राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ राजतरंगिणी अथ शस्त्रक्षतैरङ्गैरालिङ्ग्य रणाङ्कणे । भुवं काश्मीरको राजा यादवस्तु जयश्रियम् ॥ ६३ ॥ ६३. अन्ततः युद्धभूमि में दोनों योद्धाओं के अंग परस्पर प्रहार द्वारा आहत हो गये थे। काश्मीरराज ने सभर भूमि का आलिंगन किया और यादवराज का आलिंगन किया विजय ने । पादटिप्पणियाँ : ६२. प्रतीत होता है । दोनों योद्धा बलराम तथा गोनन्द समान बलशाली थे । यादव सेना पलायन- शील थी । उसमें बलराम के युद्ध में जमने के कारण नव शक्ति आ गयी थी । बलराम तथा गोनन्द का द्वन्द्व युद्ध बहुत समय तक चलता रहा । इस युद्ध वर्णन से यह मालूम होता है कि प्रथम बलभद्र ने जरासंध पर आक्रमण किया था । वह दक्षिणी मोर्चा पर था । बलराम के द्वारा जरासंध का वध सम्भव नही था। अतएव वह पश्चिमी मोर्चा पर आक्रमण किया, जहाँ कश्मीरी वाहिनी राजा गोनन्द के नेतृत्व में युद्ध निमित्त सन्नद्ध थी । विजयमाला को वैजयन्ती कहते है। हाथियों के दांतो पर माला भारतीय स्थापत्यों में लगी दिखायी पड़ती है । यह माला गाथानुसार हाथी किसी व्यक्ति के गले में डाल देता था। वह व्यक्ति राजा चुन लिया जाता था । राजा चुनने की यह अत्यन्त प्राचीन प्रथा है । नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन एवं केन्द्रीय मन्त्रालय के भवनो पर हाथी के मस्तक के बिना ही दातों पर माला लिपटा पत्थरों में खोदकर दिखाया गया है । पाठभेद : श्लोक संख्या ६३ में 'काश्मीरको' का पाठभेद कश्मीरको' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ६३. नीलमत पुराण गोनन्द के पराजय का कारण देता है — 'राजा गोनन्द ने नील मुनि द्वारा निर्धा- रित कुछ अनुशासनो का पालन नहीं किया था अत- एव मथुरा में बलभद्र द्वारा पराजित हो गया था । यदि कश्मीर के राजा नील द्वारा निश्चित आदेशो का पालन करेंगे तो उनकी अकाल मृत्यु नहीं होगी । कश्मीर मण्डल में कभी भय उत्पन्न नहीं होगा ।' श्लोक संख्या ( ८७५,८७६ ) । वृष्णि अर्थात् यादव सेना ने निस्सन्देह विजय पायी थी । कश्मीरराज ने वीर गति पायी । किन्तु जरासंध जीवित रहा । अपनी शेष सेना के साथ मगध लौट गया । इस युद्ध पर महापुराणों तथा महाभारत के आधार पर और विशेष लिखना अप्रा- संगिक होगा । इस युद्ध के बीस वर्ष पश्चात् महाभारत का युद्ध हुआ था । गिरिव्रज में जरासंध तथा भीम का गदा युद्ध प्रारम्भ में प्रारम्भ हुआ । यह युद्ध कातिक शुक्ल को प्रारम्भ हुआ था । गदा टूट जाने पर मल्ल युद्ध हुआ । यह युद्ध महाभारत सभा पर्व ( २१.१७,१८ ) के अनुसार १४ दिन, पद्मपुराण ( उ० २७९ ) के अनुसार २५ दिन, भागवत ( १०:७२ ) के अनु- सार ४० दिनों तक चलता रहा । जरासंध को भीम ने बीच से चीर दिया था । संधि खुल गयी । जिस रूप में वह जन्मा था उसी रूप में मर गया । आइने अकबरी में अबुल फजल शोगन्द का नाम भोगनन्द देता है। वह कहता है—कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम द्वारा गोनन्द मारा गया । वह मेहतरा ( मथुरा ) तथा ( बिहार ) के राजा जरासंध के बीच हुआ था । हसन गोनन्द को आदि गोनन्द कहता है । गोनन्द के वंश के विषय में वह लिखता है—इस राजा ने अराकीने सल्तनत की मरजी से सन् कल जुग की इब्तदा से बीस साल पेस्तर तख्त कश्मीर पर जलवागिरी फरमाई । बाज मुवर्रखों के नजदीक