राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५ ] अन्य स्थान पर राजा हर्ष को मन्त्रणा देते हुए चम्पक का उल्लेख किया गया है । उसने राजा हर्ष को सलाह दिया—'या तो युद्ध कीजिये अन्यथा लोहर रक्षा की दृष्टि से चले जाइये ।' राजा के अनुचर प्रयाग ने राजा को मन्त्रणा दी कि वह युद्ध की अपेक्षा लोहर रक्षा हेतु चला जाय । राजा हर्ष स्वयं उच्चल से युद्ध करता वीरगति प्राप्त करना चाहता था । राजा के कायर पदाति सैनिक राजा के इस विचार के विरोधी थे । अनन्तपाल आदि राजपुत्रों की मन्त्रणा पर राजा अग्रसर होता था परन्तु दण्डनायक मार्गविरोध कर देते थे । चम्पक युद्ध का पक्षपाती था । राजभक्त था । चंपक की बात राजा ने नहीं मानी । परिणाम राजा का दुःखद अन्त हुआ । युवराज भोजदेव जब प्रस्थान कर गया तो राजा उसके वियोग में दुःखी हो गया । राजा हर्ष ने चंपक को युवराज का पता लगाने के लिए कहा । राजा का आदेश सुनकर चंपक स्तब्ध हो गया । लंबी साँस लेकर कहा—'मेरे चले जाने पर आपका एकमात्र अनुचर प्रयाग आपके साथ रह जायगा । ऐसी परिस्थिति में आप मुझे अपने पास अपनी रक्षा के लिए रहने दीजिये ।' राजा ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से चंपक की ओर देखा । राजा जानता था । चंपक एवं युवराज भोजदेव में एक अश्वनी को लेकर विवाद हो गया था । राजा ने व्यंगपूर्वक—उत्तर दिया—'चंपक तुम कृतघ्न नहीं हो । ऐसे काल में तुम मेरी आज्ञा का उल्लंघन क्यों करते हो ?' इस स्थान पर राजा ने चंपक का संबोधन मंत्री रूप से किया है । इससे प्रतीत होता है कि चंपक ने मंत्री पद पर भी कार्य किया था । राजा की बात सुनकर चंपक लज्जित हो गया । उदास मन युवराज भोज का पता लगाने के लिए चल पडा । चंपक ने जिस समय प्रस्थान किया उस समय उसके साथ दो भाई, भृत्य, शेपराज आत्मज के साथ पचास अश्वारोही थे । किन्तु नदी पार पहुँचते-पहुँचते यह संख्या केवल पाँच रह गयी । उसके दोनों भाई शेपराज आत्मज तथा अश्ववार सडक पर घोड़ो के मरने के कारण गिर गये । यहाँ चंपक केवल धानक के साथ घूमने लगा । युवराज भोजदेव का बिना पता लगाये वह लौटना नही चाहता था । वह भ्रमण करता सायंकाल वितस्ता सिन्धु के संगम पर पहुँच गया । इस उद्धरण से दो बातें स्पष्ट होती हैं । चम्पक के दो भाई थे । वह मन्त्री था । कुशल सैनिक था । साहसी था । राजा का विश्वासपात्र था । कृतघ्न नहीं था । कल्हण ने अपने पिता चम्पक के दोनों भाइयों का नाम नहीं दिया । केवल कनक का अपनी रचना में उल्लेख किया है । श्रीनगर का राज्य हर्ष ने त्याग किया तो उसके साथ उसका पुराना भृत्य प्रयाग रह गया था । राजा के शरीर पर केवल एक वस्त्र था । वह अत्यन्त हीन एवं विपन्नावस्था में था । राजा की यह करुण ने स्थिति देखकर, चम्पक का भृत्य जेल्क भी राजा के साथ हो गया । राजा के अन्तिम काल में स्वामिभक्त चम्पक क्यों नही उपस्थित था इसका स्पष्टीकरण कल्हण ने स्वयं किया है । राजा ने उसे युवराज को खोजने के लिए भेज दिया था । जेल्क के उद्धरण से यह बात प्रकट होती है । कल्हण का समस्त परिवार सभृत्य स्वामिभक्त था । उसके कुटुम्ब तथा राजा के कुटुम्ब का घर जैसा पारस्परिक व्यवहार था । वे एक कुटुम्ब के प्राणी दुःख- सुख दोनों में थे । ( रा० त० ७ : १५८६-१५६२ ) कल्हण का कुल अभिजात था । राज्य में प्रतिष्ठा प्राप्त था । राजवंश का विश्वासपात्र था । अतएव तरंग सात में वर्णित राजाओं का इतिहास सप्रमाण है । चम्पक, कनक तथा उसका कुटुम्ब उसके प्रत्यक्षदर्शी थे । इतिहास लिखने की समग्र सामग्री उसे राज्य के कागज-पत्रों के साथ सरलता पूर्वक उपलब्ध थी । इति- हास लिखने के लिए साधन सम्पन्न था । उसने अपने को इस प्रकार उस समय का व्यक्ति प्रमाणित किया है ।