राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ राजतरंगिणी तेन षोडशभिर्लक्षैर्विहोनामश्मवेश्मनाम् । कोटिं निष्पाद्य नगरं लोलोरं निरमीयत ॥ ८६ ॥ ८६. उसने पाषाण वेश्म¹ बनवाकर लोलोर² नगर का निर्माण कराया। दत्त्वाऽग्रहारं लेदर्यां लेवारं द्विजपर्षदे । स द्यामनिन्द्यशौर्यश्रीरारुरोह महाभुजः ॥ ८७ ॥ ८७. लेदरी¹ स्थित अग्रहार² लेवार³ द्विज परिषद् को दान देकर महाभुज अनिन्द्य शौर्य- शाली राजा ने स्वर्गारोहण किया।
पाठभेद : श्लोक संख्या ८६ में 'लक्षै' का पाठभेद 'लक्ष्यै' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ८६ (१) वेश्म : रत्नाकर पुराण में ८४ लाख के स्थान पर केवल ८० हजार मकानों का उल्लेख है। उसी के अनुसार राजा ने ६० वर्ष राज्य किया। (२) लोलार : कश्मीर में प्रचलित परम्परा से प्रतीत होता है कि राजा लव ने लोलो (लोलाव) परगना कमराज में स्थापित किया था। पुराना संस्कृत नाम (त० रा० ७:१२४१) लोलाट है। लोक प्रकाश में इसे 'ललव' कहा गया है। पण्डित साहिब राम ने 'लोलाह' का वर्तमान नाम 'ललव' दिया है। हसन इसका नाम 'लो लो' देता है-इलाका लोलाव के बीचो बीच एक शहर 'लो लो' नाम का भी था जिसमें निहायत उम्दा किस्म की दुकानें और मकानात थे तामीर कराया। उक्त प्राचीन नगर किस स्थान पर था निश्चय नहीं किया जा सका है। लोल्लार से मिलता कोई स्थानीय नाम श्री स्टीन को नहीं मिल सका था। वह कहते हैं कि परम्परा सब का नाम कमराज के परगना 'लोलाऊ' किंवा 'लोलाव' से जोड़ती है। पाठभेद : श्लोक संख्या ८७ में 'पर्षदे' का पाठभेद 'षट्पदे' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : ८७ (१) लेदरी : इसे लेदर्य तथा लम्बोदरी भी कहते हैं। आधुनिक नाम लिदर नदी है। यह वितस्ता की एक मुख्य सहायक नदी है। उर्ध सिंध उपत्यका के दक्षिणी क्षेत्र के जल को बहाकर ले जाती है। वितस्ता में अनन्त नाग तथा विजशोर के मध्य में आकर मिलती है। नदी तट पर पर्यटकों का प्रिय प्रसिद्ध नगर पहलगाव इस समय बसा है। स्थान रम्य तथा चित्ताकर्षक है। भारतीय स्वाधीनता तथा कश्मीर में लोकतन्त्रीय शासन स्थापित होने के पश्चात् पहलगाव की अभूतपूर्व उन्नति हुई है। यहाँ से यात्री श्री अमरनाथ की यात्रा करते हैं। मैंने इस यात्रा का दृश्य देखा है। सर्व प्रथम छड़ी चलती है। उसके पीछे हजारों यात्री पैदल तथा टट्टुओं पर चलते हैं। भारत के कोने कोने से तीर्थ यात्री आकर यात्रा में सम्मिलित होते हैं। नीलमत में इसका उल्लेख है : खेडः शपालः रंरीशो लाहुरी लेदिरस्तथा । रैडिश्च फरडाडश्च जयन्ताश्च समन्ततः ॥ 887 : १०५७ (२) अग्रहार : यह एक प्रकार की जागीर थी। किसी राजा की ओर से ब्राह्मणों के निर्वाहार्थ भूमि दान को अग्रहार कहते थे। अग्र का अर्थ प्रथम आहार एवं भोजन है। सर्व प्रथम भोजन के लिए दिया गया है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है। भूमि, क्षेत्र अथवा ग्राम की आमदनी किसी परिषद्, मन्दिर, देवस्थान अथवा व्यक्ति को अर्पण किया जाता था।