राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १०५ गतिं प्रवीरसुलभां तस्मिन्सुक्षत्रिये गते । श्रीमान्दामोदरो नाम तत्सूनुरभृत क्षितिम् ॥ ६४ ॥ ६४. जब उस सुक्षत्रिय ने प्रवीर सुलभ गति¹ प्राप्त कर ली तो उसका यशस्वी पुत्र श्रीमान् दामोदर क्षिति की रक्षा में तत्पर हुआ । भोगयोगोर्जितं राज्यं प्राप्नवानपि भूपतिः । ध्यायन्पितृवधं मानी नोपलेमे स निर्वृतिम् ॥ ६५ ॥ ६५. यद्यपि उस भूपति ने भोग सम्पत्ति सम्पन्न राज्य अर्जित किया था तथापि पितृ वध का ध्यान उदय होते ही उस मानी को शान्ति दुर्लभ हो जाती थी ।
[बायाँ स्तम्भ / Left Column] यह भी राजा जम्मू के खान्दान में था । मौर याज ने इसे मथुरा का पोता ख्याल किया है । उसने हकूमत का नज्म व नस्ल निहायत खूबी से सरंजाम दिया । उन दिनों हिन्दुस्तान में जरासन्ध राजा की हकूमत को उसने श्रीकृष्ण जी महाराज के साथ विनाय मुखासवत डाली हुई थी । राजा आदि गोनन्द अपनी करीबी रिस्तादारी के पेश नज़र एक बड़ी भारी फौज कश्मीर से लेकर राजा जरा- सन्ध की मदद को रवाना हुआ । अपना लाव लश्कर लेकर उनके साथ मसरूफ पैकार था । दरया जमुना के किनारे फरीकों की फौजों के माबैन में बड़ा भारी रण पड़ा । आखिर में किसी वजह से राजा आदि गोनन्द की फौज में भगदड़ पड़ गयी । खुद राजा मजकूर साबित कदम रहा । और दाद सुजाअत देता हुआ बलभद्र जी बिरादर श्री कृष्ण जी महाराज के हाथों मैदान कार ज़ार से काम आया । मुद्दत हकूमत सत्तरह साल ।' हरिवंश पुराण विष्णु पर्व ४१:२८ में स्पष्ट उल्लेख है कि अन्य राजाओं के साथ कश्मीर राजा ने जरासन्ध का पक्ष लेकर मथुरा पर आक्रमण कर कृष्ण से युद्ध किया था । मद्रः कलिंगाधिपतिश्चेकितानश्च बाह्निकः । कश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा ॥ पादटिप्पणियाँ : ६४ (१) गति : कल्हण यहाँ पर भारतीय वीर परम्परा की ओर संकेत करता है। क्षत्रियों को स्वर्ग १४
[दायाँ स्तम्भ / Right Column] प्राप्ति युद्ध स्थल में होती है । प्रासादों में बैठकर जीवन व्यतीत करना और मर जाना यह क्षत्रियों किंवा आयुधधारियों का कभी भारतवर्ष में आदर्श नही रहा और न इस प्रकार के जीवन को भारतीय कभी अच्छा मानते थे । विजय दशमी के दिन अर्थात् चातुर्मास के पश्चात् विजय यात्रा का मुहूर्त माना जाता था । इस दिन प्रतापी राजा विजय यात्रा निमित्त निकलते थे । सन् १९४७ के पूर्व प्रायः सभी भारतीय राजाओं के यहाँ सुसज्जित सेना प्रयाण करती थी । अस्त्र-शस्त्र की पूजा होती थी । समरांगण में वीर गति प्राप्त करने से बढ़कर क्षत्रियों के लिये और कोई श्लाघनीय मृत्यु नहीं मानी जाती थी । ६५. जरासंघ मगध का सम्राट् था । उसके पुत्र का नाम सहदेव था । उसकी दो कन्याएँ अस्ति तथा प्राप्ति का विवाह मथुरा के राजा कंस के साथ हुआ था । महाभारत में कहा गया है कि जरासंघ ने सम्राट् का पद प्राप्त किया था । चेदि का राजा शिशुपाल उसका सर्वप्रधान सेनाध्यक्ष था । जरासंघ एक संघ का सम्राट् था । महाभारत में प्रमाण मिलता है कि बहुत से राजा मिलकर एक सम्राट् का निर्वाचन करते थे । उसे उस पद पर अभिषिक्त करते थे । राजाओ ने एकता की दृष्टि से यह प्रथा चलाई थी । जरासंघ ने मालूम होता है सम्राट् होने पर इस सिद्धान्त की अवहेलना की थी । (सभापर्व अ० १८; आदिपर्व अ० १०० : ७) मथुरा का बड़ा महत्त्वपूर्ण इतिहास है । रामायण,