राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २ ] कहीं भी पद लालित्य से रहित नही है। उसके शब्दों का चयन, संकलन, निवन्धन एवं उनकी ध्वनि श्रोत- प्रिय है। कही भी इस गति में अवरोध किंवा विश्रृंखलता नहीं मिलती । जन्मस्थान : कल्हण का जन्म परिहासपुर में हुआ था । उसका कुल परिहासपुर निवासी था । कल्हण ने इसका स्पष्ट उल्लेख किया है। जिस समय राजा हर्ष परिहासपुर के प्रसिद्ध विहार-स्थित बुद्ध की विशाल प्रतिमा खण्डित करना चाहता था, तो परिहासपुर के कनक तथा एक श्रमण कुशलस्थो के कारण अपने अनुचित कार्य से विरत हो गया । प्रतिमा की रक्षा हो गयी । ( रा० त० ७ : १०९७ ) इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं। कनक परिहासपुर निवासी था । कल्हण का कुटुम्ब परिहासपुर में रहता था । अतएव कल्हण का जन्म परिहासपुर में होना मानना उचित होगा । कल्हण ने परिहासपुर का स्पष्ट और विस्तृत प्राकृतिक वर्णन किया है। यह वर्णन वहाँ का निवासी ही कर सकता है। परिहासपुर समीपस्थ वितस्ता-सिन्धु संगम प्रयाग ( वाग्दीपुर ) का विशद वर्णन भाव- मयी भाषा में कल्हण ने किया है। वहाँ के स्थान, मन्दिर आदि का सुस्पष्ट, वास्तविक विस्तृत वर्णन प्रसंग आते ही किया है। दूसरों के लिये यह सम्भव नहीं था । ( रा० त० ४ : १६४, २०४; ७ : १३२६, १३४४; ५ : ९७-१०० ) परिहासपुर, प्रयाग तथा वाग्दीपुर में बार बार जा चुका हूँ। वहाँ का जो वर्णन राज- तरंगिणी में मिलता है वह अक्षरशः सत्य है । जाति : कल्हण की जाति ब्राह्मण थी । उसे अपने ब्राह्मणत्व का गर्व था । कल्हण ने अपनी जाति स्वयं कही नहीं लिखी है। वह ब्राह्मण था । यह प्रश्न विवादास्पद इसलिए नही रह जाता कि द्वितीय राजतरंगिणी के लेखक जोनराज ने उसे 'कल्हण द्विजः' लिखा है । ( जो० रा० ५ ) जोनराज ने कल्हण के वंशजों के लिए पुनः 'ब्राह्मणान्' 'ब्राह्मण्यान्' 'ब्राह्मण्यात्' विभिन्न पाठभेदों के साथ उल्लेख किया है । ( जो० रा० ९९ ) शुक ने अपनी राजतरंगिणी में 'श्री कल्हण द्विज' लिखा है । ( शुक : रा० ५ ) कल्हण ने सन् ११५० ई०, जोनराज ने सन् १४४६ ई०, तथा शुक ने सन् १५८६ ई० में अपनी रचनाओ का लेखन- कार्य समाप्त किया था । इस प्रकार कल्हण के रचना काल से आगामी ४३६ वर्षों तक कल्हण तथा उसके वंशजो को द्विज किंवा ब्राह्मण माना जाता रहा है। द्विज शब्द ब्राह्मण, क्षत्री तथा वैश्य यज्ञोपवीतधारी के लिए निर्देश किया गया है। किन्तु द्विज के साथ ब्राह्मण शब्द का प्रयोग कल्हण की जाति निश्चित कर देता है। आजकल द्विज शब्द ब्राह्मणो के लिए रूढ़ हो गया है। कल्हण को काश्मीरी ब्राह्मण होने का इतना गर्व था कि ( रा० १ : १६० ) उसने गान्धार ब्राह्मणों को द्विजाधम तक लिखा है ( रा० १ : ३०७, ४३६, ११५० ) तथापि उसने आर्यदेशीय ब्राह्मणो के लिए आदरसूचक शब्दों का प्रयोग किया है। वह ब्राह्मणों को पवित्र तथा सनातनी देखना पसन्द करता था। ब्राह्मणो के अनुचित कार्यों की उसने निन्दा की है। ( १ : १५८ ) जन्म वर्ष : कल्हण के पिता चम्पक का सन् ११३६ ई० तक जीवित रहना सिद्ध होता है । कल्हण ने सन् ११४८-११४९ ई० में राजतरंगिणी की रचना प्रारम्भ किया था। कल्हण ने स्वयं, अथवा मंख अथवा किसी अन्य तत्कालीन अथवा परवर्ती लेखक ने इस विषय पर प्रकाश नही डाला है। राजतरंगिणी के आन्तरिक साक्ष्य से ही उसका सम्भाव्य जन्म वत्सर निकालना होगा । कल्हण की शैली से प्रकट होता है, वह तरंगिणी रचना काल में प्रौढ़ व्यक्ति था । उसरा मस्तिष्क प्रौढ़ था । उसका विचार प्रौढ़ था। उसका शरीर प्रौढ़ था। राजा सुस्सल के पुनराज्य प्राप्ति के पूर्व