राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
तयोस्तुल्यौजसोर्युद्धे चिराय करवर्तिनी । मम्लौ विजयसंदेहे वरणस्रग्जयश्रियः ॥ ६२ ॥ ६२. दोनों तुल्य बलशाली योद्धाओं के संघर्ष से विजय सन्देहात्मक हो गया और विजय देवी के करपल्लवों की वैजयन्ती अधिक समय तक हाथ में रहने के कारण म्लान हो गयी ।
बलराम सर्वदा नील वस्त्र धारण करते थे । कमल की माला पहनते थे । गदा युद्ध में अत्यन्त प्रवीण थे । जरासंध वध निमित्त तपस्या द्वारा 'संयर्तक' नामक हल तथा 'सौनन्द' नामक मूसल प्राप्त किया था । महाभारत के युद्ध में यह किसी पक्ष से भाग नहीं लिये थे । पाञ्चरात्र शास्त्रों के अनुसार बलभद्र भगवान् वासुदेव के व्यूह किंवा रूप हैं । शुंग कालीन बलराम की मूर्तियाँ मिली हैं । बलराम शेष के अवतार माने गये हैं । अतएव उनकी मूर्तियों के पृष्ठ भाग में शेष की मूर्तियाँ किंवा आभोग बना दिखाया रहता है । मूर्तियाँ हल, मूसल, युक्त कहीं द्विभुज और कहीं चतुर्भुज मिलती हैं । उनके कर्णों में एक ही कुण्डल कहीं कहीं दिखाया गया है । एक कुण्डलवारी होना 'बृहत्संहिता' द्वारा समर्थित है । कुषाण तथा गुप्त कालीन बलराम की मूर्तियाँ सिंह कुण्डल युक्त दिखायी गयी हैं । बलराम का विवाह रेवत की कन्या रेवती से हुआ था । बूमरँग तथा हल - आस्ट्रेलिया के भ्रमण काल में (स० १९५०) मैने बूमरेंग का चलाना देखा था । बूमरेंग का रूप हलसदृश हो जाता है यदि उसके हरीस का लम्बा भाग छोटा कर दिया जाय । बलराम ने तपस्या द्वारा यह शस्त्र पाया था । अतएव यह अस्त्र वास्तव में हलाकार रहा होगा । आस्ट्रेलिया के संग्रहालय में मैने एक प्राचीन गणेश की मूर्ति भी देखी थी । उसी समय मैने सोचा था कि कभी आस्ट्रेलिया और भारत से निकट का सम्बन्ध था जो भारतीय पराधीनता के कारण टूट गया । यह एक कल्पना मात्र है । यदि यह शस्त्र था तो तो वह बूमरेंग की तरह ही रहा होगा कि आजकल के बड़े हल के समान जिसका उठाना और चलाना कठिन है ।। (विशेष द्रष्टव्य 'आस्ट्रेलिया' काशी) लांगलध्वज, वृषभध्वज, हनुमानध्वज, गरुड- ध्वज आदि झण्डो पर लगे चिह्न को भी कहते हैं । बलराम के ध्वज पर लांगल अर्थात् हल का चिह्न अंकित रहा होगा अतएव उन्हें लांगलध्वज कहा गया है । पुराण से प्रकट होता है । यादव सेना अल्प संख्या में थी । तथापि बलराम तथा श्री कृष्ण के रण चातुरी एवं वीरता के कारण रण में विजय प्राप्त की थी । (हरिवंश पु० २ : ३६) श्री रणजोत सीताराम पण्डित इस श्लोक की टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि बलराम सर्व साधारण जनता में से उठे थे । उन्होंने हल को जो परिश्रम- शील जनता का प्रतीक था अपना प्रतीक बनाया । बलराम श्री कृष्ण के भाई थे । राजवंशी थे । राजपुत्र थे । कुलीन थे । मथुरा राज्य का अधिकार प्राप्त किया था । तत्कालीन कुलीनों ने तुल्य राज्य में भाग लिया था । हल कृषक वर्ग का निश्चय प्रतीक हो सकता है परन्तु समस्त जनता का नहीं हो सकता । सन् १९४८ में कृषक मजदूर प्रजा दल का संघटन हुआ था तो हल और दानेदार चक्र उसका प्रतीक था । निस्सन्देह कल्हण ने लांगलध्वज शब्द का यहाँ प्रयोग किया है । उसका अर्थ जैसा ऊपर लिखा गया है ध्वजा पर अंकित किंवा बना हल प्रतीक है । वृषभध्वज शिव के समान उनका भी नाम हल प्रतीक के कारण लांगलध्वज पड़ गया । पाठभेद : श्लोक संख्या ६२ में 'वरणस्रग्' का पाठभेद 'किं जयस्रग्, मिलता है ।
१०४ राजतरंगिणी अथ शस्त्रक्षतैरङ्गैरालिङ्ग्य रणाङ्कणे । भुवं काश्मीरको राजा यादवस्तु जयश्रियम् ॥ ६३ ॥ ६३. अन्ततः युद्धभूमि में दोनों योद्धाओं के अंग परस्पर प्रहार द्वारा आहत हो गये थे। काश्मीरराज ने सभर भूमि का आलिंगन किया और यादवराज का आलिंगन किया विजय ने । पादटिप्पणियाँ : ६२. प्रतीत होता है । दोनों योद्धा बलराम तथा गोनन्द समान बलशाली थे । यादव सेना पलायन- शील थी । उसमें बलराम के युद्ध में जमने के कारण नव शक्ति आ गयी थी । बलराम तथा गोनन्द का द्वन्द्व युद्ध बहुत समय तक चलता रहा । इस युद्ध वर्णन से यह मालूम होता है कि प्रथम बलभद्र ने जरासंध पर आक्रमण किया था । वह दक्षिणी मोर्चा पर था । बलराम के द्वारा जरासंध का वध सम्भव नही था। अतएव वह पश्चिमी मोर्चा पर आक्रमण किया, जहाँ कश्मीरी वाहिनी राजा गोनन्द के नेतृत्व में युद्ध निमित्त सन्नद्ध थी । विजयमाला को वैजयन्ती कहते है। हाथियों के दांतो पर माला भारतीय स्थापत्यों में लगी दिखायी पड़ती है । यह माला गाथानुसार हाथी किसी व्यक्ति के गले में डाल देता था। वह व्यक्ति राजा चुन लिया जाता था । राजा चुनने की यह अत्यन्त प्राचीन प्रथा है । नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन एवं केन्द्रीय मन्त्रालय के भवनो पर हाथी के मस्तक के बिना ही दातों पर माला लिपटा पत्थरों में खोदकर दिखाया गया है । पाठभेद : श्लोक संख्या ६३ में 'काश्मीरको' का पाठभेद कश्मीरको' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ६३. नीलमत पुराण गोनन्द के पराजय का कारण देता है — 'राजा गोनन्द ने नील मुनि द्वारा निर्धा- रित कुछ अनुशासनो का पालन नहीं किया था अत- एव मथुरा में बलभद्र द्वारा पराजित हो गया था । यदि कश्मीर के राजा नील द्वारा निश्चित आदेशो का पालन करेंगे तो उनकी अकाल मृत्यु नहीं होगी । कश्मीर मण्डल में कभी भय उत्पन्न नहीं होगा ।' श्लोक संख्या ( ८७५,८७६ ) । वृष्णि अर्थात् यादव सेना ने निस्सन्देह विजय पायी थी । कश्मीरराज ने वीर गति पायी । किन्तु जरासंध जीवित रहा । अपनी शेष सेना के साथ मगध लौट गया । इस युद्ध पर महापुराणों तथा महाभारत के आधार पर और विशेष लिखना अप्रा- संगिक होगा । इस युद्ध के बीस वर्ष पश्चात् महाभारत का युद्ध हुआ था । गिरिव्रज में जरासंध तथा भीम का गदा युद्ध प्रारम्भ में प्रारम्भ हुआ । यह युद्ध कातिक शुक्ल को प्रारम्भ हुआ था । गदा टूट जाने पर मल्ल युद्ध हुआ । यह युद्ध महाभारत सभा पर्व ( २१.१७,१८ ) के अनुसार १४ दिन, पद्मपुराण ( उ० २७९ ) के अनुसार २५ दिन, भागवत ( १०:७२ ) के अनु- सार ४० दिनों तक चलता रहा । जरासंध को भीम ने बीच से चीर दिया था । संधि खुल गयी । जिस रूप में वह जन्मा था उसी रूप में मर गया । आइने अकबरी में अबुल फजल शोगन्द का नाम भोगनन्द देता है। वह कहता है—कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम द्वारा गोनन्द मारा गया । वह मेहतरा ( मथुरा ) तथा ( बिहार ) के राजा जरासंध के बीच हुआ था । हसन गोनन्द को आदि गोनन्द कहता है । गोनन्द के वंश के विषय में वह लिखता है—इस राजा ने अराकीने सल्तनत की मरजी से सन् कल जुग की इब्तदा से बीस साल पेस्तर तख्त कश्मीर पर जलवागिरी फरमाई । बाज मुवर्रखों के नजदीक
प्रथम तरंग १०५ गतिं प्रवीरसुलभां तस्मिन्सुक्षत्रिये गते । श्रीमान्दामोदरो नाम तत्सूनुरभृत क्षितिम् ॥ ६४ ॥ ६४. जब उस सुक्षत्रिय ने प्रवीर सुलभ गति¹ प्राप्त कर ली तो उसका यशस्वी पुत्र श्रीमान् दामोदर क्षिति की रक्षा में तत्पर हुआ । भोगयोगोर्जितं राज्यं प्राप्नवानपि भूपतिः । ध्यायन्पितृवधं मानी नोपलेमे स निर्वृतिम् ॥ ६५ ॥ ६५. यद्यपि उस भूपति ने भोग सम्पत्ति सम्पन्न राज्य अर्जित किया था तथापि पितृ वध का ध्यान उदय होते ही उस मानी को शान्ति दुर्लभ हो जाती थी ।
