भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[ ४ ] कल्हण स्वयं अपने पिता के साथ नन्दि क्षेत्र की यात्रा में प्रतिवर्ष जाता था । ( रा० ७ : १५४ ) यहाँ उसके पिता प्रचुर धन दान करते थे । ( रा० ८ : २१६५ ) कल्हण के पिता निस्सन्देह सन् ११३६ ई० तक जीवित थे । कल्हण ने जून सन् ११४८ ई० में रचना-कार्य आरम्भ किया था । सन् ११५० ई० में राजतरंगिणी का रचना-कार्य समाप्त किया । मालूम होता है, पिता की मृत्यु के पश्चात् उसने रचना में हाथ लगाया था । कल्हण ने तरंग सात की सामग्री पिता चम्पक तथा चाचा कनक से प्राप्त की थी । ये तत्कालीन घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी थे । राजा जयसिंह ने सन् ११२८ से ११५६ ई० तक राज्य किया था । राजा जयसिंह के जीवन काल में उसने रचना समाप्त की थी। ( रा० ८ : ३४४४-३४४६ ) वह स्वयं २२ वर्षों के राज्य काल तथा घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी था । वह उस समय युवक नही था । उसने रचना-काल स्वयं शक सम्वत् १०७१ दिया है । यह काल समाप्ति किया लौकिक सम्वत् से ४२२४ वर्ष होता है । इसी से शक तथा लौकिक सम्वत् की गणना का सूत्र मिलता है । सन् ईस्वी के अनुसार यह समय सन् ११४८ ई० आता है । लेखन समाप्ति लौकिक सम्वत् ४२२५ में किया था । यह समय सन् ११४६-११५० ईस्वी होता है । ( रा० त० १ : ४४-५३; ८ : ३४०४ ) कल्हण ने जिस समय रचना-कार्य समाप्त किया था, उस समय राजा जयसिंह के राज्यकाल का २२ वाँ वर्ष था । राजा जयसिंह के शेष ९ वर्षों का वर्णन द्वितीय राज- तरंगिणी के लेखक जोन राजा ने किया है। जयसिंह फाल्गुन वदी १५ लौकिक सम्वत् २४०३ में राज्या- रोहण किया था । मान लिया जाय कि रचना के समय कल्हण की आयु ४० वर्षों की थी, तो निस्सन्देह उसने तरंग आठ की घटनाओं का आँखो देखा वर्णन किया है । तरंग आठ का समय केवल ४८ वर्षों का है । तरंग सात का काल लौकिक संवत् ४०७९ से आरम्भ होकर लौकिक संवत् ४१७७ में समाप्त होता है । यह मध्यवर्ती समय ६८ वर्ष होता है । कल्हण ने पिता चम्पक का वर्णन राजा हर्ष के काल में सक्रिय कार्य करते हुए किया है । इसी समय कनक भी राजनीति में सक्रिय दिखाई देता है । तरंग सात की समस्त सामग्री उसने पिता चम्पक तथा कनक तथा तत्कालीन जीवित प्रत्यक्षदर्शी वृद्धों से लिया है । यही कारण है कि तरंग सात में वह छोटी-छोटी घटनाओ का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत करता है । तरंग आठ में और भी छोटी-से छोटी घटनाओं और सूक्ष्म से भी सूक्ष्म बातो का विस्तृत वर्णन करता है । तरंग सात के ९८ वर्षों का इतिहास कल्हण ने १७३२ श्लोको में किया है, किन्तु तरंग आठ के ४८ वर्षों का इतिहास ३४४९ श्लोको में करता है । राजतरंगिणी में कुल ७८२६ श्लोक है । इसमें प्रथम से षष्ठ तरंगों का वर्णन ३०४५ श्लोको में किया गया है । केवल दो तरंगो सात एवं आठ का वर्णन ५१८४ श्लोकों में किया जाता है । महाभारत काल से षष्ठ तरंगो का वर्णन उसने तत्कालीन प्राप्य ग्रन्थों प्रशस्ति पत्रों, जन-श्रुतियों, प्राचीन कथानको, परम्पराओं आदि के आधार पर किया है । चम्पक साधारण व्यक्ति नही था । यह महामात्य था । द्वारपति था । मण्डलेश था । अपने उत्तरदायित्वो का जिम्मेदारी के साथ निर्वाह किया था । दुग्धघात दुर्ग दरदो के अधिकार में था । दरदों ने दुर्ग को केन्द्र बनाकर काश्मीर मण्डल के अनेक ग्रामों पर अधिकार कर लिया था । महत्तम सहेल ने राजा को सलाह दिया कि दुर्ग घेर लिया जाय । द्वारपति चम्पक को दुर्ग घेरने और विजय करने का भार सौंपा गया । चम्पक प्रस्थान करने ही वाला था कि वातगण्ड, जिसे राजा ने द्वारपति के पद से हटा दिया था और जो चम्पक से ईर्ष्या करता था राजा हर्ष को अभियान से विरत कर दिया । तथापि चम्पक ने मधुमती नदी पार कर अपने सैनिकों को दुर्ग में प्रवेश करा दिया । ( रा० त० ७ : ११७६-११७६ )