भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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कल्हण रचना : कल्हण के सम्बन्ध में जो कुछ सामग्री बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक तक प्राप्त हुई है, उससे अधिक इस दिशा में प्रगति नहीं हो सकी है। राजतरंगिणी, अर्धनारीश्वर स्तोत्र तथा जय- सिंहम्युदय काव्य कल्हण से सम्बन्धित किये जाते हैं। राजतरंगिणी निस्सन्देह कल्हण की रचना है। अर्ध- नारीश्वर स्तोत्र के १८ श्लोकों में सात श्लोक राजतरंगिणी के सात तरंगों के मंगलाचरणों से लिये गये हैं। जयसिंहम्युदय काव्य अभी तक प्रकाश में नहीं आया है। राजतरंगिणी के इतिपाठ तथा स्तोत्र के इतिपाठ में मौलिक अन्तर है। राजतरंगिणी के इतिपाठ में कल्हण ने अपने को महाकवि नहीं लिखा है। केवल अष्टम तरंग के इतिपाठ में महाकवि शब्द आता है। परन्तु इसका पाठभेद अनेक प्राचीन प्रतियों में मिलता है। जिनमें महाकवि शब्द नहीं दिया गया है। प्रतीत होता है किसी श्रद्धालु लिपिक ने महाकवि शब्द उसके काव्य के विशाल रूप को देखकर अन्त में दे दिया है। सुयोग्य, विनयी एवं प्रतिभाशाली कवि चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, वह अपनी लेखनी से अपने लिए महाकवि पद का प्रयोग नहीं करेगा। यह आत्मश्लाघा हो जाती है। अर्धनारीश्वर स्तोत्र उसकी स्वतन्त्र रचना है अथवा उसके श्लोकों का संग्रह मात्र है अथवा किसी ने उसके पदों का संकलन कर उसे अर्धनारीश्वर स्तोत्र की संज्ञा दे दी है। यह विचारणीय विषय है। जयसिंहम्युदय काव्य उपलब्ध नहीं है। केवल रत्नाकर के सार-समुच्चय में कल्हण की इस रचना का उल्लेख मिलता है। कल्हण की सूक्तियों के संग्रह का भी उल्लेख मिलता है। किन्तु वह राजतरंगिणी के आठों तरंगों के सुभाषितों का संग्रह मात्र है। यदि जयसिंहम्युदय काव्य प्रकाश में आ जाय तो कल्हण के जीवन पर और प्रकाश पड़ सकता है। स्तोत्र तथा सूक्ति संग्रह का मूल स्रोत राजतरंगिणी है। स्तोत्र में दिये गये इतिपाठ में चम्पक महामात्य का नाम नहीं है। राजतरंगिणी के आन्तरिक लेखों के आधार पर अनुमान एवं निष्कर्ष निकाल कर, कल्हण के जीवन पर कुछ और प्रकाश डाल सकते हैं। वंश : राजतरंगिणी के इतिपाठ से कल्हण के पिता का नाम महामात्य चम्पक प्रभु होना सिद्ध होता है। यद्यपि अर्धनारीश्वर स्तोत्र के इतिपाठ में कल्हण के वंश, पिता, पद, देशादि का नाम नहीं दिया गया है। इतिपाठ के अतिरिक्त कल्हण के वर्णन (रा० त० ७ : ९५४, १११७, १११८, ८ : २३६५) से प्रमाणित हो जाता है कि चम्पक कल्हण का पिता था। वह महामात्य था। राजमन्त्री था। समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। कल्हण अपने चाचा कनक के विषय में भी सूचना देता है। (रा० त० १११७-१११८) वह चम्पक का कनिष्ठ भ्राता था। कनक काश्मीर राज हर्ष का प्रियपात्र था। शिष्य था। राजा से सपरिश्रम गान विद्या सीखा था। राजा हर्ष सर्वश्रेष्ठ गायक, गीतकार एवं संगीत शास्त्र पारंगत था। कनक के परिश्रम एवं संगीत में श्रेष्ठता प्राप्त करने के कारण, राजा हर्ष ने उसे एक लाख स्वर्ण मुद्रा दिया था। कनक का राजा पर स्नेहयुक्त प्रभाव था। कल्हण का गृह, गान-वादन, राग-रागिनी, ताल-लय समन्वित पदों एवं गीतों से गुंजित रहता था। कल्हण के पदों में माधुर्य एवं ताल-लय की एक अविच्छिन्न धारा प्रवाहित मिलती है। उसका पद