[बायाँ स्तम्भ / Left Column] यह भी राजा जम्मू के खान्दान में था । मौर याज ने इसे मथुरा का पोता ख्याल किया है । उसने हकूमत का नज्म व नस्ल निहायत खूबी से सरंजाम दिया । उन दिनों हिन्दुस्तान में जरासन्ध राजा की हकूमत को उसने श्रीकृष्ण जी महाराज के साथ विनाय मुखासवत डाली हुई थी । राजा आदि गोनन्द अपनी करीबी रिस्तादारी के पेश नज़र एक बड़ी भारी फौज कश्मीर से लेकर राजा जरा- सन्ध की मदद को रवाना हुआ । अपना लाव लश्कर लेकर उनके साथ मसरूफ पैकार था । दरया जमुना के किनारे फरीकों की फौजों के माबैन में बड़ा भारी रण पड़ा । आखिर में किसी वजह से राजा आदि गोनन्द की फौज में भगदड़ पड़ गयी । खुद राजा मजकूर साबित कदम रहा । और दाद सुजाअत देता हुआ बलभद्र जी बिरादर श्री कृष्ण जी महाराज के हाथों मैदान कार ज़ार से काम आया । मुद्दत हकूमत सत्तरह साल ।' हरिवंश पुराण विष्णु पर्व ४१:२८ में स्पष्ट उल्लेख है कि अन्य राजाओं के साथ कश्मीर राजा ने जरासन्ध का पक्ष लेकर मथुरा पर आक्रमण कर कृष्ण से युद्ध किया था । मद्रः कलिंगाधिपतिश्चेकितानश्च बाह्निकः । कश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा ॥ पादटिप्पणियाँ : ६४ (१) गति : कल्हण यहाँ पर भारतीय वीर परम्परा की ओर संकेत करता है। क्षत्रियों को स्वर्ग १४
[दायाँ स्तम्भ / Right Column] प्राप्ति युद्ध स्थल में होती है । प्रासादों में बैठकर जीवन व्यतीत करना और मर जाना यह क्षत्रियों किंवा आयुधधारियों का कभी भारतवर्ष में आदर्श नही रहा और न इस प्रकार के जीवन को भारतीय कभी अच्छा मानते थे । विजय दशमी के दिन अर्थात् चातुर्मास के पश्चात् विजय यात्रा का मुहूर्त माना जाता था । इस दिन प्रतापी राजा विजय यात्रा निमित्त निकलते थे । सन् १९४७ के पूर्व प्रायः सभी भारतीय राजाओं के यहाँ सुसज्जित सेना प्रयाण करती थी । अस्त्र-शस्त्र की पूजा होती थी । समरांगण में वीर गति प्राप्त करने से बढ़कर क्षत्रियों के लिये और कोई श्लाघनीय मृत्यु नहीं मानी जाती थी । ६५. जरासंघ मगध का सम्राट् था । उसके पुत्र का नाम सहदेव था । उसकी दो कन्याएँ अस्ति तथा प्राप्ति का विवाह मथुरा के राजा कंस के साथ हुआ था । महाभारत में कहा गया है कि जरासंघ ने सम्राट् का पद प्राप्त किया था । चेदि का राजा शिशुपाल उसका सर्वप्रधान सेनाध्यक्ष था । जरासंघ एक संघ का सम्राट् था । महाभारत में प्रमाण मिलता है कि बहुत से राजा मिलकर एक सम्राट् का निर्वाचन करते थे । उसे उस पद पर अभिषिक्त करते थे । राजाओ ने एकता की दृष्टि से यह प्रथा चलाई थी । जरासंघ ने मालूम होता है सम्राट् होने पर इस सिद्धान्त की अवहेलना की थी । (सभापर्व अ० १८; आदिपर्व अ० १०० : ७) मथुरा का बड़ा महत्त्वपूर्ण इतिहास है । रामायण,
१०६ राजतरङ्गिणी अथोपसिन्धु गान्धारैः सञ्जे कन्यास्वयंवरे । निमन्त्र्य शुश्रावाऽऽनीतान् वृष्णीन् दर्पोष्णदोर्द्रुमः ॥ ६६ ॥ ६६. जिसकी भुजाएँ वृक्ष तुल्य शक्तिशाली थी। जो दर्प की गर्मी से गर्वित था, उस राजा ने सुना- सिन्धुतट पर गान्धारों १ ने कन्या स्वयंवर सज्जित कर वृष्णियों को विशेष रूप से आमन्त्रित किया था।
पुराण तथा महाभारत के आधार पर गाथा कहती हैं। मधु का पुत्र लवण था। लवण को परा- जित कर राम के कनिष्ठ भ्राता शत्रुघ्न ने मथुरा नगरी की स्थापना की थी। दानवों के आक्रमण के कारण वृष्णि तथा अन्धक लोगों ने मथुरा त्याग दिया। द्वारिका में आबाद हो गये। (हरिवंश पुराण विष्णु पर्व ३८.४०) कृष्ण द्वारा कंस का वध हुआ था। उसने समा- चार सुना कंस के पुत्र को शूरसेन का राजा घोषित किया। जरासंध ने मथुरा पर आक्रमण किया। इस कार्य के लिए उसकी दोनों विधवा पुत्रियाँ उसे प्रोत्साहित करती रहती थी। परन्तु जरासंध पराजित हुआ। उसने १७ बार मथुरा पर आक्रमण किया था। (हरिवंश पुराण ३७.४४)। उसकी सहायता हिमालय के पर्वतीय चेकितान, बाह्लीक, कश्मीर, करूष, किन्नर, दरद आदि राजाओं ने की थी। पुराण इस बात का समर्थन करते हैं। जरासंध तथा कृष्ण का युद्ध हुआ था। उसकी सहायता पर्वतीय राजाओं ने की थी। गोनन्द का जरासंध की सहायता निमित्त आना असम्भव नहीं प्रतीत होता। पुराणों ने भी इसकी पुष्टि होती है। श्रीकृष्ण, भीम तथा अर्जुन ने मिलकर काला- न्तर में जरासंध को मारने के लिए योजना बनायी। ब्राह्मण वेश धारण कर उसके नगर में गये थे। भीम के साथ जरासंध का द्वन्द्व युद्ध हुआ। जरासंध शक्तिशाली प्रतीत हुआ। पर कृष्ण ने संकेत किया। भीम ने जरासंध का एक पैर अपने पैर के नीचे दबाकर दूसरा पैर उठाकर चीर दिया। इस प्रकार जरासंध का शरीर अपने पूर्व जन्मकालीन रूप दो शकलों में हो गया। शरीर की सन्धि छिन्न हो गयी। यह निर्विवाद है। जरासंध शक्तिशाली राजा था। उसका खुला सामना कर उसे पराजित करना सरल नहीं था। अतएव तत्कालीन युद्ध प्रचलित परम्परा तथा नीति का अतिक्रमण कर उसकी छल द्वारा हत्या की गयी। संभव है। कंस की हत्या के प्रश्न को लेकर विवाद खड़ा हुआ होगा। उसमें जरासंध का पक्ष न्यायोचित जानकर कश्मीर के राजा गोनन्द तथा भारत के अन्य राजाओं ने लिया होगा। कृष्ण के विरुद्ध उसकी सहायता किये होंगे। सम्राट् जरासंध की मृत्यु के पश्चात् मगध का साम्राज्य नष्ट हो गया। पाण्डवों का चक्रवर्ती राजा होना निष्कंटक हो गया। जरासंध वध महाभारत सभापर्व का एक अवान्तर पर्व है। अध्याय २०-२४ तक में वर्णन मिलेगा। (पुराण विष्णु : ४:१९.९९; भागवत : ९:२२:७- ८, १०.५०, १०:७२, १५-४६, हरिवंश : ३२.९६- ९६, ३७, वायु : ९९:२२५-२२६)
पाठभेद : श्लोक संख्या ६६ में 'शुश्रावा' का पाठभेद 'शुश्रुवा' तथा 'दर्पोष्ण' का 'दर्पोष्म' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : ६६. (१) गान्धार : गान्धार प्रदेश के उल्लेखों से भारतीय वाङ्मय भरा है। तक्षशिला से काबुल तक की भूमि गान्धार नाम से प्रख्यात थी। इसी प्रकार सिन्धु महानद से शतद्रु अर्थात् सतलज नदी के मध्यवर्ती भाग किंवा अन्तर्द्रोणी को बाह्लीक कहते थे। उसमें उशीनर, मद्र तथा त्रिगर्त के क्षेत्र सम्मिलित थे। गान्धार तथा बाह्लीक प्रदेशों का सम्मिलित नाम उदीच्य था। प्राच्य तथा उदीच्य की मध्यवर्ती सीमा दृषद्वती नदी थी। गान्धार का उल्लेख नीलमत पुराण में आता है :
प्रथम तरंग १०७ प्राचीन कपिशा नगरी अफगानिस्तान में थी। उसका वर्तमान नाम बेग्राम है। यहाँ कपिशा नामांकित शिलालेख प्राप्त हुए हैं। कपिशा के उत्तर कंबोज है। यह पामीर की मध्येशिया स्थित अधित्यका है। कम्बोज के पूर्व तारिम नदी है। उसी के समीप कुचा प्रदेश है। गान्धार से प्राच्य तक के क्षेत्र में पाणिनि काल में संस्कृत भाषा प्रचलित थी। गान्धार, कपिशा, बाह्लीक एवं कम्बोज महाजनपद पाणिनि काल में भारत के उत्तर पश्चिम में थे। कम्बोज काशगर के दक्षिण का प्रदेश था। हिन्दूकुश के दक्षिण पूर्व में गांधार, दक्षिण-पश्चिम में कपिशा, उत्तर-पश्चिम बाह्लीक तथा उत्तर-पूर्व में कंबोज जनपद थे। गांधार को यूनानियों ने 'गन्दराई' नाम दिया है। उस समय यह प्रदेश तक्षशिला से कुनड़ नदी तक विस्तृत था। पश्चिमी गांधार की राजधानी पुष्कलावती थी। उसका सम्बोधन यूनानियों ने 'पिउकलावती' से किया है। वह स्थान स्वात कायुल नदी का संगम स्थान वर्तमान चारसदा है। मार- कण्डेय पुराण (५७ : ३९) में 'पुष्कला' जनपद का उल्लेख आया है। दार्वाभिसार गन्धार जुहुण्डर शकान् रम्मान्। तङ्गणान् मान्द्रवान् भद्रांश्चन्तर्गिरिर्बहिर्गीरीन् ॥ ४० : १२१, १२२ यह श्लोक नीलमत में किंचित् पाठभेद से पुनः मिलता है। दार्वाभिसार गान्धार जुहुण्डर शकाः खसाः । तंगणा माण्डवाश्चैव अन्तर्गिरिबहिर्गिरिः ॥ १३९ : १८२, १८३ गान्धार का एक नाग रूप से वर्णन मिलता है। उरुचः श्रोकणो वायुः शुको वैश्रवणो यमः । मण्डूकनासो गान्धारो नागः क्षूर्पारकिष्वनिः ॥ ४९४ : १०६४ गांधार देश के राजा आरब्ध का नाम भागवत पुराण मे, सेतुपुत्र का नाम विष्णु पुराण मे, शरद्वान का नाम वायु पुराण मे आया है। शकुनी भी गांधार के राजा थे। शकुनी दुर्योधन के मामा तथा महा- भारत युद्ध में शल्य के पश्चात् कौरव सेना के सेनापति हुए थे। गान्धार राज : शकुनी : पर्वतीय : उद्योग पर्व ३० : २७ मे उल्लेख मिलता है। गान्धार का राजा दुर्योधन का मामा शकुनी था। गान्धार के एक नग्नजित् राजा का एतरेय ब्राह्मण (७ : ३४) में उल्लेख आता है। उससे सोमविषयक ज्ञान प्राप्त हुआ था। सुबल राजा की कन्या गान्धारी थी। वह धृतराष्ट्र की पत्नी तथा दुर्योधन की माँ थी। गान्धारी किल पुत्राणां शतं लेभे वरं शुभा। इति शुश्राव तत्त्वेन भीष्मः कुरुपितामहः ॥ आदिपर्व : १०९ : ११ ततो गान्धारराजस्य प्रेषयामास भारत। अच्छन्निरिति सम्प्राप्तीन् सुबलस्य विचारणा ॥ ११० : १२ गान्धार-जातक तथा कुम्भकार जातक तथा बौद्धधर्म-ग्रन्थों में गान्धार का विशेष उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद १:२२६:७ तथा अथर्व वेद ५ २२.१४ में गांधार का उल्लेख आया है। इससे स्पष्ट है कि वैदिक काल से गान्धार का ऐतिहासिक महत्त्व था। इसकी प्रसिद्धि थी। वाल्मीकि रामायण में बाह्लीक, कम्बोज, दरद, चीन आदि हिमालय के पर्वतीय जनपद कह गये हैं। गान्धार का स्पष्ट उल्लेख रामायण में नहीं किया गया है। सम्भव है कि उस समय गाधार कम्बोज, शक, बाह्लीक, आदि क्षेत्रों के अन्तर्गत समझा जाता रहा होगा अन्यथा रामायण उसका उल्लेख करने में न चुकता। तत्र म्लेच्छान् पुलिंदांश्च, शूरसेनांस्तथैव च। प्रस्थलान् भरताँश्चैव कुरूंश्च सह मद्रकैः ॥ काम्बोजानथयवनांश्चैव शकानारट्टकानपि। बाह्लीकानुपिकांश्चैव पौरवानथ टंकणान् ॥
१०८ राजतरंगिणी ततस्तस्यातिसंरम्भात् तानदूरस्थितान् प्रति । यात्राऽभूद् ध्वजिनीवाजिरेणुग्रस्तनभस्तला ॥ ६७ ॥ ६७. वृष्णि जब बहुत दूर नहीं रह गये थे तो क्रोध जर्जरित राजा ने सवेग उनके विरुद्ध इस प्रकार अभियान किया कि उसके अश्वारोही दल के टापों की उड़ी धूल से आकाश भर गया ।
चीनान्यपरचीनांश्च नीहारांश्च पुनः पुनः । अन्विष्य दरदांश्च हिमवन्तम् तथैव च ॥ —वाल्मीकि रामायण अरण्य काण्ड ४३ : १०, १२ बौद्ध ग्रन्थों में गान्धार जनपद का उल्लेख अनेक स्थलों पर आया है । मोग्गलिपुत्त स्थविर ने तृतीय संगीति को समाप्त कर मध्यात्मिक स्थावर को कश्मीर तथा गांधार राष्ट्र में धर्म प्रचारार्थ भेजा । गान्धार जनपद की राजधानी तक्षशिला थी । प्राचीन काल में पुक्कुसाति वहाँ का राजा था । बुद्ध भारत का प्रधान शिक्षा तथा व्यापारिक केन्द्र था । तक्षशिला में बौद्ध विद्वान् जीवक, बन्धुल मल्ल, प्रसेनजित्, महालि आदि की शिक्षा हुई थी । पाठभेद : श्लोक सङ्ख्या ६७ में 'संरम्भात्' का पाठभेद 'संभारात्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ६७ (१) ध्वजिनी का अर्थ होता है ध्वजाधारी दल आज से डेढ़ शताब्दी पूर्व तक सेना में अश्वा- रोही ध्वजाधारी होते थे । वे सेना के आगे चलते थे । ध्वजा की रक्षा करना सैनिको का परम कर्तव्य होता था । ध्वजा पकड़ जाने पर एक प्रकार से हार मानी जाती थी । मानी सेनानायक पराजय के समय या आत्मसमर्पण के समय ध्वजा स्वयं नष्ट या भग्न कर देते थे ताकि वह शत्रु के हाथों में पड़ कर अपमानित न की जा सके । सिख ध्वजा को इतना महत्त्व देते हैं कि उसकी पूजा करते हैं । प्रत्येक गुरु-द्वारा पर उसे ससम्मान स्थापित किया जाता है । हनुमान जयन्ती कात्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमान जी की पूजा होती है । उस दिन नवीन ध्वजा तैयार की जाती है। उसकी विधिवत् पूजा होती है । झण्डाभिवादन सैनिक समारोह का एक विशेष महत्वपूर्ण संस्कार है । ध्वजा देश के गौरव का प्रतीक माना जाता है । २. कृष्ण दामोदर युद्ध : नीलमत पुराण (श्लोक स० ६) में मिलता है । कल्हण ने यह प्रसंग नीलमत पुराण से लिया है । नीलमत पुराण इस प्रश्न से यह विषय आरम्भ करता है । क्या कारण है। महाभारत के युद्ध में भारत के सभी राजाओं ने भाग लिया था । काश्मीरराज राजाओं की तालिका में दिखायी नहीं पड़ते । उसका उत्तर नीलमत देता है । कश्मीर राजा शिशु थे । इसलिये कश्मीर राजा और कश्मीर की सेना महाभारत युद्ध में भाग नहीं ले सकी । मथुरा युद्ध में गोनन्द प्रथम ने वीर गति प्राप्त की । केवल शिशु गोनन्द उस समय देवी यशो- वती के गर्भ में था । वह उत्पन्न हुआ । शिशु था । महाभारत मथुरा युद्ध के केवल बीस वर्ष पश्चात् हुआ था । इस काल में दामोदर राजा था । उसके वीर गति प्राप्त करने पर शिशु गोनन्द द्वितीय राजा हुआ । नीलमत पुराण (श्लोक सं० ६) में स्पष्ट उल्लेख है कि माधव अर्थात् श्रीकृष्ण से युद्धार्थ दामोदर चतुरंगिणी सेना के साथ अभियान किया था । यादव सेना श्रीकृष्ण सहित स्वयंवर निमित्त गान्धार जा रही थी । नीलमत ( श्लोक संख्या ७ ) में स्पष्ट प्रकट होता है कि दोनों राजाओं में युद्ध हुआ और राजा दामोदर वीर गति प्राप्त किया । जनमेजय ने वैशम्पायन से पूछा : महाभारतमंग्रामे नानादेश्या नराधिपाः । महाशूराः समायाताः शिन्तां मे महात्मनाम् ॥ ३:३
प्रथम तरंग १०९ तदाहवे विवाहोत्का विष्ण्यन्ते स्म पतिंवरा । आसोत्तद्युपुरन्ध्रीणां गान्धारेषु स्वयंवरः ॥ ६८ ॥ ६८. समरांगण में जब विवाहोत्सुक गान्धारकन्याएँ पति वरण निमित्त उदास होने लगीं तो उसी समय स्वर्ग रमणियों १ युद्ध स्थल में वीरों का स्वयं स्वयंवर करने लगीं । कथं कश्मीरको राजा नायातस्तत्र कीर्त्य । राजा कन्धार की लडकी की शादी का शोहरा दूर पाण्डवैर्धार्तराष्ट्रैश्च न द्यूतः स कथं नृप ॥ दराज के मुल्कों में फैल गया । बडे शान व शौकत 4 : 4 वाले राजे महाराजे उसके स्वयंवर में कन्धार काश्मीरमण्डलं चैव प्रधानं जगति स्थितम् ॥ हाजिर हो गये । श्रीकृष्ण जी ने भी किसी वजह से 5 : 5 इसमें शमूलियत जरूरी समझी । यह खबर सुनकर अथोपसिन्धुगान्धारविषयेऽभूत्स्वयंवरः । दामोदर जो अपने बाप के खून का प्यासा था एक यत्राहूताः समाजग्मु राजानो वीर्यशालिनः ॥ भारी फौज लेकर श्रीकृष्ण जी के मुकाबला के लिए 33 : २४ कन्धार रवाना हो गया । और साथ जंग व जदल तत्रागतं समाकर्ण्य वासुदेव स्वयंवरें । की बुनियाद डाली । राजा मजकूर श्रीकृष्ण के जगाम माधवं योद्धं चतुरंगलवान्वितः ॥ हाथों कतल हुआ । उसकी रानी जसोमती जो उन 6 : २५ दिनो हामला थी मशविरह श्रीकृष्णजी महाराज तत्र तस्याऽभवद्युद्धं वासुदेवेन धीमता । अपने खाविन्द की जानशीन हुई । मुद्दत हकूमत यादृशं वासुदेवस्य नरकेन सहाऽभवत् ॥ १३ साल । 7 : २६ पाठभेद : श्लोक संख्या ६८ में 'विष्ण्यन्ते' का 'विघ्नन्ति' ततः स वासुदेवेन सुयुद्दे विनिपातः ॥ तथा 'सोत्तु' का 'आसीत्त' पाठभेद मिलता है । 8 : २७ पादटिप्पणियाँ : अन्तर्वत्नीं तस्य पत्नीं वासुदेवोऽभ्यषेचयत् । ६८(१) यह एक प्राचीन गाथा है । आर्य जाति भविष्यत्पुत्रराज्यार्थं तस्य देशस्य गौरवात् ॥ में प्राचीन काल से पायी जाती है । सुरवालाएँ रण- 9 : २७-२८ स्थल में वीर योद्धाओंका वीर गति प्राप्त करने नीलमत पुराण में नाम बालगोनंद दिया पर वरण करती थीं । हिन्दू परम्परा के गया है । अनुसार वीर गति प्राप्त योद्धा स्वर्ग जाता है । अतः सा सुषुवे पुत्रं बालगोनन्द संज्ञिनम् । अतएव उसे वरण करने के लिए स्वर्ग की बालाएं वालभावात् पाण्डुसुतैर्नानीतः कौरवेनं वा ॥ उत्सुक रहती है । कल्हण इस ओर संकेत करता है । 10 : २८-२९ यूरोप मे स्केण्डेनेवियन गाथा के अनुसार युद्ध हसन लिखता है-'बाप के इन्तकाल के बाद व भूमि में वीर गति प्राप्त वीर को लेने के लिये रथों मशविरह अशकोन सलतन सन कलयुग से तोन साल पर सुरवालाएँ आती थी । उन्हें साथ लेकर स्वर्ग पहले यह शख्स तख्त हकूमत पर बैठा । रैयत को जाती थीं । अदल व अहसान के जरिए गुलाम बनाकर अक्सर उक्त पद का प्रथम आधा पद विरोधाभास व बेशतर राजे अपने मुतईम बनाये । इन्हीं दिनों प्रकट करता है ।
११० राजतरंगिणी तदाऽऽक्रान्तासुहृच्चक्रः स चक्रायुधसङ्गरे । चक्रधाराऽध्वना घोरश्चक्रवर्ती दिवं ययौ ॥ ६९ ॥ ६९. तब वह चक्रवर्ती राजा शत्रुओं की चक्र पंक्ति द्वारा परावृत चक्रधर के चक्रधारपथ गति-द्वारा उस समरांगण में गमन किया । अन्तर्वत्नीं तस्य पत्नीं तदा यदुकुलोद्भवः । राज्ये यशोवतीं नाम द्विजैः कृष्णोऽभ्यषेचयत् ॥ ७० ॥ ७०. यदु कुलोद्भव श्री कृष्ण ने दामोदर की गर्भवती पत्नी यशोवती देवी का द्विजों से अभिषेक करा दिया ।
