भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

तयोस्तुल्यौजसोर्युद्धे चिराय करवर्तिनी । मम्लौ विजयसंदेहे वरणस्रग्जयश्रियः ॥ ६२ ॥ ६२. दोनों तुल्य बलशाली योद्धाओं के संघर्ष से विजय सन्देहात्मक हो गया और विजय देवी के करपल्लवों की वैजयन्ती अधिक समय तक हाथ में रहने के कारण म्लान हो गयी ।

बलराम सर्वदा नील वस्त्र धारण करते थे । कमल की माला पहनते थे । गदा युद्ध में अत्यन्त प्रवीण थे । जरासंध वध निमित्त तपस्या द्वारा 'संयर्तक' नामक हल तथा 'सौनन्द' नामक मूसल प्राप्त किया था । महाभारत के युद्ध में यह किसी पक्ष से भाग नहीं लिये थे । पाञ्चरात्र शास्त्रों के अनुसार बलभद्र भगवान् वासुदेव के व्यूह किंवा रूप हैं । शुंग कालीन बलराम की मूर्तियाँ मिली हैं । बलराम शेष के अवतार माने गये हैं । अतएव उनकी मूर्तियों के पृष्ठ भाग में शेष की मूर्तियाँ किंवा आभोग बना दिखाया रहता है । मूर्तियाँ हल, मूसल, युक्त कहीं द्विभुज और कहीं चतुर्भुज मिलती हैं । उनके कर्णों में एक ही कुण्डल कहीं कहीं दिखाया गया है । एक कुण्डलवारी होना 'बृहत्संहिता' द्वारा समर्थित है । कुषाण तथा गुप्त कालीन बलराम की मूर्तियाँ सिंह कुण्डल युक्त दिखायी गयी हैं । बलराम का विवाह रेवत की कन्या रेवती से हुआ था । बूमरँग तथा हल - आस्ट्रेलिया के भ्रमण काल में (स० १९५०) मैने बूमरेंग का चलाना देखा था । बूमरेंग का रूप हलसदृश हो जाता है यदि उसके हरीस का लम्बा भाग छोटा कर दिया जाय । बलराम ने तपस्या द्वारा यह शस्त्र पाया था । अतएव यह अस्त्र वास्तव में हलाकार रहा होगा । आस्ट्रेलिया के संग्रहालय में मैने एक प्राचीन गणेश की मूर्ति भी देखी थी । उसी समय मैने सोचा था कि कभी आस्ट्रेलिया और भारत से निकट का सम्बन्ध था जो भारतीय पराधीनता के कारण टूट गया । यह एक कल्पना मात्र है । यदि यह शस्त्र था तो तो वह बूमरेंग की तरह ही रहा होगा कि आजकल के बड़े हल के समान जिसका उठाना और चलाना कठिन है ।। (विशेष द्रष्टव्य 'आस्ट्रेलिया' काशी) लांगलध्वज, वृषभध्वज, हनुमानध्वज, गरुड- ध्वज आदि झण्डो पर लगे चिह्न को भी कहते हैं । बलराम के ध्वज पर लांगल अर्थात् हल का चिह्न अंकित रहा होगा अतएव उन्हें लांगलध्वज कहा गया है । पुराण से प्रकट होता है । यादव सेना अल्प संख्या में थी । तथापि बलराम तथा श्री कृष्ण के रण चातुरी एवं वीरता के कारण रण में विजय प्राप्त की थी । (हरिवंश पु० २ : ३६) श्री रणजोत सीताराम पण्डित इस श्लोक की टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि बलराम सर्व साधारण जनता में से उठे थे । उन्होंने हल को जो परिश्रम- शील जनता का प्रतीक था अपना प्रतीक बनाया । बलराम श्री कृष्ण के भाई थे । राजवंशी थे । राजपुत्र थे । कुलीन थे । मथुरा राज्य का अधिकार प्राप्त किया था । तत्कालीन कुलीनों ने तुल्य राज्य में भाग लिया था । हल कृषक वर्ग का निश्चय प्रतीक हो सकता है परन्तु समस्त जनता का नहीं हो सकता । सन् १९४८ में कृषक मजदूर प्रजा दल का संघटन हुआ था तो हल और दानेदार चक्र उसका प्रतीक था । निस्सन्देह कल्हण ने लांगलध्वज शब्द का यहाँ प्रयोग किया है । उसका अर्थ जैसा ऊपर लिखा गया है ध्वजा पर अंकित किंवा बना हल प्रतीक है । वृषभध्वज शिव के समान उनका भी नाम हल प्रतीक के कारण लांगलध्वज पड़ गया । पाठभेद : श्लोक संख्या ६२ में 'वरणस्रग्' का पाठभेद 'किं जयस्रग्, मिलता है ।