । इससे ज्ञात होता है । कल्हण ने शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन किया था । रत्नका गुण उसकी चमक किंवा ज्योति है । रत्न गरुड़ का आभूषण है । नाग तम हैं । उनका अति भयंकर विषैला रूप काला है । तम का रंग काला होता है । ज्योति एवं तम का संघर्ष विश्व का मूल है । गरुड़ तथा सर्पों किंवा नागों के परम्परा गत संघर्ष का यही आधार है । इसकी लाक्षणिक मूर्तियाँ कुषाण काल की मथुरा संग्रहालय में संग्रहीत है । गरुड का रूप विग्रह है । पुरुष एवं पत्नी का मिश्रित आकार नरसिंह के समान है । विष्णु के वाहन है । पक्षियों के राजा है । गरुड़ का मुख्य लक्षण गति है । यह गति छंद युक्त कही गयी है । भागवत में छंदोमय गरुड़ कहा गया है । बिना दो पंखों के गति नहीं होती । इसी प्रकार बिना दो पदों के छंद नहीं होता । गति एक छंद किंवा ताल युक्त क्रिया मानी गयी है । पंखों के सिकुड़ने और फैलनेसे पक्षी गतिशील होता है । वैदिक पुरुष इसी को संकुचन और प्रसारण कहते हैं । ऋग्वेद में गरुड़ को, अग्नि, इन्द्र, मित्र, वरुण आदि के समकक्ष रखा गया है । शेष नाग अर्थात् अन्धकार से पृथ्वी भयभीत होती है । अन्धकार ज्योति से दूर होता है । गरुड़ को देखते ही अन्धकार किंवा नाग भागते हैं । कल्हण गोनन्द की भुजाओं पर गरुड़प्रिय रत्नों का उल्लेख कर बताना चाहता है कि राजा की

[Right Column] भुजाओं में अमित बल था । वे पृथ्वी को भयहीन, अन्धकार हीन करने की भुजबल से सामर्थ्य रखते थे ! पाठभेद : श्लोक संख्या ५९ में 'स संरु' का पाठभेद 'समं रु' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ५९ (१) जरासंध : जरासंध का पिता वायु पुराण के अनुसार नभग था । भागवत, विष्णु तथा मत्स्य पुराणों के मतानुसार वह बृहद्रथ का पुत्र था । अतएव जरासंध को बार्हद्रथि भी कहते हैं । हरिवंश पुराण के अनुसार उसके पिता का नाम संभव था । काशीराज की दो युगल कन्याएँ थी । उन दोनों से बृहद्रथ ने विवाह किया था । उन्हें बहुत दिनों तक सन्तान नहीं हुई । काक्षोवत पुत्र चन्द्रकौशिक ने राजा को पुत्रप्राप्ति निमित्त एक आम का फल दिया । राजा ने दोनो पत्नियों को आधा आधा फल खिला दिया । कालान्तर में दोनों रानियों के गर्भ से आधा आधा शरीर के बालक उत्पन्न हुए । उन्होंने नवजात शिशु के चौराहा पर रखवा दिया । जरा नामक राक्षसी ने उन्हें जोड़ दिया अर्थात् दोनो टुकड़ों को सन्धि में मिला दिया । शिशु जी उठा । राक्षसी उसे ले जाना चाहती है । बालक रोने लगा । रुदन सुनकर राजा बाहर आया । राक्षसी ने बालक राजा को दे दिया । बालक का नाम जरासंध पड़ा । ( महाभारत सभापर्व १६-१७ तथा मत्स्य पुराण ) भागवत के अनुसार बृहद्रथ के एक ही पत्नी के बालक के दो अलग अलग भाग पैदा हुए । जरा राक्षसी ने मन्त्र बल से उन्हें जोड़ दिया । अतएव उसका नाम जरासंध पड़ा । ( भागवत ९:२१-२२)