पाठभेद : श्लोक संख्या ६९ मे 'तदा' का 'तत्रा', 'सचक्रा' का 'सश्चक्रा' तथा 'राघ्वना' का 'राघुना', राधना, 'राध्यना' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ६९ (१) चक्रधर से यहाँ अर्थ श्री कृष्ण से है। वह यादव सेना सहित गान्धार में स्वयंवर मे भाग लेने जा रहे थे। मार्ग में दामोदर ने कश्मीरी सेना के साथ उनपर आक्रमण किया । युद्ध में दामोदर का वध श्रीकृष्ण के चक्र द्वारा हुआ था। पिता का ज्येष्ठ भ्राता बलराम ने तथा पुत्र का कनिष्ठ भ्राता श्री कृष्ण ने वध किया था । 'चक्रधाराध्वना' शब्द क्षेत्र प्रिय है। कश्मीर के पंडितो को श्री स्टीन के शब्दो में यह वाक्य बहुत प्रिय था । इसका सरल अर्थ होता है। 'चक्रधार पथ' से दामोदर दिवंगत हुआ ओर स्वर्ग गया था। यह वाक्य 'चक्रधर. कृष्णः एव पन्थास्तेन' भी स्टीन के मत में हो सकता है । उस समय अर्थ हो जायगा 'श्रीकृष्ण चक्रधर द्वारा मार्ग खोला गया'। कल्हण की कल्पना यह भी हो सकती है कि भग- वान् कृष्ण द्वारा आहत होने पर दामोदर निश्चय ही स्वर्ग गया । पाठभेद : श्लोक संख्या ७० में 'यशोवती' का 'यशोवन्ती' तथा 'षेचयत्' का पाठभेद 'सूचयत्' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ : ७०(१) यशोमती : नीलमत पुराण में रानी का नाम यशोमती नहीं दिया गया है। उक्त श्लोक स० २७ में 'तस्य पत्नी' अर्थात् 'उसकी पत्नी' शब्द ही का उल्लेख है। अन्तर्वत्नीं तस्य पत्नीं वासुदेवोऽभ्यषेचयत् । भविष्यत्पुत्रराज्यार्थं तस्य देशस्य गौरवात् ॥ ९ : २७ कल्हण ने यशोमती का नाम किसी अन्य पूर्व ऐतिहासिक ग्रन्थ से लिया है। कल्हण ने रा० त० १ : ७३ तथा ८ : ३४०८ में यशोमती के नाम का स्पष्ट उल्लेख किया है। यह राजा दामोदर की पत्नी थी । ह्युगन के अनुसार-'राना सन् १० क० मे तख्त सल्तनत पर बैठी। बादशाहों के काम मर्दों की तरह इन्तहाई बहादुरी और खुश असलूबो से अंजाम दिये। पहले मालूम हो चुका है कि यह अपने खाविन्द राजा दामोदर से हामिला थी । इसलिए मुकर्रर वक्त गुजरने पर बाल गोतन्द इससे पैदा हुआ। मुद्दत हकूमत १५ साल ।' (२) गर्भवती का अभिषेक : भगवान् के मंत्री गर्भवती रानी यशोमती के अभिषेक से प्रसन्न नही थे । भगवान् ने इसको शंकाओ का समाधान पौरा- णिक प्रमाणों का उद्धरण देकर कर किया था । यह विषय हिन्दू उत्तराधिकार के मौलिक प्रश्न को उठाता है। प्रचलित हिन्दू कानून के अनुसार
प्रथम तरंग १११ तस्मिन्काले स्वसचिवान् सासूयानिन्यवोवरत् । इमं पौराणिकं श्लोकमुदीर्य मधुसूदनः ॥ ७१ ॥ ७१. मधुसूदन१ के सचिव गण स्पृहणीयता से भुनभुना रहे थे, उस समय भगवान् ने निम्नलिखित पुराण२ पद का उल्लेख कर उन्हें शान्त किया। “कश्मीराः पार्वती तत्र राजा ज्ञेयः शिवांशजः । नावज्ञेयः स दुष्टोऽपि विदुषा भूतिमिच्छता ॥” ७२ ॥ ७२. काश्मीर१ की भूमि पार्वती है। वहाँ का राजा हर२ का अंश है। कल्याणેચ્છुक विज्ञ जनो के लिये वह दुष्ट होने पर भी अवज्ञा का पात्र नहीं है। गर्भधारण के समय से ही गर्भ स्थित सन्तान का उसी माता-पिता अथवा जहाँ भी कही उसके उत्तरा- धिकार का हक मिलता है अथवा उत्तराधिकार मिलने वाला होता है—(नरवाडवरशिप ) विधि के अनुसार उसे अधिकार प्राप्त हो जाता है। सम्भव है कि विधवा का अभिषेक तत्कालीन प्रचलित विधि तथा संहिताओं व आचारों के विरुद्ध रहा हो। भगवान् श्रीकृष्ण का कार्य विधि तथा धर्म सम्मत दोनों था। भगवान् ने माता के गर्भ में स्थित पुत्र का अभिषेक किया था। ऐसी स्थिति में प्रश्न नही उठता कि स्त्री विधवा है अथवा सधवा। सम्भव है कि भगवान् ने उस अनुचित प्रचलित रूढि पर अपने इस कार्य द्वारा आघात किया हो, जिसमें विधवा को अशुभ मान लिया जाता है। भगवान् ने पुराण का उल्लेख-'कश्मीर पार्वती तुल्य है। वहाँ का राजा हरांशज किंवा शिव का अंश है' इस प्राचीन स्मृति का प्रमाण देकर तथा स्त्री का सम्मान कर पुरानी स्मृति पर अपनी मुहर लगायी है । उसे राज्य कार्य के योग्य तथा सिंहासन को अधिकारिणी, अपने अधिकार से नही सही पुत्र के संरक्षक के अधिकार के कारण माना है। पाठभेद : श्लोक संख्या ७१ मे 'वोवरत्' का पाठभेद 'वारयत्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ७१ (१) मधुसूदन विष्णु का नाम है। यहाँ पर श्रीकृष्ण के लिये आया है। मधु तथा कैटभ दो राक्षस थे। उन्हें एक साथ "मधु-कैटभ" नाम से पुकारा जाना है। मधु की त्वचा कोमल थी। इसलिये उसका नाम मधु पडा था। गाथा है कि भगवान् के नाभि कमल पर दो जल बिन्दु गिरे थे। वे रजोगुण तथा तमोगुण के प्रतीक थे। भगवान् ने उन बूँदो की तरफ देखा। एक मधु तथा दूसरा कैटभ हो गया (मेरु शान्ति पर्व . ३५५-२२-२३ ) एक और गाथा है। उनकी उत्पत्ति भगवान् विष्णु के कान के मैल से हुई थी। (दे० भा० १ ४)। पद्म पुराण (मृ : ४०) के अनुसार ब्रह्मा के तमो- गुण से इनकी उत्पत्ति हुई थी। कालान्तर में दोनो आततायी राक्षस हो गये थे। ब्रह्मा के सुझाव पर विष्णु ने उनका वध किया था। अतएव उनका नाम 'मधुसूदन' पड गया। (म० शा० २०० : १४-१६) (२) पुराण : कल्हण ने पुराण का नाम नही दिया है। नीलमत में यह श्लोक मिलता है परन्तु शब्दावली मे किंचित् भेद है। कल्हण ने पुराण शब्द का प्रयोग प्रायः नीलमत पुराण के लिये किया है। उसने बहुत कुछ ऐतिहासिक सामग्री नील मत पुराण से ली है। पाठभेद : श्लोक संख्या ७२ मे 'कश्मीरा;' का पाठभेद 'काश्मीरा:' मिलता है। पादटिप्पणियां : ७२ (१) नीलमत पुराण मे यह श्लोक निम्न लिखित रूप में मिलता है।
११२ राजतरंगिणी पुंसां निगौरँवा भोज्य इव याः स्त्रीजने दृशः । प्रजानां मातरं तास्तामपश्यन्देवतामिव ॥ ७३ ॥ ७३. मनुष्यों की जो दृष्टि स्त्री जनों को निगौरव एवं भोग्य पदार्थ समझती थी, वही उसे प्रजा की माता १ तथा देवी स्वरूप समझने लगी ! काश्मीरायां तथा राजा त्वया ज्ञेयो हरांशजः । तस्यावज्ञा न कर्तव्या मततं भूतिमिच्छता ॥ —237 : ३१४ लोक प्रकाश में श्लोक का उद्धरण निम्नलिखित रूप में दिया गया है । ‘सती च पार्वती ज्ञेया राजा ज्ञेयो हरांशजः ।’ जोनराज ने अपनी राजतरंगिणी में कल्हण के इस पद का उद्धरण दिया है । (२) हरांशज : यहाँ पर भगवान् ने 'देवाधि- राज' अर्थात् ‘डिवाइन राइट’ के सिद्धान्तकी ओर एक प्रकार से संकेत किया है । भारत में एक मत राजा को देवांश मानता है । यूरोप के मध्ययुग में तथा मुस्लिम खिलाफत काल में इस सिद्धान्त को मान्यता दी गयी थी । वर्तमान लोकतंत्र इस सिद्धान्त को मान्यता को समाप्त कर पश्चिम में उदय हुए हैं । भगवान् श्रीकृष्ण ने कश्मीर मण्डल को पार्वती का रूप माना है । समर्थन में एक प्राचीन उद्धरण दिया है । राजा को हरांशज कहा है । कश्मीर मण्डल तथा राजा दोनों को इस प्रकार मान्यता देकर पवित्र किया है । उसे दूसरे शब्दों में कह सकते है । कश्मीर भूमि यदि मातृ भूमि है, तो यहाँ का राजा पिता है । यह अनुपमेय उपमा भगवान् ने अनोखे ढंग से दी है । भगवान् ने किस पुराण से उद्धरण दिया था । कल्हणने उसका उल्लेख नहीं किया है । किन्तु इस सिद्धान्त, भाव तथा शब्दावली की पुष्टि नीलमत पुराण के श्लोक से मिलती है । सम्भव है । नीलमत पुराण में यह श्लोक किसी अन्य पुराण से उद्धृत किया गया हो । अथवा उसका भाव ले लिया गया हो । कल्हण केवल पुराण शब्द का उल्लेख करता है । उसे नील- मत पुराण का ज्ञान था अतएव नीलमत शब्द का न लिखना अर्थपूर्ण है । यह तर्क सम्मत मालूम होता है । उसका अभिप्राय यहाँ नीलमत पुराण के अति- रिक्त किसी अन्य पुराण से नहीं था । ७३ (१) 'प्रजानां मातरम्': भगवान् ने यहाँ एक आदर्श सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है । कल्हण के श्लोक से ध्वनि निकलती है । पूर्व काल में स्त्री केवल भोग्य पदार्थ मानी जाती थी । उनका राज काज में विशेष हाथ नहीं था । रानी पर भी उनकी स्थिति में विशेष अन्तर नहीं आता था । भगवान् ने इस मत का खण्डन कर नवीनमत जगत् के सम्मुख रखा । राजा यदि देश का पिता है, तो रानी देश की माता है । राजतन्त्र में नागरिक होते हैं । उनकी लोकतन्त्रीय परम्परा के अनुसार स्वतन्त्र नागरिक की स्थिति नहीं होती अतएव यहाँ प्रजा की माता शब्द का प्रयोग किया गया है । यदि काश्मीर गणराज्य होता तो भगवान् निस्सन्देह राज- माता शब्द का प्रयोग न करते । भारत में राजमाता पद इसी समय से ऐति- हासिक तथ्य के साथ चलता मालूम होता है । आज भी भारत में रानी को राजमाता कहते हैं। यह उदात्त भावना थी, राजा-प्रजा में, रानी-प्रजा में, वात्सल्य भाव उत्पन्न करती है । संकेत करती है । राजा एवं रानी का कर्तव्य है । अपनी सन्तान तुल्य प्रजा का पालन करे । पृथ्वी को सर्वत्र स्त्री माना गया है । पृथ्वो माता, भारत माता, आदि शब्दों का व्यवहार किया गया है । पृथ्वी किंवा भूमि एक प्राचीन आख्यायिका के अनुसार राजा की पत्नी मानी गयी है । अतएव
