राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३ ] भिक्षाचर के सैनिकों के विश्वासघातक कार्यों का प्रत्यक्षदर्शी था । यह घटना सन् ११२१ ई० की है। ( रा० ८ : ९४१ ) उसने राजा सुस्सल ( सन् १११२-११२० ई० ) के पूर्ववर्ती तीन राजाओं का आँखो देखा वर्णन किया है । यहाँ उसकी शैली घटना-क्रमों को एक के पश्चात् दूसरे को इस द्रुत गति से रखती है, जैसे कोई उन घटनाओं को स्वतः देखकर लिख रहा था । वह किंचित् मात्र कहीं भी अपनी लेखनी को ठहरने नही देता । शब्द नही खोजता । कड़ी नही जोड़ता । वह शीघ्रातिशीघ्र सब कुछ वर्णन कर देने के लिए उतावला हो उठता है । घटनायें जैसे स्वतः एक के पश्चात् दूसरी उसकी लेखनी से प्रसूत होती गयी हैं । घटना-क्रमों के मूल को जान लेता है । परिस्थितियों का रहस्य समझ जाता है । कल्हण का पिता चम्पक सन् १०९८ ई० में० द्वारपति के पद पर था । राजा हर्ष ने उसे मण्डलेश भी बनाया था । निःसन्देह चम्पक इस समय प्रौढ़ व्यक्ति था । दोनों पद काश्मीर में सर्वश्रेष्ठ उत्तरदायित्व के थे । वे अनुभवी तथा प्रौढ बुद्धि वाले व्यक्ति को दिये जाते थे, जो उनकी गुरुता का अनुभव कर सकता था । यदि चम्पक का अवसान काल सन् ११३६ ई० मान लिया जाय तो यह समय सन् १०९८ ई० के लगभग पड़ता है । अर्थात् वह ३८ वर्ष की आयु तक द्वारपति एवं मण्डलेश हो चुका था । श्री स्टीन का मत है कि कल्हण का जन्म ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रखा जा सकता है । चम्पक किसी युद्ध में हत नही हुआ था । यदि वह अकाल मृत्यु किंवा किसी संघर्ष में हत किंवा आहत होता तो कल्हण उसका अवश्य वर्णन करता; क्योकि कल्हण ने उसे राजनीति एवं संघर्षों में सक्रिय भाग लेते हुए चित्रित किया है । निश्चय ही चम्पक अपनी मृत्यु से दिवंगत हुआ था । यदि सन् १०९८ ई० में उसकी आयु ३८ वर्ष कम से कम मान ली जाय तो सन् ११३६ ई० में उसकी आयु ६८ वर्ष की ठहरती है । इस आन्तरिक साक्ष्य के अनुसार कल्हण का जन्म सन् १०९८ ई० के समीप रखा जा सकता है । श्री स्टीन के मत में तथ्य है कि कल्हण का जन्म ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रखा जा सकता है । कनक : उच्चल तथा सुस्सल भ्राता द्वय काश्मीर राज्य प्राप्ति हेतु कृत-संकल्प हो गये थे । उच्चल के कारण राजा हर्ष की अमानुषिक क्रूरता को भी लज्जित करने वाली हत्या की गयी । ( रा० ७ : १७११, १७१२ ) राजा हर्ष का मुण्ड काटकर उच्चल के पास भेजा गया । मुण्ड को लगुडा पर खोसकर चारो ओर घुमाया गया । ( रा० ७ : १७२१, १७२३ ) राज्य प्राप्ति के प्रश्न को लेकर दोनो भाई उच्चल तथा सुस्सल में भी संघर्ष आरम्भ हो गया । उस समय सभी अनुचर सात दिनों तक मार्ग में रोक दिये गये । कल्हण का संगीतज्ञ चाचा कनक भी उसी रुके समुदाय मे था । अवसर पाते ही वह समुदाय से निकल भागा । कनक अपने गुरु तथा राजा हर्ष के दुःखद अन्त से इतना खिन्न हो गया कि काश्मीर मण्डल त्याग दिया । वाराणसी में काशीवास करने लगा ! ( रा० ८ : १२, १३ ) काशी किंवा वाराणसी के इस सम्बन्ध के कारण कल्हण ने राजतरंगिणी में काशी का अत्यधिक वर्णन किया है । चम्पक : प्रथम तरंग से षष्ठ तरंग के इतिपाठ के अतिरिक्त कल्हण ने प्रथम बार चम्पक का सहसा उल्लेख नन्दि क्षेत्र यात्रा के प्रसंग में किया है । कल्हण की यह शैली है । जब वह किसी व्यक्ति का उल्लेख करता है तो उसके पद, वंश आदि का उल्लेख करता है । यहाँ चम्पक का बिना किसी पक्ष आदि के वर्णन करना महत्त्व रखता है । वह मान लेता है कि लोग उसके पिता के सम्बन्ध में जानकारी रखते थे । कुछ विद्वानों का यह मत है कि यह वर्णन इस बात का प्रतीक है कि उसने अपने समय के लोगों के लिए राज- तरंगिणी लिखी थी ।