प्रथम तरंग ११३ अथ वैजनने मासि सा देवी दिव्यलक्षणम् । निर्दग्धस्यान्यतरोरङ्कुरं सुषुवे सुतम् ॥ ७४ ॥ गोनन्द ७४. दग्ध वंश वृक्ष में अंकुर तुल्य उस देवी ने समय पर दिव्य लक्षणों १ में युक्त पुत्र प्रसव किया। तस्य राज्याभिषेकादिविधिभिः सह संभृता । द्विजेन्द्रैर्निर्वर्त्यन्त जातकर्मादिकाः क्रियाः ॥ ७५ ॥ ७५. द्विजेन्द्रों ने राज्याभिषेक १ के साथ जातकर्म तथा अन्य सम्बन्धित संस्कार विधिवत् कराया। पृथ्वी माता, भूमि माता आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है। मालूम होता है। भगवान् देवी यशोवती से प्रभावित थे। गर्भवती होने पर भी रानी अपने पति कश्मीरराज के साथ वृष्णियों के विरुद्ध गान्धार युद्ध में गयी थी। भगवान् ने उसका अभिषेक वहीं किया था। कोई प्रमाण नहीं मिलता। श्री कृष्ण कश्मीर में आये थे। कश्मीर भूमि पर यशोवती का अभिषेक किया था। गीता जैसे उदात्त दार्शनिक सिद्धान्तों के रचनाकार श्री कृष्ण से राजनीतिक सिद्धान्तों पर भी इसी प्रकार के विचारों को प्रकट करने की अपेक्षा की जा सकती है। कश्मीरराज को पराजित करने पर भी श्री- कृष्ण ने कश्मीर पर शासन नहीं किया। उसे लेने तक की कल्पना नहीं की। राज्य जिसका था, उसे लौटा दिया। दामोदर के पिता गोनन्द ने मथुरा में उनसे युद्ध किया था। वे वैर भाव भी भूल गये। उन्होंने उपनिवेश बनाने, साम्राज्य बनाने की कल्पना नहीं की। इस प्रकार के राजनीतिक उदात्त उदाहरण भारतवर्ष जैसे देश में ही सम्भव हो सकते हैं। ७४ (१) लक्षण : महापुरुषों तथा राजाओं में भारतीय ज्योतिष के अनुसार शरीर पर कुछ स्पष्ट चिह्न होते हैं। उनकी महत्ता, विशेषता के कारण उन लक्षणों में कमी किंवा अधिकता होती है। भगवान् रामचन्द्र में, कृष्ण में इस प्रकार के लक्षण थे। भगवान् बुद्ध में महापुरुषों के ३२ लक्षण थे। उनके अनुयायकों में कुछ लक्षणों के होने का उल्लेख मिलता है। ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक लक्षण का प्रभाव भिन्न-भिन्न होता है। ७५ (१) राज्याभिषेक : शिशु गर्भ से निकलते ही पूर्ण सत्ता सम्पन्न राजा हो गया। इस सिद्धान्त की ओर कल्हण संकेत करता है। भगवान् ने दिव्य दृष्टि द्वारा गर्भ का रहस्य जान लिया था। गर्भ में पुत्ररत्न स्थित है। अतएव यशोवती का अभिषेक गान्धार में किया था। पुत्र का जन्म होते ही यशोवती की सत्ता समाप्त हो गयी। पुत्र पूर्ण राजा हो गया। उसका अभि- षेक भगवान् ने गर्भ में ही कर दिया था। उत्तरा- धिकार के विवाद का प्रश्न नहीं उठता था। भगवान् ने एक विषम समस्या का अत्यन्त चतुराई के साथ समाधान किया था। किसी भी सम्बन्धी तथा गोत्री को किसी प्रकार के विवाद करने का अधिकार नहीं था। विजेता ने राज्य पुनः गर्भ स्थित उत्तराधिकारी को लौटा दिया था। यदि पुत्र न होता तो कम से कम कुछ मासों का समय यशोवती को इसलिये दिया कि देश में १५
११४ राजतरंगिणी स नरेन्द्रश्रिया सार्धं लब्धवान्बालभूपतिः। नाम गोनन्द इत्येवं नप्ता पैतामहं क्रमात् ॥ ७६ ॥ ७६. उस बाल भूपति ने राजश्री के साथ ही साथ समय पर अपने पितामह का नाम¹ गोनन्द भी प्राप्त किया। आस्तां बालस्य संनद्धे द्वे धात्र्यौ तस्य वृद्धये । एका पयःप्रस्रविणी मर्वसंपत्प्रसूः परा ॥ ७७ ॥ ७७. बालक के धार्धवयपरिचर्या निमित्त दो धात्रियों सन्नद्ध रहती थीं। एक पयःप्रस्रविणी धात्री तथा दूसरी सर्वसंपत्प्रसूता पृथ्वी थी। अराजकता रोककर, स्थिति सुदृढ़ कर ले। अपने विरोधियों का इस काल में कंटक शोधन करे। राजा के मन्त्री थे। उसकी सेना थी। उसकी अभिभाविका उसको मां थी। राजा की संरक्षिका थी। केवल माता यशोवती नहीं अपितु मन्त्रिमण्डल प्रत्येक कार्यों के लिए, राजकार्य के लिए, उत्तरदायी था। राजमाता यशोवती केवल अभिभाविका तथा संरक्षिका मात्र थी। वह कश्मीर मण्डल को विधि- पूर्वक राजा नहीं थी। उसका प्रत्येक कार्य मन्त्रि- मण्डल के मन्त्रणानुसार होना आवश्यक था। यशोवती को मन्त्रिमण्डल की मन्त्रणाओं को टालने किंवा मानने का अधिकार था या नहीं इस सूक्ष्म विवेचन पर कहीं प्रकाश नहीं डाला गया है। शिशु राजा के वयस्क होने तक यशोवती देवी का राज्यानुशासन एवं राज्य कार्यों के विषयों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण स्थान रहा होगा। पाठभेद : श्लोक संख्या ७६ में 'नरेन्द्र' का पाठभेद 'नगेन्द्र' तथा 'गोनन्द' का 'गोनर्द' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ७६ (१) नामकरण संस्कार : कश्मीर में प्रचलित संस्कार के अनुसार जातकर्म संस्कार के एक दिन पश्चात् नामकरण संस्कार अर्थात् शिशु का नाम रखा जाता है। कल्हण का वर्णन यहाँ पूर्ण प्रामाणिक तथा युक्ति संगत प्रतीत होता है। जरासन्ध के साथ मथुरा में गोनन्द सम्मिलित हुआ था। उस समय उसका पुत्र दामोदर युवक था। युवराज था। उसकी पत्नी यशोमती को कोई सन्तान नहीं थी। केवल एक सन्तान गर्भ में थी। भगवान् कृष्ण मथुरा युद्ध के पश्चात् गान्धार स्वयंवर में गये थे। युवक राजा दामोदर ने उनपर आक्रमण किया। पिता गोनन्द युद्ध में कृष्ण के भाई बलराम द्वारा तथा पुत्र दामोदर स्वयं कृष्ण द्वारा मारा गया था। इससे प्रकट होता है कि गोनन्द युद्ध करने योग्य था। वह वृद्ध नहीं था। उसका पुत्र दामोदर उनके साथ मथुरा सम्भवतः नही गया था। यदि वह गया होता तो शायद वह भी वही वीरगति प्राप्त करता। मालूम होता है कि मथुरा में जरासन्ध के आह्वान पर जाते समय गोनन्द अपने वयस्क पुत्र को कश्मीर की राज्य-व्यवस्था के लिए छोड़ गया था। दामोदर की अवस्था मैं समझता हूँ उस समय २० से २५ वर्ष की और गोनन्द की ५० वर्ष के भीतर रही होगी। यशोमती से एक ही सन्तान के वर्णन से सिद्ध होता है, कि यशोमती युवती मात्र थी। गोनन्द के मथुरा युद्ध में हत होने के कुछ ही समय पश्चात् दामोदर भगवान् कृष्ण से युद्धार्थ गान्धार गया होगा। यह बात राजतरंगिणी के ८२ वें श्लोक से और स्पष्ट हो जाती है कि बालक होने के कारण कौरव-पाण्डवों ने उसे युद्धार्थ आमन्त्रित नहीं किया था। बालक राजा द्वितीय गोनन्द की अवस्था महाभारत काल में कठिनता से तीन या चार
प्रथम तरंग १९५ तस्यावन्ध्यप्रसादत्वं रक्षन्तः पितृमन्त्रिणः । पार्श्वगेभ्यो ददुर्वित्तमनिमित्तस्मितेष्वपि ॥ ७८ ॥ ७८. उस बालक के अधरों पर अकारण स्मित रेखा देखकर उसके पिता के मन्त्रिगण उसकी प्रसन्नता¹ को सफल देखने की अभिलाषा से पार्षदों को पुरस्कार दिया करते थे । अबुद्ध्वाऽननुतिष्ठन्तस्तस्याव्यक्तं शिशोर्वचः । कृतागसमिवात्मानममन्यन्ताधिकारिणः ॥ ७९ ॥ ७९. अबोध शिशु की वाणी का आशय एवं आदेश समझने एवं पालन करने में असमर्थता का अनुभव कर वे मन्त्रीगण अपने को स्वयं अपराधी मानते थे । पितुः सिंहासनं तेन क्रामता बालभूभुजा । नोत्कण्ठा पादपीठस्य लम्बमानाङ्घ्रिणा हृता ॥ ८० ॥ ८०. पिता के सिंहासन¹ पर स्थित बालक नरेश का पद पादपीठ पर छोटा होने के कारण नहीं पहुँच पाता था अतएव स्पर्श सुख का उत्कण्ठी पादपीठ निराश हो जाता था । वर्ष की रही होगी । अर्थात् गान्धार युद्ध के ५ से १२ वर्ष पश्चात् ही महाभारत आरम्भ हो गया था । बाल्यकाल से मैं समझता हूँ ५ से १२ वर्ष की अवस्था का बोध होना चाहिए । पाठभेद : श्लोक संख्या ७७ में 'प्रस्रविणी' का पाठभेद 'प्रसविनी' मिलता है । श्लोक संख्या ७८ में 'ददु' का पाठभेद 'दधु' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ७८ (१) प्रसन्नता : राजा प्रसन्नता का प्रदर्शन कुछ देकर करता है । सेवक इसलिए उसे प्रसन्न रखने का सर्वदा प्रयास करते हैं । अप्रसन्न होने पर राजा का दण्ड स्वरूप उपरूप प्रकट होता है । जिसका अन्त किसी के दुःख किंवा दण्ड में होता है । किसी के कार्य से प्रसन्न होने पर राजा उसे पदवी, जागीर किंवा पुरस्कार देते हैं । शिशु अबोध था । वह किसी कार्य से प्रसन्न होता था । मुस्कुराता था । उसकी प्रसन्नता राजकीय परम्परानुसार व्यर्थ न हो, एतदर्थ मन्त्रिगण उस परम्परा को कायम रखने के लिये पुरस्कार देते थे । पाठभेद : श्लोक संख्या ७९ में 'अबुद्ध्वाऽननुतिष्ठन्तः' का पाठभेद 'अबुद्धमनुतिष्ठन्तः' मिलता है । श्लोक संख्या ८० में 'हृता' का पाठभेद 'कृता' तथा 'हता' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ८० (१) सिंहासन : इस श्लोक से कल्हण का मन्तव्य यह मालूम होता है कि शिशु राजा सिंहासन पर आसीन होता था । उसका पैर इतना छोटा था कि पादपीठ तक नहीं पहुँच सकता था । मन्त्रीगण शिशु के अबोध होने पर भी प्रतीक स्वरूप उसे सिंहासन पर बैठाते थे । ताकि सिंहासन सूना न रहे । वे राजा की ओर से राजकार्य करते थे । उसी प्रकार जैसे देवता के नाम से धर्मदाय भूमि सम्पत्ति तथा अन्य कार्यों का शासन तथा संचालन किया जाता है । मिलता है कि माधव अर्थात् श्री कृष्ण से युद्ध निमित्त दामोदर चतुरंगिणी सेना लेकर गया था । जिस समय यादव सेना स्वयंवर निमित्त गान्धार जा रही थी ।
११६ राजतरंगिणी तं चामरमरुल्लोलकाकपक्षमृपासने । विधाय मन्त्रिणोऽशृण्वन्प्रजानां धर्मसंशयम् ॥ ८१ ॥ ८१. चामर मरुत् द्वारा बालक के काकपक्ष उल्लोलित होते थे । उसे नृपासन पर बैठाकर मन्त्रीगण विवादों को सुनकर धर्म संशयों का सविधि निर्णय करते थे । इति काश्मीरको राजा वर्त्तमानः स शैशवे । साहायकाय समरे न निन्ये कुरुपाण्डवैः ॥ ८२ ॥ ८२. अस्तु यही कारण है । कौरव एवं पाण्डव दोनों पक्षों ने कश्मीर के राजा को शिशु जानकर महाभारत युद्ध में सम्मिलित होने के लिये आमन्त्रित नहीं किया था । श्लोक सं० ७ स्पष्ट उल्लेख करता है कि दोनों राजाओं में युद्ध हुआ । उसमें काश्मीर राजा पराजित हुआ । वीर गति प्राप्त किया । ८१ ( १ ) काक पक्ष : मस्तक के दोनों पार्श्व में बच्चों तथा क्षत्रिय युवकों में कुछ बाल छोड़ दिये जाते थे । मेरी बाल्यावस्था में मेरे घर में मस्तक के ऊपर लगभग एक चौथाई बनवाकर शेष बाल छोड़ देते थे । यह बाल रखने की प्रथा लुप्त हो गयी है । पठान तथा सीमान्त पश्चिमोत्तर प्रान्त के पुराने कुलीन लोग अब भी इस प्रकार के बाल रखते हैं । मैने अफगानिस्तान की अपनी यात्रा में प्रायः लोगो को इस प्रकार का बाल रखे देखा था । भारत में काबुली लोग अब भी इस प्रकार का बाल रखते हैं । ईरान मे इस फैशन को 'काकुल' कहते हैं । ( २ ) धर्मसंशय : यहाँ धर्मसंशय से अर्थ है— विवाद । दो पक्षो में अधिकार, अपराध, दण्ड आदि के विषयों में जब संशय उत्पन्न होता था और प्रचलित विधि के विषय में शंका उत्पन्न होती थी तो वह विषय अन्तिम निर्णय हेतु राजा के सम्मुख उपस्थित होता था । राजा को प्रतीक मानकर मन्त्रीगण राजा के नाम से राजा के सम्मुख निर्णय देते थे । राजा न्याय का स्रोत था । न्याय का संरक्षक था । अतएव राजा को सम्मुख रखकर मन्त्रीगण निर्णय लेते थे । पाठभेद : श्लोक संख्या ८२ में 'निन्ये' का 'नीतः' पाठ- भेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ८२ ( १ ) महाभारत और कश्मीर राज : नीलमत पुराण का प्रारम्भ राजा जनमेजय की इस जिज्ञासा से होता है । महाभारत युद्ध स्थल में सभी देशो के राजा उपस्थित थे । किन्तु क्या कारण है कि कश्मीर मण्डल के राजा ने युद्ध में किसी पक्ष से भाग नहीं लिया । इस प्रश्न का उत्तर वैशम्पायन ने कश्मीर का राजा बालक होना दिया है : जनमेजय उवाच : महाभारतसंग्रामे नानादेश्या नराधिपाः । महायूथाः समायाताः पितॄणां मे महात्मनाम् ॥ ३ : ३ कथं काश्मीरिको राजा नायातस्तत्र कीर्त्तय । पाण्डवैर्धार्तराष्ट्रैश्च न वृतः स कथं नृप ॥ ४ : ४ कश्मीरमण्डलं चैव प्रधानं जगति स्थितम् । कथं नासौ समाहूतस्तत्र पाण्डवकौरवैः ॥ ५ : ५ किंनामाऽभूत् राजा च कश्मीराणां महाशयः । कथं वासौ निशम्यैतन्नायातश्चात्मना तदा ॥ ६ : ६
प्रथम तरंग ११७ आम्नायभङ्गान्निर्णनामकृत्यास्ततः परम् । पञ्चत्रिंशन्महीपाला मग्ना विस्मृतिसागरे ॥ ८३ ॥
पैंतीस राजा ८३. तत्पश्चात् हुए पैंतीस महीपालों के नाम तथा कर्म परम्परा गत लेखादि के नष्ट होने के कारण विस्मृति सागर में डूब चुके हैं।
स्वर्गसोपानपंक्तिर्हि भव्यानां समभूदिदम् । भारतं नाम युद्धं यन्जिगीषूणां महात्मनाम् ॥ 7 : ७ रुरोध च कंसारेर्मथुरां मधुराकृतिः । घनैः स्वैर्बलौघान् राजा त्रेसुस्ते यत्र यादवाः ॥ 16 : १६
अकारणमिदं नाम न भवेदद्यदसौ तदा । नायातो भारतं युद्धं राजा काश्मीरिको महान् ॥ 8 : ८ भूरिशोऽथ बले भग्ने यादवानां बलोद्धतः । बलो बलेन रुरुधे महता तं जिगीषया ॥ 17 : १७
वैशम्पायन उवाच : सत्यमेतन्महाराज त्वया प्रोक्तं महीपते । यथा नामौ समायातस्तन्निशामय सुव्रत ॥ 9 : ९ अतीव तुमुले तस्मिन् युद्धेऽन्योन्यजिगीषया । काश्मीरिकोऽसौ क्रुद्धेन बलेन बलवान् बलात् ॥ 18 : १८
कुरुपाण्डववेलायां भूमिर्भगवता स्वयम् । पाविताभूदितिसुतानवतीर्णाऽधवान् यत् ॥ 10 : १० रुद्धोऽभूत्पतितो भूमौ शस्त्रास्त्रक्षतविग्रहः । इत्यस्मिन् वीरकलितां गतिमाप्ते महात्मनि ॥ 19 : १९
तस्मिन्कालेऽत्र समभूद्राजा विशदकीर्तिमान् । कश्मीरान् पालयन् सौम्य गोनन्द इति संज्ञया ॥ 11 : ११ दामोदराभिधस्तस्य सूनू राजाऽभवत्सुधीः । विभूतिकलितेनाऽथ समृद्धेन महात्मना ॥ 20 : २०
असौ प्रतापकलितो दिशं सौम्यां समाश्रितः । शुशुभे विक्रमोदग्रो मानी कलितसंस्थितिः ॥ 12 : १२ येन काश्मीरभूः राज्ञाऽन्विता सौम्या जहा सह । स राजवीजो सत्कीर्तिर्वंशशाली महाभुजः ॥ 21 : २१
अथोत्थिते किल महाविरोधे दैत्यबन्धुना । वृष्णीनां कृष्णमुख्यानां जरासंधेन भूभृता ॥ 13 : १३ अतश्चिन्तातुरो जातु न लेभे निवृत्तिं पराम् ॥ अहो महात्मा राजा स कथं नाम हतो बलात् । द्वीपान्तर्वासिना तातो बलेन बलवान् मम ॥ 22-23 : २२-२३
अनेन बन्धुना मानस्थानमेष महीपतिः । काश्मीरिकोऽभ्यर्थनयाहूतः माहात्म्यकाम्यया ॥ 14 : १४ हसन गोनन्द द्वितीय को बाल गोनन्द लिखता है। अराकीन दौलत के मशविराह से यह शख्स सन् २५ क० बाद अज वलगत तख्त नशीन हुआ। एक खासी मुद्दत नेकनामी के साथ हुकूमत के चलाने में गुजारी। बिल आखिर हरणदेव के हाथ कत्ल हुआ। मुद्दत सल्तनत चालीस साल।
गत्वासौ बन्धुयुद्धार्थमजरासंधस्य भूपतेः । चक्रे माहात्म्यकं धीमान् जरामन्धस्य भूपतेः ॥ 15 : १५
११८ राजतरंगिणी
हसन का यह कयास है कि द्वितीय गोनन्द मारा गया। इसका कोई प्रमाण नहीं है। कोई कारण नहीं देता कि गोनन्द की हत्या क्यों की गयी। हत्याकारी हरणदेव का गोनन्द से क्या सम्बन्ध था। ८३ (१) लुप्त राजा : कल्हण ने ३५ राजाओ का नाम तथा समय नहीं दिया है। इस प्रसंग में एक रोचक बात रत्नाकर पुराण की है उसका उल्लेख यहाँ कर देना आवश्यक है । कश्मीर का बड़शाह अर्थात् बादशाह जैनुल आबदीन (सन् १४२०-७० ई०) ने प्राचीन पुस्तकों का अन्वेषण कराया था। उसने १५ राज- तरंगिणियों का पता लगवाया था। सिकन्दर बुत शिकन (१३६३-१४१६ ई०) के समय केवल ११ ब्राह्मणों के कुटुम्ब कश्मीर में रह गये थे। उनके अतिरिक्त हिन्दू या तो मुसलमान हो गये या विनष्ट कर दिये गये या कश्मीर त्याग कर भाग गये। देवस्थान तथा मन्दिर नष्ट कर दिये गये। पुस्तकें आदि भस्म कर दी गयीं। उनका या तो नदियों में प्रवाह कर दिया गया अथवा भस्म कर दी गयी। बहुतो ने राज्य भय से स्वयं वितस्ता में उनका जल प्रवाह कर दिया। बड़शाह के समय कल्हण की राजतरंगिणी जो प्रायः एक सौ वर्ष तक लुप्त थी प्राप्त हुई। उसमे ३५ विस्मृत राजाओ का उल्लेख नही था। कुछ समय पश्चात् भोजपत्र पर लिखी एक पुस्तक और मिली। उसका नाम 'रत्नाकर पुराण' था। रत्नाकर पुराण में ३५ लुप्त राजाओ का वर्णन था। बादशाह जैनुल आबदीन ने रत्नाकर पुराण तथा राजतरंगिणी का अनुवाद फारसी में कराया। पुराण में कलियुग के प्रारम्भ से होने वाले राजाओ का वर्णन था। दोनो ही मूल ग्रन्थ अर्थात् रत्नाकर पुराण तथा उसका अनुवाद इस समय अप्राप्य हैं। कश्मीर के इतिहासकार पीर हसन शाह का कहना है कि उन्हें रत्नाकर पुराण के अनुवाद की एक प्रति रावलपिण्डी में किसी काश्मीरी सज्जन से प्राप्त हुई थी। उसमें जिन ३५ राजाओं का वर्णन कल्हण ने नही किया है, उनका उल्लेख था। हसन वितस्ता में एक दिन रत्नाकर पुराण के अनुवाद वाली पुस्तक के साथ नाव पर जा रहे थे। नाव डूब गयी। वे स्वयं बच गये पुस्तक डूब गयी। हसन ने नहीं लिखा है कि यह पुस्तक रावलपिण्डी में किससे मिली थी। हसन के अनुसार २२ राजाओं का शासन काश्मीर में एक हजार वर्ष तक था। उन्हें वह पाण्डववंशीय कहता है। कश्मीर की परम्परा बलो धाती है कि प्रत्येक स्मारक तथा गाथा को पाण्डव से जोड़ते हैं। उन्हें पाण्डव लारेह किंवा पाण्डव स्मारक कहते है। हिमाल तथा लोलार की प्रेमगाथाएं इसी काल की कही जाती हैं। हिमाल का प्रेमी नागराय तथा लोलार का प्रेमी बोम्बरे था। कश्मीर के ग्राम्य गीतों में उनका नाम अभी तक प्रचलित है। बोम्बरे उन विस्मृत राजाओ मे से एक था। बोम्बरे लोलार पर इतना आसक्त था कि उसने राज्य त्याग दिया। हिमाल-नागराय की एक प्रचलित कहानी है। नागराय को भी उक्त ३५ लुप्त राजाओ में रखा गया। हसन के अनुसार हरणदेव पाण्डव वंशज था। यह गोनन्द द्वितीय के यहाँ सेवावृत्ति करता था। कालान्तर मे वह राजमन्त्री हो गया। गोनन्द की हत्या कर स्वयं राजा बन गया। रामदेव हरणदेव के पश्चात् राजा हुआ। उस प्रतापी राजा ने भारतवर्ष के ५०० राजाओं को परास्त कर अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक राज्य कायम किया। उसने उपज का १० प्रतिशत राजकर निश्चित किया। किन्तु उसके उत्तराधिकारियों ने उसे बढ़ाकर २० प्रतिशत कर दिया था।
प्रथम तरंग ११६
यदि रामदेव इतना प्रतापी राजा होता तो कश्मीर के इतिहास तथा तत्कालीन कश्मीर साहित्य में उसके सम्बन्ध में कुछ न कुछ कहानी तथा कोई न कोई घटना अवश्य लिखी मिलती । उसका कोई न कोई स्मारक, मन्दिर अथवा भवन के रूप में अवश्य होता । उसका किसी न किसी काश्मीरी साहित्य में उल्लेख मिलता । कल्हण के समय तक कुछ बात उसके सम्बन्ध में अवश्य प्रचलित रहती । हसन के अनुसार पाण्डव वंश का वाईसवाँ राजा सुन्दरसेन था । उसके समय में भयंकर भूकम्प आया । भूकम्प राजधानी के सन्धिमत नगर के मध्य में हुआ । समस्त नगर, राजा, नागरिक, जीव- जन्तु इसके शिकार हो गये । नगर जिस स्थान पर था वहाँ उलर झील हो गयी । हसन ने बाइबिल तथा कुरान शरीफ वर्णित जल प्लावन के आधार पर इस कथा का वर्णन किया है । राजवंश के निर्मूल होने पर, कश्मीर के उत्तर-पूर्व स्थित अत्यन्त रमणीय, उर्वरा लोलह किंवा लोलाव अथवा आधुनिक लोव उपत्यका के सामन्त लव को कश्मीर के लोगो ने राजा निर्वाचित किया । उसे कश्मीर के सिंहासन पर बैठाया । सम्भव है कि भूचाल तथा जलप्लावन के कारण जो कश्मीर में प्रायः हुआ करते हैं, लुप्त राजाओ से संबंधित पुस्तिकाएं तथा सामग्रियां नष्ट हो गयी हों । जिस रत्नाकर पुराण के आधार पर हसन ने इतिहास लिखा है, उसके विषय मे कहता है कि वह पुस्तक के साथ वितस्ता नदी में नाव पर जा रहा था । तूफान आया । पुस्तक नदी में डूब गयी । नीलमत पुराण तुल्य रत्नाकर पुराण का होना सम्भव हो सकता है । नीलमत के समान उसमें भी ऐतिहासिक वर्णन रहा होगा । किन्तु अभी तक रत्नाकर पुराण तथा उसका अनुवाद नहीं मिल सका है । मैने हसन द्वारा वर्णित राजाओ का वर्णन परिशिष्ट ३ में दे दिया है। इसका ऐतिहासिक महत्त्व भविष्य के गर्भ में है । वस्तुस्थिति तथा घटना क्रम जो प्रकाश में आये हैं, उनके आधार पर उसका ऐतिहा- सिक महत्त्व नगण्य है । मैं यहाँ मुल्ला अहमद के 'वाक्ये कश्मीर' का 'दीवाचा' दे देना उचित समझता हूँ जिससे बहुत बातें साफ हो जायेंगी । पता चलेगा कि रत्नाकर पुराण की कहानी सर्व प्रथम कैसे आरम्भ हुई या गढ़ी गयी । लुप्त राजाओं को किस प्रकार एक दूसरे से जोड़ने का प्रयास किया गया है । हसन ने दीवाचा अपनी पुस्तक में उद्धृत की है । उसे अविकल रूप में यहाँ देना अच्छा होगा । मुल्ला अहमद 'वाक्ये कश्मीर' के दीवाचा में रकम तराज है—'यह हकीर पुर तकसीर जब आला हजरत शहन्शाह मुअज्जम यानी जैनुल आबदीन के 'वाजिबुल अर्ज' के मुताबिक किताब महाभारत के फ़ारसी तरजुमे से फारिग हुआ तो इसके फौरन बाद ही कश्मीर के राजे-महाराजो की तारीख नवीसी पर मुकर्रर हुआ । चुनांच: इस इरशाद के मिलते ही मैने संस्कृत जबान के उन 'पुरानो' और 'तरंगिनियो' की तलाश शुरू की जो तुरकी लुटेरे कश्मीर पर हमलावर होने और वाज सुलतान सिकन्दर बुतशिकन की मजहबी ना सादारी के वापस जाया हो चुकी थी । और जो बाक़ी थी वह बहुत थोड़ी और नायाब थी । वकौल शस्ते जो- इब्दा या बिन्दा बडी मशक्कत और मिहनत के बाद मैं उनके पाने में कामयाब हो गया । इनमें से क़ाबिले जिक्र किताबें कल्हण पण्डित, क्षेमेन्द्र, छबिल्लकार और पद्ममिहिर की राजतरंगिनियां हैं । लेकिन उसे छोड़कर कल्हण पण्डित की राजतरंगिनी के तरजुमा की तरफ मुतवज्जह हुआ जो बहम्दुल्लाह बहुत जल्द इख्तिनाम पजीर हो गया । 'इसके थोड़े अरसा बाद ही पण्डित रत्नाकर की पुरानी तारीख के कुछ अजजा पण्डित प्रजा की
१२० राजतरंगिणी तवज्जो और इनायत से हासिल हो गये। ये सारीख भोज के पत्तों पर लिखी हुई थीं। मुतालह करने से पैंतीस राजाओं के नाम जो सन् कलयुग शुरू होने से कवल कश्मीर मे हुए थे और जिन्हे कल्हन पण्डित ने ब वजह अदम बसूक तर्क कर दिया था मालूम हुए। बादशाही हुक्म के मुताबिक इस किताब का तरजुमा भी किया गया और बतौर जमीया अपनी किताब के आखिर मे मिलाकर दोस्त अहबाब के लिये सामाने मुसर्रत बनाने की कोशिश की।' हसन कहता है—'राकुमउल हुरुफ़ ने मुस- न्निफ 'वाकए कश्मीर' के तरजुमा के मुताबिक उन राजाओं के अहवाल से अपनी तारीख शुरू की है। जिन्हें कल्हन पण्डित ने अपनी राजतरंगिनी में तर्क कर दिया था। यहाँ गोविद सानी तक जो तजकिरा किया गया है सबका सब मुल्ला अहमद की 'वाकये कश्मीर' से माखोज हैं।' (पृष्ठ १४-१५) तारीख हसन कश्मीर के मुसलमानो मे बहुत प्रचलित है। इसलिए कश्मीर के इतिहास का वास्तविक ज्ञान कश्मीर उपत्यका की मुसलिम जनता को कम प्राप्त हो सका है। लुप्त राजाओं के विषय में हसन का वर्णन उनके शब्दो में देना अच्छा है। 'मुसन्निफ ने कश्मीर की यह तारीख चार जिल्दो में मदून की है। जिल्द अव्वल मे जुगराफिया का बयान है। उसमें इक्त सादियात पैदावार आसार करीमा और शहराए सबक़ा मुफस्सल और निहायत दिल आवेज हाल मिलता है। हक तो यह है कि यह अपनी नवैयत का पहला कारनामा है और अपनी अफाहियत की वजह से बड़ी ही अहम तालीफ है। जिल्द दोयम मे जिसका उर्दू तरजुमा इन ओराक के साथ कारहन है। कदीम हिन्दू राजाओं सलातीन व मल्कूत मुतल्लिकाएँ कश्मीर सलातीन चुगताइया, अफागना, सिख और डोगरा हुक्मदानो के हालात हैं। जिल्द सोयम और चहारम सूफिया औलियाए कराम उलमा और शोहरा के हाल पर मुस्तमिल है। 'जिल्द अव्वल एक मशरकी तर्ज के मुख्तसर मुवदमा से शुरू होती है। ओवस्लन अकातीन आलम और जुगराफिया फलकी व सबई का बयान है। यह हिस्साए असमी नुक्ता निगाह से ज्यादा बकी नही। और गालिवन इब्तदाई दरसी किताबों से माखूज है। हिस्साए मावद पूरे तौर पर कश्मीर से मुतअल्लिक है। अगर ये इसमें ओरेल स्टाइन के कदीम जोगराफिया कश्मीर या कनिघम की एक ऐसी (दिक्कत) नजर नही मिलती ताहम इसकी बफादियत से भी इन्कार नही किया जा सकता। जिल्द दोयम में गयासो मदो जजर का बयान है। वकोल मुसन्निफ उसमें मुन्दरजः जैल माखोनों से इस्तफादा हासिल किया गया है। (२) वाक्ये कश्मीर : मुसन्निफ़ा अल्लामा अहमद काश्मोरी—इसके मुतल्लिक सतूर बाला में इशारा हो चुका है। इस किताब की मदद से मुसन्निफ ने उन पैंतीस राजाओ का तजकिरा मुरत्तन किया है जिनके हालात कल्हण की राजतरंगिणी में भी नही मिलते। अलावा अजई उन ६ राजाओ का तजकिरा भी इस किताब का रहीने मिन्नत है। जिन्होने १६१ सन् से ४१४ ईसवी तक और फिर रानादित्य के अहद हकूमत ४१४-४७४ के बाद ५७१ ई० तक काश्मीर पर हुक्मदानी की। यहाँ इस चीज का जिक्र दिलचस्पी से खाली न होगा कि कल्हण को जब इन सात राजाओं के हालात दस्तयाव न हो सके तो उसने रानादित्य के अहदे हकूमत ३०० वर्ष मुतैय्यन करके इस खला को पूरा करने की कोशिश की। जाहिर है कि अकले सलीम इसके मानने से कासिर है और कल्हण का यह कोल महज वर बजन सुखन है। हमारे मुसन्निफ की इस दरयाफ्त ने तारीख कश्मीर को मुकम्मल कर दिया और यह एक बडी ही अहम कडी है जो तारीख हसन के अलावा कही और दस्तयाव नही होती। कारैन की दिलचस्पी के लिए इन राजाओं की फहरिस्त दर्ज जैल है।'"
प्रथम तरंग १२१ अथाभवत् लवो नाम भूपालो भूमिभूषणम् । वेल्लद्यशोदुकूलायाः प्रीतिपात्रं जयश्रियः ॥ ८४ ॥ छवि¹ ८४. अनन्तर जयश्री² का प्रिय पात्र उल्लोलित दुकूल धारी भूमिभूषण लव राजा हुआ । यस्य सेनानिनादेन जगदौन्निद्र्यदायिना । निन्यिरे वैरिणश्चित्रं दीर्घनिद्राविधेयताम् ॥ ८५ ॥ ८५. उसके सेना का निनाद जिसने दुनिया की नींद हराम कर दी थी, आह ! आश्चर्य है !! वैरियों को लम्बी नींद में सुला दिया था । पाठभेद : श्लोक संख्या ८४ में 'दुकूलायाः' का पाठभेद 'दुगूलायाः' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ८४ (१) लव : मुस्लिम इतिहासकारों ने लव का नाम लू अथवा लूलू लिखा है । उसने लोलार नगर बसाया था । आइने अकबरी में अबुल फज़ल ने लिखा है । लोलार कश्मीर का पश्चिमी अंचल था । यहाँ उसके निर्माण की साक्षी वहाँ के एक करोड़ शिलाखण्ड व स्मारक दे रहे थे । आइने अकबरी के अनुसार नगर का आकार सम्राट् अकबर के समय तक देखा जा सकता था । इतिहासकार हसन ने लव का निर्वाचन होना लिखा है । कल्हण ने केवल ४ श्लोकों में इस राजा का वर्णन किया है । कल्हण ने अन्य राजाओं तुल्य लव का वर्णन नहीं किया है कि उसने किस प्रकार राज्य पाया । स्पष्ट है कि लव पूर्वकालीन राजवंश से भिन्न वंश अथवा कुल का था । उसने अपने राज- वंश की नवीन परम्परा चलाया । कल्हण ने लव, कुश, खगेन्द्र, सुरेन्द्र, गोधर सुवर्ण जनक और सचीनर का नाम पद्ममिहिर के आधार पर लिखा है । पद्ममिहिर की तालिका विवादास्पद है । १६ लोलार के साथ लव का नाम व्यर्थ जोड़ दिया गया है । डाक्टर थी हुल्त्ससेह ने आलोचना की है । स्थानीय नाम लवादि राजाओं के साथ वह इस लिये जोड़ दिया गया है कि स्वरविज्ञान किंवा साम्य ध्वनि पर आधारित मालूम होता है । स्थानीय नामों के अर्थ लगाने में प्राय यह प्रवृत्ति देखी गयी है कि उसे किसी न किसी राजा के नाम के साथ जोड़ दिया जाता है । वे राजा चाहे काल्पनिक किंवा सत्य क्यो न रहे हो । कश्मीर के स्थानों के नामों को इस बात ने बहुत प्रभावित किया है । ( विल्सन द्वारा उल्लिखित पृष्ठ १७ ) था स्टीन उक्तमत का समर्थन करते हैं । उनका भी मत है कि यह बात पद्ममिहिर की तालिका के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न करती है । (२) जयश्री : विजय देवी का चित्र भारत तथा पश्चिम देशों में तूर्य सहित आकाश में उड़ते हुए वस्त्रों के साथ दिखाया गया है। उनके पृष्ठ भाग में मेघ रहता है । वह बहती वायु का प्रतीक है । श्रीदेवी के दुकूल किंवा वसन में भरती हवा अभिराम, उत्साह, उमंग एवं उल्लास पूर्ण चित्र उपस्थित करती है । विजय देवी पश्चिम में जैतून शाखा का मुकुट किंवा केवल पल्लव युक्त शाखा लिये दिखाई गयी है । वह शान्ति, सन्धि, मैत्री, तथा वीरता की प्रतीक मानी जाती है । भारत में जैतून के पल्लव एवं शाखा के स्थान पर माला एवं पुष्प चित्रित किया जाता है ।
१२२ राजतरंगिणी तेन षोडशभिर्लक्षैर्विहोनामश्मवेश्मनाम् । कोटिं निष्पाद्य नगरं लोलोरं निरमीयत ॥ ८६ ॥ ८६. उसने पाषाण वेश्म¹ बनवाकर लोलोर² नगर का निर्माण कराया। दत्त्वाऽग्रहारं लेदर्यां लेवारं द्विजपर्षदे । स द्यामनिन्द्यशौर्यश्रीरारुरोह महाभुजः ॥ ८७ ॥ ८७. लेदरी¹ स्थित अग्रहार² लेवार³ द्विज परिषद् को दान देकर महाभुज अनिन्द्य शौर्य- शाली राजा ने स्वर्गारोहण किया।
पाठभेद : श्लोक संख्या ८६ में 'लक्षै' का पाठभेद 'लक्ष्यै' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ८६ (१) वेश्म : रत्नाकर पुराण में ८४ लाख के स्थान पर केवल ८० हजार मकानों का उल्लेख है। उसी के अनुसार राजा ने ६० वर्ष राज्य किया। (२) लोलार : कश्मीर में प्रचलित परम्परा से प्रतीत होता है कि राजा लव ने लोलो (लोलाव) परगना कमराज में स्थापित किया था। पुराना संस्कृत नाम (त० रा० ७:१२४१) लोलाट है। लोक प्रकाश में इसे 'ललव' कहा गया है। पण्डित साहिब राम ने 'लोलाह' का वर्तमान नाम 'ललव' दिया है। हसन इसका नाम 'लो लो' देता है-इलाका लोलाव के बीचो बीच एक शहर 'लो लो' नाम का भी था जिसमें निहायत उम्दा किस्म की दुकानें और मकानात थे तामीर कराया। उक्त प्राचीन नगर किस स्थान पर था निश्चय नहीं किया जा सका है। लोल्लार से मिलता कोई स्थानीय नाम श्री स्टीन को नहीं मिल सका था। वह कहते हैं कि परम्परा सब का नाम कमराज के परगना 'लोलाऊ' किंवा 'लोलाव' से जोड़ती है। पाठभेद : श्लोक संख्या ८७ में 'पर्षदे' का पाठभेद 'षट्पदे' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : ८७ (१) लेदरी : इसे लेदर्य तथा लम्बोदरी भी कहते हैं। आधुनिक नाम लिदर नदी है। यह वितस्ता की एक मुख्य सहायक नदी है। उर्ध सिंध उपत्यका के दक्षिणी क्षेत्र के जल को बहाकर ले जाती है। वितस्ता में अनन्त नाग तथा विजशोर के मध्य में आकर मिलती है। नदी तट पर पर्यटकों का प्रिय प्रसिद्ध नगर पहलगाव इस समय बसा है। स्थान रम्य तथा चित्ताकर्षक है। भारतीय स्वाधीनता तथा कश्मीर में लोकतन्त्रीय शासन स्थापित होने के पश्चात् पहलगाव की अभूतपूर्व उन्नति हुई है। यहाँ से यात्री श्री अमरनाथ की यात्रा करते हैं। मैंने इस यात्रा का दृश्य देखा है। सर्व प्रथम छड़ी चलती है। उसके पीछे हजारों यात्री पैदल तथा टट्टुओं पर चलते हैं। भारत के कोने कोने से तीर्थ यात्री आकर यात्रा में सम्मिलित होते हैं। नीलमत में इसका उल्लेख है : खेडः शपालः रंरीशो लाहुरी लेदिरस्तथा । रैडिश्च फरडाडश्च जयन्ताश्च समन्ततः ॥ 887 : १०५७ (२) अग्रहार : यह एक प्रकार की जागीर थी। किसी राजा की ओर से ब्राह्मणों के निर्वाहार्थ भूमि दान को अग्रहार कहते थे। अग्र का अर्थ प्रथम आहार एवं भोजन है। सर्व प्रथम भोजन के लिए दिया गया है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है। भूमि, क्षेत्र अथवा ग्राम की आमदनी किसी परिषद्, मन्दिर, देवस्थान अथवा व्यक्ति को अर्पण किया जाता था।